परफेक्शनिस्ट

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

धीरे-धीरे दोनों के बीच ज़रूरत भर की बातचीत रह गई। रवि को ऐसा लगने लगा था कि राशि को ये सफाई करने की मानसिक बीमारी है तभी तो गीले टॉवेल को टेबल या बेड पर रखा देख कर राशि आग बबूला हो जाती है। बच्चे भी इसी उसकी इसी सफाई की सनक के चलते अपनी मम्मी से एक निश्चित दूरी बना चुके थे।
यहां के चलन के अनुसार ही पंद्रह बरस की उम्र से दोनों बच्चे पढ़ाई के साथ काम करने लगे थे। दोनों थक-हार कर जब घर लौटते तो अपनी बुक्स, बैग, जूते, कपड़े सब अस्त-व्यस्त छोड़ देते। अल सुबह उनके कमरे में घुसते ही वह दोनों पर इतना खीजती कि धीरे-धीरे बच्चों ने भी उसके इस व्यवहार को चुपचाप एक्सेप्ट कर लिया। 
‘चलो वॉक के लिए चलते हैं। फिर पड़ोस के कॉफी पार्लर से कॉफी भी पीकर आ जाएंगे।’ मैंने रवि को कहा रवि को डिनर के बाद वॉक और कैपैचीनो कॉफी बहुत पसंद है। अभी तक तो घर-ऑफिस की व्यस्तता के चलते वह कभी रवि के साथ निकल ही नहीं पाती थी।
‘राशि अभी नहीं। मैं थोड़ा बिजी हूँ।’ कह रवि ने फिर लैपटॉप में आंखें गढ़ा लीं।
‘रवि तुम्हें तो...।’
रवि ने प्रश्नवाचक मुद्रा से उसे देखा और बाहर विंडी वेदर का बहाना बना कर चुप हो गया। उसकी आंखों में एक गहरा मौन पसरा हुआ था। सूनी मौन आंखें!
‘रवि प्लीज चलते हैं न। मेरा भी मन है।’ उसने उसे मनाने के अंदाज में कहा तो रवि एकाएक फट पड़े।
‘राशि मेरे पास इन सबके लिए टाइम नहीं है। राइट नाऊ आय एम बिजी। तुम्हारे सारे काम हो गये मैम परफेक्शनिस्ट?’
‘रवि! क्या हुआ तुम्हें? छोड़ो! नहीं चलते कहीं। बट प्लीज डोंट गेट इरिटेटेड लाइक दिस। घर में ही कॉफी बना कर पी लेते हैं।’
‘राशि साल भर पहले ही से मैंने कॉफी के शौक को तिलांजलि दे दी है। हां तुम्हें कैसे पता होगा? तुम तो...।’
‘रवि! रवि! स्टॉप इट। मैंने अपनी पूरी लाइफ का एक-एक पल तुम्हारे घर के लिए दिया है।’
‘हाँ मैं भी तो यही कह रहा हूँ। घर के लिए ही, घरवालों के लिए...।’
‘रवि!’ उसके दिमाग की नसें झनझना उठीं। अंदर एक झंझावात उठा और सब कुछ चारों ओर घूमता सा अनुभव हुआ कानों में रवि की आवाज...मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता मैम परफेक्शनिस्ट...ओह! यह क्या हो गया? इतने बरस साथ-साथ में बिताने के बाद भी वह रवि के अंदर के बवंडर को नहीं जान पाई।
बाहर तेज हवाएं ऊंचे-ऊंचे पेड़ों को झंझोड़े दे रही थी! घर के खिड़की-दरवाजे खड़खड़ा रहे थे। आज विंडी वेदर के साथ तूफानी मौसम का ऑरेंज अलर्ट था। ऐसे मौसम में रवि कहां निकल गया। मन जोरों से धड़कने लगा।
तेज हवा से घर के बाहर लगा यूकेलिप्टस बहुत भयावह अंदाज में झूम रहा था मानो किसी भी क्षण धराशायी हो जाएगा। ऐसे मौसम में अक्सर ये पेड़ टूट कर गिर जाते हैं फिर भी न जाने क्यों यहां लोगों ने घर के बाहर इन्हें लगाया हुआ है। रवि के मना करने पर भी उसने घर के सामने यह पेड़ लगा दिया था। तभी रवि ने हंसते हुए कहा भी था ‘जानती हो इसे यहां के लोग ‘विडो मेकर ट्री’ भी बुलाते हैं।’ और मैंने हंस कर टाल दिया था।
लेकिन उसे आज यह सब क्यों याद आ रहा था?
‘हे ईश्वर क्या करूं?कहां जाऊं? इस समय कहां गये होंगे रवि?’ उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
‘रवि! रवि!’ पुकारती हुई वह दरवाजे तक पहुंची कि धुंधलाये शीशे में से सड़क से उसके घर की ओर आती हुई एक आकृति दिखलाई दी। और अगले ही पल सामने लगा पेड़ जोरों की आवाज के साथ जमीन पर था। मौसम इतना खराब था कि वह चाह कर भी बाहर नहीं जा सकती थी। उसने कांपते हाथों से मोबाइल पर रवि का नंबर डायल किया। रिंग जा रही थी लेकिन कोई जवाब नहीं। तीसरी बार में समझ में आया कि रवि का मोबाइल तो पिछले रूम में बज रहा है। कुछ देर में बारिश थमने पर हिम्मत कर बाहर निकली। दूर से कार की हेड लाइट नज़दीक आती दिखी। घर के पास आकर टैक्सी रूकी। 
दो कप कॉफी हाथ में लिए हुए रवि टैक्सी से उतरा।
‘राशि इस आंधी-तूफान में तुम बाहर क्यों खड़ी हो?’ 
‘ओह रवि! आय एम सॉरी।’
‘नो डियर इट वाज माय फॉल्ट। मैंने ही ओवर रिएक्ट किया। इसलिए सोचा क्यों न गरमागरम कॉफी के साथ माफी मांग लूँ।’
और मैं रवि की बांहों में सिमटी उसके प्यार भरे स्पर्श को महसूस कर रही थी। मौसम भी धीरे-धीरे साफ हो रहा था। (सुमनसागर)
(समाप्त)

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