गुस्से से उग्र हो रहे हैं भारत के औद्योगिक क्षेत्र
इस सवाल पर विचार करना बहुत ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश के नोएडा, हरियाणा के गुड़गांव, मनेसर, बिहार के बरौनी और गुजरात के मज़दूरों ने आंदोलन क्यों किया, और जल्दी ही वे फिर से सड़कों पर क्यों निकले। इसका सबसे बड़ा कारण है सरकार की अमरीकापरस्ती। अगर नरेन्द्र मोदी के कथित मित्र डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाये गये टैरिफ के सामने सरकार ने घुटने न टेके होते और अगर खाड़ी युद्ध को नरेन्द्र मोदी की मौन सहमति न होती, तो यह कहा जा सकता है कि शायद मज़दूरों को यह आंदोलन न करना पड़ता। इन सबसे ऊपर यह बात है ही कि सरकार ने स्वयं अपने बनाये हुए कानूनों का उल्लंघन करके दस-दस बारह-बारह साल तक मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने से इन्कार क्यों किया। उपभोक्ता सूचकांक बढ़ता रहा। तनख्वाहें उसके पीछे घिसटती रहीं। सरकार विकास की लफ़्फाज़ी करती रही। सरकार ने चार श्रम संहिताएं बनाई थीं। उनमें मज़दूरों के कल्याण और अधिकार की बातें जानबूझ तक आज तक साफ नहीं की गई हैं, ताकि कारखानेदारों को मज़दूरों का शोषण करने में आसानी हो।
दो दिन तक लगातार मज़दूरों के जुझारू आंदोलन के बाद नोएडा के फेज़-टू और सेक्टर-63, 62 और 85 के औद्योगिक इलाकों में फैक्ट्रियां खुल पाईं। ऐसी बात नहीं कि मज़दूरों ने अपना आंदोलन बंद कर दिया हो। वे पूरे दिन कोशिश करते रहे कि आंदोलन के विभिन्न स्वरूपों का इस्तेमाल करके अपना प्रतिरोध जारी रखें लेकिन उत्तर प्रदेश की दमनकारी पुलिस ने हर जगह पहुंच कर उनके खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाया। मसलन जब मज़दूरों ने सेक्टर-84 में पैदल मार्च निकालना चाहा तो पुलिस वहां पहुंच गई। जब सेक्टर-63 में वे गोलबंद हुए तो एक एडीएम की अगुवाई में प्रशासन वहां भी पहुंच गया। इन घटनाओं से पता चलता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जूझते आम लोगों के मन में सरकार के प्रति कितना गुस्सा है। प्रदर्शनों के ताज़े दौर से यह भी स्पष्ट हो गया है कि जब तक मज़दूर आक्रामक रवैया अख्तियार नहीं करते, उनकी कोई नहीं सुनता। जब तक वे शांतिपूर्ण धरना देते रहे, उनकी गतिविधियां खबर तक नहीं बनीं। उनके हमलावर आंदोलन के बाद ही उत्तर प्रदेश सरकार चेती और वह न्यूनतम मज़दूरी 3000 रुपए बढ़ाने पर मजबूर हुई।
इसके बाद तरह-तरह के झूठ बोले गए, डींगें मारी गईं। डबल इंजन की सरकार की दुहाई दी गई, पर यह नहीं बताया गया कि यह बढ़ोतरी कितने साल पहले हो जानी चाहिए थी। सरकार का दमनचक्र केवल लाठी और आंसू गैस तक ही नहीं रुका। आंदोलनकारी मज़दूरों पर पाकिस्तान का एजेंट होने का आरोप भी लगाया गया। गोदी मीडिया के ज़लील और साज़िशी एंकर दिन भर दावा करते रहे कि नोएडा में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष मुनीर के टूलकिट का इस्तेमाल किया गया है। क्या इन बातों के कोई सूबत मिले, नहीं। लेकिन पहले बाहरी तत्त्वों की दखलंदाज़ी की चर्चा हुई, और फिर एक छलांग मार कर इस आंदोलन को पाकिस्तानी साज़िश करार दे दिया गया। अगर यह मीडिया ज़रा भी कर्त्तव्यनिष्ठ होता तो उसे पूछना चाहिए था कि पिछले पूरे साल में इनमें से कई मज़दूरों के वेतन में महज़ 39 रुपए की ही वृद्धि कैसे हुई। इस मीडिया को पूछना और पता लगाना चाहिए था कि किस हक से सरकार मज़दूरों को सालों-साल भूली रही। सरकार ने नयी श्रम-संहिता तो बना दी लेकिन उसकी कमियों पर कोई ध्यान नहीं दिया। मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की याद उसे उसी समय क्यों आई जब हालात काबू से बाहर चले गए।
मजदूरों की दरिद्रता, बेचारगी, बदहाली और मजबूरियों की यह कहानी अक्सर हिंदुत्ववादी राजनीति की लफ़्फाज़ी और विकास के झूठे आंकड़ों के पीछे छिपा ली जाती है। आज मैं कहानी के इन छिपे हुए पहलुओं को आपके सामने पेश करूंगा। इससे पता चलेगा कि बेरोज़गारी के खतरे और मामूली तनख्वाह में काम कराने से पैदा हुआ धीरे-धीरे जमा होने वाला गुस्सा दरअसल एक टाइम बम है जो बहुत दिनों से टिक-टिक कर रहा था। उन्हें 12-14 घंटे तक बिना ओवरटाइम के कार्य करना पड़ता है और लागत कम करने के नाम पर संख्या में कम मज़दूरों से अधिक काम लिया जाता है। मज़दूर अपनी आवाज कम से कम उठा पाते हैं।
सरकार अगर वह चाहती तो आसानी से पता लगा सकती थी कि मज़दूरों को पत्थर क्यों उठाने पड़े, आग क्यों लगानी पड़ी। नियम यह है कि न्यूनतम मजदूरी हर पांच साल के बाद बढ़नी चाहिए लेकिन हरियाणा में यह मज़दूरी दस साल बाद बढ़ाई गई। उत्तर प्रदेश में पिछली बार 2012 में यह मज़दूरी बढ़ाई गई थी, यानी जब वहां ़गैर-भाजपा सरकार थी। कायदे से योगी सरकार को 2017 में आते ही इस मज़दूरी को बढ़ाना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। अब चौहद साल बाद उसने मज़दूरी बढ़ाई है, वह भी जब मज़दूर हिंसा पर उतर आए।
सरकार ने औद्योगिक श्रमिकों के लिए एक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाया है। इसके आंकड़ों के मुताबिक 2021 से 2026 के बीच में औद्योगिक श्रमिकों के लिए महंगाई 24.8 प्रतिशत की दर से बढ़ती रही। हरियाणा के गुरुग्राम में यह दर 27.9 प्रतिशत है, फरीदाबाद में 27.2 प्रतिशत है, उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद और नोएडा में महंगाई की यह दर 27.4 रही है। दिल्ली के मज़दूरों को भी यह स्थिति झेलनी पड़ी है। इसकी तुलना में हरियाणा में वेतन वृद्धि केवल 15 प्रतिशत हुई है। दिल्ली में यह बढ़ोतरी केवल 20 प्रतिशत के आसपास की गई। उत्तर प्रदेश में यह वृद्धि कभी भी 24 प्रतिशत से ऊपर नहीं गई। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार ने जानबूझ कर अपने ही बनाये नियमों का उल्लंघन करते हुए मज़दूरों को महंगाई बढ़ने की दर के मुकाबले काफी कम वेतन दिया।
जैसे ही ट्रम्प ने भारत द्वारा अमरीका को भेजे जाने वाले माल पर टैरिफ लगाए, वैसे ही फैक्ट्रियों को लगने लगा कि उन्हें किसी न किसी तरह उत्पादन की लागत कम करनी चाहिए। खाड़ी युद्ध के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से हालत और बिगड़ गई। मज़दूरों को उनकी पहले से ही कम तनख्वाहें देने में देरी की जाने लगी। एलपीजी सिलेंडर काले बाज़ार में चार हज़ार तक पहुंच गया। जिन गंदे कमरों में मज़दूर पहले ही बहुत बुरी हालत में रहते थे, उनके मालिकों ने किराया बढ़ा दिया। ठेलों-रेहड़ियों पर बिकने वाले पके-पकाए खाने के दामों में भी ज़बरदस्त उछाल आ गया।
मज़दूरों के मन में एक और बड़े कारण से नाराज़गी पक रही थी। नवम्बर, 2025 में सरकार ने नयी श्रम संहिता बनाई। उन्हें उम्मीद थी कि इसके कारण उनकी तनख्वाहें बढ़ेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी को बीस हज़ार रुपए का न्यूनतम वेतन समान रूप से देने का दावा अभी कल ही एक बार फिर ठुकरा दिया है। मज़दूरों का साफ तौर पर कहना है कि 26 सितम्बर, 2025 को केन्द्र सरकार ने दावा किया था कि इमारती काम में लगे, सफाई करने वाले, माल चढ़ाने-उतारने वाले अकुशल मज़दूर को 783 रुपए प्रति दिन यानी 20,358 रुपए प्रति माह का वेतन मिलेगा। जो चार श्रम संहिताएं बनाई गईं, उनमें मज़दूरों के काम के घंटों और उनके आराम के अधिकार के प्रति एक तरह की अस्पष्टता है। नवम्बर 2025 में बनी इन चार श्रम संहिताओं के अंतिम नियम आज तक प्रकाशित नहीं किये गये। इससे पहले का जो फैक्टरी एक्ट था, उसमें ये सब बातें स्पष्ट थीं, लेकिन उसका स्थान लेने वाली संहिताओं में ये बातें साफ नहीं हैं। सरकार कहती है कि वह इन बातों के बारे में अलग से अधिसूचना निकालेगी, लेकिन वह अधिसूचना कभी नहीं निकलती। इसका फायदा उठा कर कारखानेदार मज़दूरों का शोषण बेरोकटोक करते रहते हैं। मेरा मानना है कि सरकार अभी भी नहीं चेतेगी। नतीजतन, मज़दूरों को आंदोलन करना ही पड़ेगा। भारत के औद्योगिक हलके उबल रहे हैं। पिछले दस साल से भारत में किसी भी तरह के वेतनभोगी की तनख्वाह वहीं की वहीं रुकी है। ज़ाहिर है कि जब तक सत्ताधीशों की कुर्सी नहीं कांपेगी, तब तक तनख्वाहें भी आगे नहीं बढ़ेंगी।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



