एआई के दौर में बदलता हास्य का एल्गोरिद्म

हर साल मई के पहले रविवार को वर्ल्ड लाफ्टर डे मनाया जाता है। इस साल यह 3 मई 2026 को पड़ रहा है। हास्य दिवस हमें इस बात की याद दिलाता है कि हंसी सिर्फ एक भाव नहीं बल्कि सामाजिक ऊर्जा भी है। एक ऐसी ताकत जो तनाव, विभाजन और भय को दूर कर देती है लेकिन इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में सब चीजें वैसी ही नहीं रहीं, जैसी हम उन्हें जानते थे। हास्य में भी एआई ने जबर्दस्त हस्तक्षेप किया है। आज का हास्य सिर्फ इन्सानी अनुभव नहीं है बल्कि एक खास तरह का एल्गोरिद्म है, डेटा और मशीन लर्निंग का मिला-जुला रूप है। यही वजह है कि आज का हास्य एआई के कारण न केवल तेज बल्कि ज्यादा मायने में व्यक्तिगत और अधिक वैश्विक या कभी कभी अधिक विवादास्पद भी बन जाता है। 
आज एआई टूल्स चाहे वह टेस्क्ट जनरेटेड हो, ने हास्य को कहीं ज्यादा लेकतांत्रिक बना दिया है। पहले स्टैंडअप कामेडी या व्यंग्य लेखन एक विशेष कौशल माना जाता था लेकिन आज यह कौशल नहीं बल्कि प्रॉम्प्ट्स बनकर रह गया है। आप चैटजीपीटी या किसी भी लार्ज लैंग्वेज मॉडल को कुछ संकेत करिये, वो पलभर में आपको चुटकुले, मीम्स या व्यंग्यात्मक लेख तैयार करके दे देंगे। इसका एक सकारात्मक पहलू भी है कि छोटे शहरों, कस्बों और गैर-अंग्रेजी भाषाओं में भी हंसने की नई-नई विधाएं, नई-नई आवाजें उभर रही हैं। भारत में तो विशेषकर भोजपुरी, हरियाणवी और मराठी में एआई मीम्स हिंदी और अंग्रेजी से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हो रही हैं लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है, कि जब हर कोई हास्य बना सकता है, तो भला हंसने की जरूरत कहां रहती है? अगर हंसना कोई खास गुण नहीं है, तो कोई दूसरे के हंसाने पर क्यों हंसे? दअरसल एआई ने सारा संकट यही पैदा कर दिया है। कॉपी पेस्ट कॉमेडी का खतरा बढ़ चला है। अगर आप गौर से सुनें तो एक हजार चुटकुलों में शायद ही दो-चार ऐसे आपको मिलें, जिन्हें आपने पहले कभी न सुना हो। 
दरअसल हास्य का यह मशीनीकरण बहुत गहरे अर्थों में आज नहीं तो कल हमें हास्य से धीरे-धीरे दूर कर देगा। मशीन चाहे जितना बढ़िया हास्य भाव या हास्य रस पैदा कर ले, हम इन्सान कभी संतुष्ट ही नहीं होंगे, न ही कभी उसे किसी तरह का रचनात्मक कर्म मानेंगे। जब हम मौलिक या मानवीय हास्य से दो-चार होते हैं, तो उसे एक प्रोडक्शन भर नहीं मानते बल्कि एक ऐसा खास ईश्वरीय वरदान मानते हैं, जो किसी-किसी को मिलता है। इसलिए हम उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं, उसके प्रति रोमांच रखते हैं और उसका सही मायनों में दिल से आनंद लेते हैं। लेकिन जब यही हास्य एआई जनरेटेड हो जाता है, तो एक पल को हमें हंसी भी आ जाती है तो वह हंसी भी मशीनी होती है। इसकी सबसे बड़ी खामी या कमजोरी यह होती है कि हमारे दिमाग में उस समय भी चलता रहता है कि यह मशीन द्वारा रचित हंसी है। मशीन के हास्य को हम किसी की प्रतिभा या गॉड गिफ्ट मानने के लिए तैयार नहीं होते। इसलिए वह हमारे कुछ पल को मूड भले बदले, न तो रोमांचित करती है और न आह्लादित। 
हास्य की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एक बड़ा प्रभाव यह भी है कि इसने हंसने की समूची प्रक्रिया का ‘पर्सनलाइजेशन’ कर दिया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हमारे व्यवहार, हमारी पसंदगी-नापसंदगी और हमारे देखने के ढंग पर इतनी बारीक निगाह रखता है कि जब वो हमें हास्य परोसता है, तो वह वही हास्य होता है जिस पर हम हंसते हैं, लेकिन यह शुरू-शुरू में तो हंसाती है, बाद में यह एक ही जैसी हास्य स्थितियां हास्यास्पद हो जाती हैं। आजकल फेसबुक में देखने को मिलता है कि एक कुत्ता अपने हाथ में माइक लिए रिपोर्टर की तरह किसी दूसरे कुत्ते, बंदर या ऐसे ही किसी जानवर से सवाल करता है और बदले में दूसरा जानवर व्यंग्यात्मक और हास्य पुट वाला जवाब देता है। शुरू-शुरू में तो यह सब खूब आकर्षित करता था, लेकिन अब बोर करने लगा है। शुरू में ऐसे शॉर्ट वीडियोज को लाखों की तादाद में लाइक मिलते थे, आज मुश्किल से हजारों तक ही मिलते हैं।
कहने का मतलब यह है कि एआई ने हास्य के क्षेत्र में खतरा पैदा कर दिया है कि हम किसी भी तरह से हास्य को देख कर, सुन-सुन कर ऊब रहे हैं। कहने का मतलब यह कि एआई का हास्य जितनी तेजी से आकर्षित करता है, उतनी ही तेजी से हमें विकर्षित भी करता है यानी मोहभंग भी उसी रफ्तार से होता है। एआई हमें एक खास तरह के ‘इको चैंबर’ में कैद कर देती है और आदमी की खासियत यह है कि वह किसी भी एकरसता से ऊब जाता है, चाहे फिर एकरसता उसकी कितनी ही पसंद की क्यों न हो। हास्य व्यंग्य के सामने एआई ने यही सबसे बड़ा खतरा पैदा कर दिया है कि थोक के भाव में जब किसी किस्म का हास्य तैयार होगा, तो वह कितने दिनों तक हंसा पायेगा या उसके हंसाने में कितने दिनों तक ताजगी रह पायेगी। आज के दौर का सबसे लोकप्रिय हास्य माध्यम मीम है। एआई ने मीम निर्माण को इतना मशीनीकृत कर दिया है कि कोई घटना घटती नहीं कि कुछ ही मिनट में हजारों, लाखाें मीम्स तैयार हो जाते हैं। शुरू-शुरू में इस कौशल ने ज़रूर रोमांचित किया था क्योंकि उसके पहले इन्सान की रफ्तार इतनी तेज नहीं थी, लेकिन आज यह कौशल रोमांच पैदा नहीं कर रहा बल्कि कुछ ही देर में उबाने लगता है। 
आज सोशल मीडिया में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प, ईरान के तमाम नेता, इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू, रूस के राष्ट्रपति पुतिन, चीन के शी जिन पिंग आदि के ईरान-अमरीका-इज़रायल युद्ध में लाखों की तादाद में मीम्स तैरते रहते हैं। पहले एक-दो दिन तो इन्होंने ध्यान खींचा था और मुस्कान भी बिखेरी थी, लेकिन अब ये उबाने लगे हैं। एआई के हस्तक्षेप का हास्य में सबसे बड़ा खतरा यही है कि जो रचनात्मक विधा सदियों-सदियों से हमेशा लोगों को आकर्षित कर रही थी, उन्हें जीवंत बनाये रखती थी, अब उससे भी मन ऊबने लगा है। एआई का हास्य के क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा यही है कि यह इसे मृत हास्य बना देगी। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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