वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन जिन्हें अध्ययन का जुनून था
चार्ल्स डार्विन को पशु-पक्षी, कीट-पतंगों और कीड़े-मकोड़ों में गहरी दिलचस्पी थी। उनका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। उनका घर सेवर्न नदी के किनारे था। उनकी रूचि के अनुरूप पक्षियों, कीटों इत्यादि की वहां भरमार थी। डार्विन को जब भी थोड़ा-बहुत वक्त मिलता वह नदी के किनारे खोज में निकल जाते। एक बार उन्होंने दुर्लभ कीड़ों के संग्रह का एक अभियान चलाया। एक दिन वह पुराने पेड़ों की छाल उखाड़-उखाड़कर कीड़े ढूंढ रहे थे। एक छाल के नीचे उन्हें दो भृंग मिले। उन्होंने एक-एक हाथ में एक-एक भृंग पकड़ लिए। तभी उनकी नज़र एक नये कीड़े पर पड़ी।
दोनों हाथों में तो भृंग थे अब कीड़ा किस में पकड़ें। उन्हें अचानक और कुछ न सूझा तो एक भृंग उन्होंने मुंह में डालकर खाली हाथ कीड़े की ओर बढ़ाया। इसी बीच मुंह के भृंग ने उनकी जीभ में काटा तो जीभ जल उठी। वह तिलमिला उठे। इसी तिलमिलाहट में मुंह का भृंग तो थूका ही, हाथ का भृंग भी छोड़ बैठे। उधर वह दुर्लभ कीड़ा भी आंखों से ओझल हो गया। इन तीनों को खो देने का दुख डार्विन को लंबे समय तक रहा और अपने अनुभवों की किताब में इस घटना का विस्तार से विवरण लिखा। चार्ल्स डार्विन का जन्म 1809 में रुस्वरी (इंग्लैंड) में हुआ। स्कूली शिक्षा में उन्हें सिर्फ रसायन विज्ञान ही पसंद आया।
उन्होंने लिखा भी है-‘शिक्षा के माध्यम के रूप में स्कूल में मेरे लिए कुछ नहीं था। मैंने वहां रसायन विज्ञान शास्त्रा पढ़कर और उससे संबंधित प्रयोग करके आनंदित होने के अतिरिक्त कुछ नहीं सीखा।’ डार्विन को प्रकृति बचपन से लुभाती थी। अपनी लगन, मेहनत और साहसिक प्रयोगों से डार्विन सबसे बड़े प्रकृति विज्ञानी बने। (उर्वशी)



