महाभारत का युद्धक्षेत्र तथा गीता की जन्मस्थली है कुरुक्षेत्र
आप विश्वास करें या नहीं किन्तु विश्व के आधे से अधिक धार्मिक विश्वास वाले लोग ऐसा मानते हैं कि इंद्रप्रस्थ (आज की नई दिल्ली) तथा हस्तिनापुर के अधिपतियों के मध्य कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का विशाल समर हुआ था जिसमें धर्म और अधर्म के प्रतीक स्वरूप पांडवों तथा कौरवों के भाग्य निर्णय के साथ ही वैभवपूर्ण साम्राज्य भारतवर्ष का भयंकर विनाश हुआ था।
ऐसी प्रागेतिहासिक घटना के स्मृति स्वरूप आज भी कई अवशेष कुरुक्षेत्र में बिखरे पड़े हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश का लोप हो चुका है फिर भी भारत की धर्म प्राण जनता ने अपनी श्रद्धा से प्रेरित पूजा अर्चना के द्वारा इन्हें जीवंत बना रखा है। पूजा अर्चना से सजीव बने पुण्य स्थल का अवलोकन करना है तो पहुंचें कुरुक्षेत्र।
कुरुक्षेत्र की पावन भूमि भारत की राजधानी नई दिल्ली से उत्तर की ओर हरियाणा में लगभग 150 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यह पुण्य क्षेत्र थानेसर और पिपली कस्बे के चतुर्दिक फैला है जिसका क्षेत्रफल सवा सौ कि.मी. से अधिक है। महाभारत के युद्धक्षेत्र और गीता की जन्मस्थली कुरुक्षेत्र में देश-विदेश से लाखों तीर्थ यात्री स्नान और पूजन के लिए आया करते हैं।
वर्तमान हरियाणा राज्य में स्थित यह क्षेत्र ज़िला पानीपत, जींद तथा पश्चिम में पटियाला से लेकर पूरब में यमुना नदी तक फैला है। कुरुक्षेत्र की परिधि में प्राचीन संस्कृति में संबंधित महाभारतकालीन अनेक पवित्रा स्थल, मंदिर, सरोवर तथा अवशेष विद्यमान हैं। पौराणिक गं्रथों में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र का संबोधन दिया गया है जो युगांतरकारी न्यायप्रियता का प्रतीक माना जाता है। इस पावन भूमि के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के नाम से इसे ब्रह्मक्षेत्र भी कहा जाता है। प्राचीन ग्रंथों तथा वेदों में भी मनुस्मृति से भी पावन सरिता सरस्वती का उल्लेख मिलता है जो यहां प्रवाहित होती है। यही महाभारत तथ पौराणिक धर्मग्रंथों के रचयिता वेदव्यास की जन्मभूमि और कर्मस्थली रही है।
वर्तमान समय में कुरुक्षेत्र के मुख्य तीर्थों में ब्रह्म सरोवर, सन्निहित सरोवर, ज्योतिसर बाणगंगा, अमीन, थनेसर, नाभिकमल, पेहोवा, सफीदों आदि हैं।
ब्रह्म सरोवर
कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर यहां आने वाले यात्रियों का प्रमुख आकर्षण केंद्र है। पवित्र जल से भरा यह सरोवर लगभग 13 सौ मीटर लम्बा तथा 650 मीटर चौड़ा है। यहां पर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सर्वप्रथम तप किया था। अतएव यह सरोवर अति पवित्र माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इस सरोवर का निर्माण महाभारत युद्ध से पहले महाराज कुरू ने करवाया था।
अब स्नान और पूजा की सुविधा के लिए सरोवर में घाट व बारहदरी का निर्माण कराया गया है। सरोवर के मध्य में छोटे-बड़े द्वीप हैं जिन पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मंदिर हैं। मंदिर तक जाने के लिए सेतु से रास्ता बनाया गया है। सरोवर के निकट अब अनेक मठ, मंदिर और धर्मशालाओं का निर्माण हुआ है।
सन्निहित सरोवर
यह सरोवर कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर से आकार में छोटा होते हुए भी इसका महत्त्व कम नहीं है। करीब एक सौ पचास मीटर लम्बा तथा सवा सौ मीटर चौड़ा सन्निहित सरोवर ध्रुव नारायण तथा श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के लिए सुप्रसिद्ध है। सूर्यग्रहण के अवसर पर आए तीर्थ यात्री पहले यहां स्नान करते हैं। सन्निहित का अर्थ है। सभी तीर्थों का मिलान। प्रसंग के अनुसार ऐसी मान्यता है कि अमावस्या को विशेषकर सोवती अमावस को सारे देवता यहां आकर निवास करते हैं। इस अवसर पर यहां पूजन और स्नान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
ज्योतिसर
वर्तमान कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से 7 कि.मी. दूर पेहोवा रोड के साथ स्मृति शेष पौराणिक नदी सरस्वती के किनारे पर स्थित है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है-ज्योतिसर अर्थात ज्योति का सरोवर अथवा स्रोत। महाभारत काल में इसी स्थान पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को महान जीवन दर्शन से युक्त गीता का उपदेश दिया था। यहां पर चार सौ मीटर लम्बा और दो सौ मी. चौड़ा सरोवर पुरातन वट-वृक्ष (जिसे अक्षयवट कहते हैं), और पुराना शिव मंदिर है। यहां आदि शंकाराचार्य भी पधारे थे और गीता दर्शन का मनन चिंतन किया था। आदि शंकराचार्य मंदिर में नरवाना नहर से सदैव निर्मल जल प्रवाहित होता रहता है।
बाणगंगा
कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर से दक्षिण में 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित बाणगंगा है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में घायल हुए भीष्म पितामह यहीं शरशैय्या पर पड़े थे, उन्हें प्यास लगी। तभी महान धनुर्धर अर्जुन ने बाणों से धरती में छेद कर पाताल गंगा से धारा लाकर पितामह की प्यास बुझाई थी। यही बाणगंगा सरोवर के रूप में विद्यमान है।
थानेसर
थानेसर कस्बा अब कुरुक्षेत्र नगर का ही एक भाग है। यह अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है। यहां सरोवर और शिव मंदिर दर्शनीय है। ऐसा विश्वास है कि थानेसर सरोवर में स्नान कर शिव पूजन करने से अनेक रोग दूर हो जाते हैं।
अमीन
कुरुक्षेत्र के क्षेत्र में स्थित अमीन एक अति प्राचीन ग्राम है। यह नाम अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का अपभ्रंश रूप है। ऐसा कहा जाता है कि वीर अभिमन्यु ने इसी स्थल को महाभारत के चक्रव्यूह का भेदन किया था। इसलिए अब भी इस स्थान को अभिमन्यु खेड़ा कहा जाता है। यह गांव थानेसर से आठ किलोमीटर दक्षिण पूर्व में एक टीले पर बसा हुआ है।
कुरुक्षेत्र में उपर्युक्त पुरातन स्थलों के अतिरिक्त आधुनिक समय में कई नये निर्माण भी हुए हैं जो दर्शनीय हैं। इनमें गीता मंदिर, गीता भवन और कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय का विशाल परिसर उल्लेखनीय हैं। इस प्रकार ‘धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र’ में अब प्राचीन और अर्वाचीन का सुंदर संगम देखने को मिलता है। (उर्वशी)





