आत्म-चिन्तन की ज़रूरत

पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मात्र 10 महीने का समय शेष रह गया है। ऐसे समय में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के 7 सांसदों द्वारा पार्टी को छोड़ कर भाजपा में जाने की घोषणा से नि:संदेह ‘आप’ को एक बार तो बड़ा झटका लगा है। मात्र 13 वर्ष से अस्तित्व में आई इस पार्टी ने अब तक अनेक तरह के उतार-चढ़ाव देखे हैं। शुरू से ही इसे दिल्ली में भारी समर्थन मिलता रहा है और यह तीन बार वहां सरकार बनाने में सफल रही थी। चाहे  ज्यादा समय तक यह राजधानी में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोक सकने में सफल रही थी, परन्तु पिछले वर्ष वहां के चुनाव में इसे हार का मुंह देखना पड़ा था। पंजाब के अतिरिक्त कई अन्य राज्यों में समय-समय पर हुए चुनाव के दौरान पार्टियों को मिली जीत और मत प्रतिशत के कारण इसे राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता मिल गई थी। इसके साथ ही वर्ष 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में इसे बेमिसाल समर्थन मिला था। आज यहां उसके 94 विधायक हैं और कांग्रेस बड़े अन्तर से इसके बाद दूसरी पार्टी के रूप में ही विचरण कर रही है।
जब पिछले विधानसभा चुनाव में एक तीसरे विकल्प के रूप में यह पार्टी मैदान में उतरी थी, तो उस समय इस नए विकल्प के रूप में इसे पंजाबियों का बेमिसाल समर्थन मिला था। चुनावों से पहले जो वायदे और दावे इसने किए थे, उसने बहुत उम्मीदें जगाई थीं। आम लोगों को बिजली मुफ्त देना, आम आदमी क्लीनिकों का प्रसार करना और पिछली सरकारों की मुफ्त की योजनाओं को उसी तरह जारी रखने का इस पार्टी को भारी लाभ मिला था और मिल भी रहा है, चाहे इससे सरकार का वित्तीय बोझ भी बहुत बढ़ा है। सरकार को पिछली कई सरकारों की भांति ही अपने ऐसे खर्चों की पूर्ति के लिए और नई योजनाओं को लागू करने के लिए बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है। दूसरी तरफ सरकार के पक्ष में लाभार्थियों का एक वर्ग भी सरकारी नीतियों के पक्ष में खड़ा होता प्रतीत होता है। इसके साथ ही सरकार द्वारा आम वर्ग की महिलाओं को 1000 रुपये और अनुसूचित जातियों और अनुसूचित कबीलों की महिलाओं को 1500 रुपये प्रति माह देने की नीति भी लागू करने की तैयारी की जा रही है। अब तक ऐसी योजनाएं अलग-अलग राज्यों में लोगों को आकर्षित करती रही हैं। पंजाब में भी ऐसा हो सकता है। नशों के विरुद्ध आरम्भ की लड़ाई और अमन-कानून की स्थिति को सुधारने के लिए भी पिछले समय में सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं परन्तु इन रास्तों पर अभी लम्बे समय तक सफर तय करना शेष है, परन्तु नि:संदेह पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों द्वारा एकजुट होकर भाजपा में जाने की घोषणा ने जहां पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, वहीं पार्टी कतारों में भी इस कारण बड़ी हलचल दिखाई देने लगी हैं। विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने यह और अनेक अन्य मामलों को लेकर सरकार की आलोचना तेज़ कर दी है।
आगामी समय में हुए इस बड़े नुकसान की पूर्ति पार्टी द्वारा किस प्रकार की जा सकेगी, इसके लिए पार्टी के भीतर गम्भीर चर्चा भी शुरू हो गई है और यह भी कि इस पड़ाव पर आकर पार्टी नेतृत्व को रह गई बड़ी कमियों के प्रति भी गम्भीर आत्म-चिन्तन की ज़रूरत होगी। आगामी महीने में सभी राजनीतिक पार्टियां पूरी तैयारी से चुनाव मैदान में उतरी दिखाई देंगी, उनकी ओर से सरकार की जांच-पड़ताल और भी अधिक की जाने लगेगी। इसके साथ ही राजनीतिक मंच पर कई नए गठबंधन भी सामने आएंगे, जिनके अपने-अपने प्रभाव को भी नकारा नहीं जा सकेगा। इस स्थिति के संदर्भ में अब देखना यह होगा कि आम आदमी पार्टी पैदा होने वाली इन चुनौतियों से कैसे और कितने प्रभावशाली ढंग से निपटती है।  

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

#आत्म-चिन्तन की ज़रूरत