लू और भीषण गर्मी से तप रहा उत्तर भारत 

देश के कई राज्यों में गर्म हवाओं ने अप्रैल माह में ही तापमान को 45 डिग्री के पार पहुंचा दिया है। मौसम की जानकारी देने वाली एक निजी एजेंसी के अनुसार इसका मुख्य कारण केवल सामान्य मौसमी बदलाव न होकर वह उष्मा का बन जाने वाला छत्रीनुमा गोला है, जो आधे भारत के राज्यों पर मंडरा रहा है। इस समय दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना में गर्मी एकाएक बढ़ गई है। इस प्राकृतिक स्थिति को उष्मा का क्षत्रप (हीट डोम) या गुंबद कहा जा रहा है। यह क्षत्रप तब बनता है, जब वायुमंडल में उच्च दबाव की एक प्रणाली लम्बे समय तक किसी एक क्षेत्र में ठहर जाती है। दरअसल यह एक बर्तन के ढक्कन की तरह गर्म हवा को नीचे धरती की तरफ  दबाए रखती है, जो तेज़ गर्मी का कारण बन जाती है। परिणामस्वरूप ऐसे क्षेत्रों में तापमान खतरनाक ढंग से बढ़ जाता है और कई दिनों या हफ्तों तक भीषण गर्मी या लू की स्थिति बनी रहती है। गर्मी की इस प्रचंड स्थिति को वैश्वि तपिश का कारण बताया जा रहा है।   
भारतीय मौसम विभाग के ताज़ा पूर्वानुमान ने इस संकट के और बढ़ने के संकेत दिए हैं। अगले कुछ दिनों में उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के ज्यादातर हिस्सों में गर्म हवाएं चलने की आशंका है। इस बार गर्मी का मिज़ाज इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई तटीय इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में नमी वाली गर्मी यानी उमस का असर भी देखने में आ रहा है। इससे लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। आजकल आधे भारत में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया है, जो लोगों को पस्त कर रहा है। अतएव हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहां तापमान औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पांच दिन तक यही स्थिति यथावत बनी रहे तो इसे ‘लू’ यानी गर्मी का गोला कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आंकड़ो के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएं आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे अधिक गर्मी व लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्संबंध होता है।
धूप और लू के इस जानलेवा संयोग से कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है, तो लू का असर कम करने के इंतजाम भी किए जाते हैं। दरअसल लू सीधे दिमागी गर्मी को बढ़ा देती है। अतएव इसे समय रहते सामान्य नहीं किया तो यह बिगड़ा अनुपात व्यक्ति के लिए बेहत हानिकारक हो सकता है। 
बाहरी तापमान जब शरीर के भीतरी तापमान को बढ़ा देता है तो हाइपोथैलेमस तापमान को संतुलित बनाए रखने का काम नहीं कर पाता। नतीजतन शरीर के भीतर बढ़ गई अनावश्यक गर्मी बाहर नहीं निकल पाती है, जो शरीर में लू का कारण बन जाती है। इस स्थिति में शरीर में कई जगह प्रोटीन जमने लगता है और शरीर के कई अंग एक साथ निष्क्रियता की स्थिति में आने लग जाते हैं। ऐसा शरीर में पानी की कमी के कारण भी होता है। दोनों ही स्थितियां जानलेवा होती है। इस स्थिति में बुखार उतारने वाली साधारण गोलियां काम नहीं करती हैं, क्योंकि ये दवाएं दिमाग में मौजूद हाइपोथैलेमस को ही अपने प्रभाव में लेकर तापमान को नियंत्रित करती हैं, जबकि लू में यह स्वयं शिथिल होने लग जाता है।
हवाएं गर्म हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और वैश्विक तपिश का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाशीय गर्मी से आएगी। जिस आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, परंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पांचवां तत्व यूं ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि आकाश तत्व की उत्पत्ति नहीं हुई होती तो संभवत: आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वाय, ये चारों तत्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। 
प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की ज़रूरत है, क्योंकि हम देख रहे कि कुछ एकाधिकारवादी देश भूमंडलीकरण का मुखौटा लगाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से ओज़ोन परत में छेद को चौढ़ा करने में लगे हुए हैं। यह छेद जितना विस्तृत होगा वैश्विक तापमान उसी अनुपात में अनियंत्रित व असंतुलित होगा। इस बढ़े तापमान का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों में पड़ेगा, वहां खेत बंजर हो जाएंगे। गर्मी के कारण मावेशियों और वनजीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जो लोग अभावग्रस्त हैं, उन पर भी गर्म हवाओं का विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2020 में किए गए एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ था कि जलवायु परिवर्तन और पानी का अटूट संबंध है। उस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ं की कीमत प्रत्येक वर्ष चुकानी पड़ेगी। दरअसल वायुमंडल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड महासागरों में भी अवशोषित होकर गहरे समुद्र में बैठ जाती है। यह वर्षों तक जमा रहती है।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के मुताबिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड से लबालब हो गया है। नतीजतन अब यह समुद्र इसे अवशोषित करने की बजाय वायुमंडल में ही उगलने लग गया है। अगर इसे जल्दी नियंत्रित नहीं किया गया तो वायुमंडल का तापमान तेज़ी से बढ़ेगा, जो न केवल मानव प्रजाति, बल्कि सभी प्रकार के जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए हानिकारक होगा।

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