आक्रामकता के क्लाइमेक्स की ओर बढ़ता प्रचार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव
अब जबकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए महज तीन दिन बाकी हैं, तो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच पहले चरण का चुनाव प्रचार आक्रामकता के क्लाइमेक्स को छू रहा है। जहां पहले दौर की वोटिंग के चार दिन पहले बंगाल में ईडी (प्रवर्त्तन निदेशालय) के छापे पड़े हैं और एक बिजनेसमैन गिरफ्तार हो चुका है, वहीं कोलकाता के डिप्टी पुलिस कमिश्नर शांतनु सिन्हा विश्वास अपने घर में नहीं मिले, इसलिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका। गौरतलब है कि शांतनु सिन्हा विश्वास मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सिक्योरिटी चीफ भी हैं, इसलिए दीदी ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह मेरे सिक्योरिटी चीफ को गिरफ्तार करके मेरी हत्या करवाना चाहती है ताकि चुनाव जीत सके। लेकिन ममता बनर्जी के मुताबिक, ‘हम इस तरह के छापों से नहीं डरते, बंगाल एकजुट है और भाजपा को मुंह की खानी पड़ेगी’। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में महिला आरक्षण पुनर्संशोधित विधेयक के सदन में गिर जाने के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव प्रचार पर फोकस कर दिया है। गत 19 अप्रैल 2026 को वह चार चुनावी रैलियों में टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) व ममता बनर्जी पर जमकर बरसे। उन्होंने ममता बनर्जी पर जंगलराज चलाने का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर महिला आरक्षण पर जो अड़ंगा लगाया है, उसकी सजा पश्चिम बंगाल की महिलाएं टीएमसी को ज़रूर देंगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि टीएमसी के गुंडे समय रहते सरेंडर कर दें वरन् 4 मई के बाद बख्शे नहीं जाएंगे। इस समय पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रचार का पारा जिस तरह से बढ़ा हुआ है, उसके चलते यह एक उबलता हुआ रण क्षेत्र बन चुका है जहां शब्द अब हथियार हैं। मंच, मोर्चा है और हर एक रैली निर्णायक टकराव का टे्रलर बनती दिखायी दे रही है। दीदी ममता बनर्जी की आवाज में चढ़ती धार और भाजपा की जवाबी हुंकार के बीच 2026 का विधानसभा चुनाव अपने आक्रामक क्लाइमेक्स की ओर बढ़ चला है। यह वह मुकाम है, जहां मुद्दे पीछे छूटते दिख रहे हैं और मुकाबला सीधे इरादों, प्रभाव और वर्चस्व की लड़ाई में बदलता जा रहा है। यह एक ऐसी लड़ाई है, जिसमें बोला गया हर शब्द अगले वार की भूमिका लिख रहा है।
सवाल है, चुनाव प्रचार में ममता बनर्जी जो आक्रामकता दिखा रही हैं, आखिर उसके मायने क्या हैं? क्या यह इस बात का संकेत है कि वह तीसरी बार सत्ता में लौट रही हैं या फिर यह महज अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए है ताकि समय रहते कार्यकर्ताओं को मैसेज दिया जा सके। वास्तव में जब किसी चुनाव में किसी राजनीतिक पक्ष का मुख्य किरदार बेहद आक्रामक हो जाए, तो उसका लक्ष्य सबसे पहले अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना होता है कि हम जीत रहे हैं ताकि चुनाव में कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा बना रहे। पश्चिम बंगाल में वैसे भी चुनाव बेहद संवेदनशील राजनीतिक गतिविधि होते हैं। यहां की राजनीति में हमेशा हिंसा और दबाव का बोलबाला रहा है। ऐसे में पहले दौर के चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में यदि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सत्ता के ख्वाब अपने कार्यकर्ताओं को दिखा रही हैं और भाजपा के मुख्य चुनाव प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सब कुछ दांव पर लगाकर आक्रामकता का दामन थाम रहे हैं, तो उसका सीधा सा मतलब है, अपने-अपने कैडरों का मनोबल बढ़ाना ताकि वो इस आर-पार की लड़ाई में अपनी सारी ताकत झोंक दें।
वास्तव में यह आक्रामकता दोनों तरफ से मौजूदा चुनावों के नैरेटिव को कंट्रोल करने की कोशिश है। आज की राजनीति में वही बाजी मारता है, जो राजनीति में नैरेटिव सेट करता है। ममता बनर्जी जब आक्रामक प्रचार पर उतरती हैं, तो न केवल मीडिया और जनता का बल्कि सबसे ज्यादा अपने समर्पित कार्यकर्ताओं का ध्यान खींचती हैं। इसलिए वह चुनाव के इस स्तर पर पहुंच जाने के बाद ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ और ’बंगाल की अस्मिता’ जैसे नैरेटिव को ट्रेंड में ढालने की कोशिश कर रही हैं। यही वह रणनीति थी, जो 2021 के चुनाव में बेहद फायदेमंद साबित हुई थी लेकिन इस बार जिस तरह यह रणनीति योजनबद्ध ढंग से आगे बढ़ रही है, उससे यह सिर्फ चुनाव जीतने की गारंटी के रूप में नहीं उभर रही बल्कि छिपे हुए दबाव का संकेत भी बनी दिख रही है। अगर जमीन पर चुनौती बहुत कड़ी न होती, तो शायद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस कदर आक्रामक न होतीं। यही बात भाजपा पर लागू होती है कि अगर उसे कांटे की टक्कर से ज्यादा इस कठिनाई का एहसास न हो रहा होता, तो प्रधानमंत्री को दुनियावी संकट के बीच इस तरह एक राज्य विधानसभा चुनाव में अपने को फोकस न करना पड़ता।
दरअसल चुनाव प्रचार में आयी आक्रामकता दोनों ही तरफ से अविश्वास और दबाव की बानगी सरीखी दिख रही है जबकि 2026 के पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा और केंद्रीय सवाल यही है कि क्या दीदी बंगाल में तीसरी बार सत्ता में लौट रही हैं? वास्तविकता यही है कि अब जबकि पहले दौर के चुनाव के 72 घंटों से भी कम का समय बचा है, यह तय नहीं दिख रहा कि कोई एक पार्टी या पक्ष सुनिश्चित जीत की तरफ बढ़ रहा है, चाहे वह टीएमसी हो या भाजपा। जहां तक टीएमसी यानी ममता दीदी के पक्ष में जा रही बातों का सवाल है, तो उनकी मजबूत क्षेत्रीय पहचान भाजपा पर हर हाल में भारी पड़ रही है। दूसरी महत्वपूर्ण बात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा प्रदेश में लागू की गई कल्याणकारी योजनाएं हैं, जिनके केंद्र में मतदाता हैं और इन कल्याणकारी योजनाओं के जरिये टीएमसी को लगता है कि वह महिलाओं की पहली पसंद है, जबकि महिलाओं का वोट बैंक प्रतिशत 50 प्रतिशत से आगे जा चुका है। ऐसे यह स्वाभाविक हो जाता है कि सबसे बड़े वोट बैंक को संबोधित करते हुए उसे अपनी तरफ खींचने की कोशिश करनी चाहिए।
ममता बनर्जी के पक्ष में इन चुनाव में विपक्ष का बिखराव भी मददगार साबित हो सकता है। ऐसे में ममता बनर्जी कोशिश कर रही हैं कि शायद आक्रामक प्रचार के ज़रिये उन्हें बंगाली जनभावनाओं का संरक्षक समझा जाए और इस तरह वह इसे चुनावी मत के रूप में भुना लें। इससे भी उनके खिलाफ आक्रामक चुनाव प्रचार जा सकता है। लब्बोलुआब यह है कि भले पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों ही यह आभास दे रही हों कि वे सरकार बनाने जा रही हैं, लेकिन किसी एक के लिए यह सपना तब तक संभव नहीं लगता, जब तक उनके पास एक सक्षम बूथ मैनेजमेंट न हो। आखिरी दौर में पहुंचे इस चुनाव प्रचार से अभी तक जो हालात दिख रहे हैं, वह सौ प्रतिशत किसी एक के पक्ष में जाते नहीं दिख रहे। यह भी तय है कि चुनाव रुझान उस मोड़ पर आ पहुंचा है, कि जिसका भी प्रचार अभियान मतदाताओं पर ज्यादा असर कर गया, उसी के हाथ जीत लग सकती है। यही कारण है कि पहले चरण के चुनाव के आखिरी दिनों में दोनों ही मजबूत दावेदार आक्रामक चुनाव प्रचार का दामन थामे हुए हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



