साईबर ठगी के विरुद्ध सतर्कता ज़रूरी

पंजाब में साईबर ठगी के ज़रिये जन-साधारण और खासकर महिलाओं और वरिष्ठ जनों से लाखों-करोड़ों रुपये की लूट किये जाने की घटनाओं में निरन्तर घटित होती घटनाओं ने एक ओर जहां सरकार और प्रशासन को चौंकाया है, वहीं ऐसे अपराधों की रोकथाम हेतु जागरूकता की आवश्यकता पर भी बल दिया है। ऐेसी एक ताज़ा घटना लुधियाना की है जहां एक कारोबारी से अतिरिक्त लाभ का झांसा देकर 20 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी कर ली गई। इस ठगी के अन्तर्गत व्यवसायी व्यक्ति से जीवन भर की कमाई लूट ली गई। यह ऐसा कोई पहला अपराध नहीं है। देश और समाज में आज ऐसे अपराधों की नित्य नई घटना सुनने को मिलती है। नि:संदेह ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सरकारों और प्रशासन पर दबाव रहता है, किन्तु इस हेतु आम लोगों में इस संबंधी चेतना का जागृत किया जाना भी बहुत ज़रूरी प्रतीत होता है। इसका आभास पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की इस टिप्पणी से भी मिल जाता है कि ‘आश्चर्य होता है जब हम ऐसी सूचनाएं पढ़ते हैं कि पढ़े-लिखे और शिक्षित वर्ग के लोग भी डिजीटली अरेस्ट जैसे मामलों का आसानी से शिकार हो जाते हैं।’ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय साईबर अपराध और खासकर डिजीटल अरेस्ट संबंधी मामलों को लेकर स्वत: संज्ञान वाली सुनवाई कर रहा था।
मौजूदा घटना बेशक डिजीटली अरेस्ट जैसा मामला नहीं है, किन्तु इसका भी एक पक्ष ऐसा है जहां शिकार बने व्यक्ति से जागरूक होने अथवा लालच में न फंसने की अपेक्षा की जानी चाहिए थी। ठगों ने पहले तो उन्हें अधिक राशि देने का लालच देकर उनसे करोड़ों रुपये का निवेश करवा लिया। फिर व्यवसायी द्वारा अपने पैसे वापिस मांगने पर ठगों द्वारा उनसे और भी करोड़ों रुपये भिन्न-भिन्न करों के नाम पर विभिन्न खातों में डलवाये गये। जांच के दौरान ठगों के द्वारा संचालित 15 बैंकों के ऐसे 76 खाते पाये गये। पंजाब पुलिस के एक बड़े अधिकारी के भी ऐसे एक मामले में ठगे जाने का मामला काफी चर्चित हुआ था। यह मामला भी जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी की पुष्टि करता है। जिन लोगों के कंधों पर ऐसे अपराधों को रोकने और ऐसे ठगों को काबू किये जाने का दारोमदार है, यदि वे स्वयं ही ऐसे मामलों का शिकार होने लगेंगे, तो आश्चर्य होगा ही। जालन्धर में भी पिछले वर्ष ऐसी एक घटना हुई थी जब साईबर ठगी के ज़रिये एक महिला से डेढ़ करोड़ रुपये लूट लिये गये थे। क्रिप्टो करेंसी के नाम पर व्यापार का झांसा देकर लूटने के कई मामले भी सामने आ चुके हैं।
हम समझते हैं कि बेशक साईबर ठगी के धरातल पर सक्रिय लोग जन-साधारण से कहीं अधिक चतुर और चालाक होते हैं, किन्तु ऐसी ठगी का शिकार होने वाले जब करोड़ों रुपये धीरे-धीरे कर ठगों खातों में डालते हैं, तब किसी एक चरण पर तो अवश्य ठहर कर उन्हें सोचना चाहिए, कि कोई उन्हें बिना परिश्रम किये, इतना लाभ क्यों दे रहा है? फिर यह भी, कि यदि अपना धन वापिस लेने के लिए भी उनसे लाखों-करोड़ों रुपये की अतिरिक्त राशि की मांग की जा रही है, तो कहीं पर तो कोई ब्लैक स्पॉट अवश्य होगा जहां उन्हें धकेला जा रहा है। स्थितियों का त्रासद पक्ष यह भी है कि ऐसे अधिकतर मामलों में शिकार होने वाले लोग बाकायदा पढ़े-लिखे, वरिष्ठ जन हुए हैं। कुशल व्यवसायी और ऊंचे पदों से रिटायर हुए लोग भी ऐसे मामलों का शिकार हुए हैं जिनसे प्राय: समझदारी वाला निर्णय किये जाने की अपेक्षा होती है।
ऐसे मामलों में सुरक्षा के लिए कुछ बातों का ज्ञान होना अत्यावश्यक होता है जिनमें प्रमुख यह जान लेना काफी है कि डिजीटली अरेस्ट जैसी धारा अथवा कोई मामला भारतीय कानूनों में कहीं होता ही नहीं। दूसरी बात यह भी कि बैंकों द्वारा दी जाती वार्षिक ब्याज दर से अधिक खास तौर पर राशि दोगुणा करने जैसा ब्याज देने का कोई दावा करता है, तो नि:संदेह यह दावा ठगों का ही हो सकता है। इससे निवेश करने वाले को झट से समझ जाना चाहिए कि मामला संदिग्ध है। अपने बैंक खाते बारे जानकारी देना तो स्पष्ट रूप से ठगी को न्यौता देने जैसा है। सबसे बड़ी बात यह भी, कि मोबाइलों के ज़रिये बने सम्पर्कों पर लाखों-करोड़ों रुपये दूसरों के बैंक खातों में डालना तो वैसे ही अन्धे कुएं में छलांग लगाने जैसा है। ऐसे में, हम समझते हैं कि बेशक सरकारें प्रशासनिक तंत्र और बैंक अधिकारी-विशेषज्ञ अपने-अपने तौर पर ठगी के ऐसे तंत्र के विरुद्ध प्रयासरत रहते हैं, किन्तु ऐसे मामलों में लोगों का स्वयं जागरूक और जानकार होना बहुत ज़रूरी है। बैंक अक्सर इस संबंधी जनकारी देते भी रहते हैं। हम समझते हैं कि ऐसी थोड़ी-सी जागरूकता अपना कर लोग ऐसे ठगों से अपनी सुरक्षा कर सकते हैं।

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