युद्ध के गहराते बादल

दो महीने पहले अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के कारण विश्व भर में अभी भी बेहद उलझन भरी स्थिति बनी हुई दिखाई दे रही है। रूस, चीन, खाड़ी देशों के साथ-साथ पाकिस्तान और तुर्की द्वारा किए गए यत्नों के बाद दोनों देशों के प्रतिनिधियों की विगत अवधि में इस्लामाबाद में हुई बैठक में कोई परिणाम नहीं निकल पाया था। उसके बाद पुन: हुए बड़े यत्नों के उपरांत भी दोनों देशों की दूसरी बैठक सफल नहीं हुई। इस युद्ध में ईरान का प्रत्येक पक्ष से बहुत बड़ा नुकसान हो चुका है परन्तु उसकी ओर से युद्ध के दौरान 6 पड़ोसी खाड़ी देशों में अमरीका के स्थापित सैन्य ठिकानों पर भी हमले किए गए थे, जिस कारण ये देश दहशत में आ गए  हैं। खाड़ी देशों द्वारा बड़ी मात्रा में तेल का उत्पादन बंद कर दिया गया है। होर्मुज़ जल मार्ग की ईरान द्वारा पूरी नाकाबंदी किए जाने के कारण इस मार्ग से जहाज़ों का गुज़रना लगभग बंद हो चुका है, नाकाबंदी अभी तक जारी है।
दूसरी तरफ अमरीका ने ईरान की बंदरगाहों की नाकाबंदी की हुई है, जिससे वह तेल निर्यात करने में असमर्थ हो गया। जो इस समय उसके लिए बड़ी चिन्ताजनक बात सिद्ध हो रही है। समझौते की धाराओं को लेकर ईरान के नेताओं में भी बड़े मतभेद पैदा होने के समाचार हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, संसद के स्पीकर मुहम्मद बाघेर गालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अराघची को हटाने   के लिए बज़िद हो गए हैं और उन पर आरोप लगा रहे हैं कि वह इस्लामी रैव्यूलेशन गार्ड के दबाव में आ गए हैं और इसके कमांडर अहमद वाहिदी के सहायक के रूप में काम करने लगे हैं। दूसरी ओर अमरीका भी इस मामले पर बड़ी दुविधा में फंसा दिखाई देता है। एक अनुमान के अनुसार इस युद्ध में अब तक उसके 238 लाख करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। अमरीका में महंगाई 12 प्रतिशत बढ़ गई है। इसके साथ-साथ वहां तेल की कीमतें भी बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प का अमरीका भर में भारी विरोध होना शुरू हो गया है। सैनेट में उसकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के 53 में से 12 सांसद भी उनके विरुद्ध हो गए हैं। दूसरी तरफ डैमोक्रेटिक पार्टी के सभी 47 सांसद पहले ही युद्ध के विरुद्ध हैं। इस स्थिति के दृष्टिगत ही ट्रम्प ने ईरान युद्ध की कांग्रेस से स्वीकृति लेने के लिए प्रस्ताव पेश नहीं किया। इस संबंध में अमरीका के 1973 में बनाए गए कानून के तहत राष्ट्रपति को कहीं भी 60 दिनों से अधिक सैन्य कार्रवाई करने के लिए अमरीकी कांग्रेस से औपचारिक रूप से स्वीकृति लेनी पड़ती है। इसलिए अब ट्रम्प ने यह कहना शुरू कर दिया है कि ईरान पहले ही युद्ध हार चुका है। उसकी नौसेना और सेना का भारी नुकसान हो चुका है। इसलिए युद्ध की ज़रूरत नहीं है। दूसरी तरफ यह भी समाचार  हैं कि खाड़ी में तैनात अमरीकी युद्धपोत के कमांडर ब्रैड कूपर ने कहा है कि राष्ट्रपति ट्रम्प को ईरान के विरुद्ध अचानक हमले करने की योजना संबंधी बता दिया गया है। ये भी समाचार मिल रहे हैं कि अमरीका ईरान के इस़फहान परमाणु प्लांट पर हमला कर सकता है।
ईरान ने पाकिस्तान द्वारा भेजे गए नए प्रस्ताव में पुन: यह दोहराया है कि यदि अमरीका उसकी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म कर देता है तो वह भी होर्मुज़ जल मार्ग से अपनी तैनाती हटा लेगा, परन्तु ईरान ने अपने नए प्रस्ताव में अपने परमाणु मुद्दे संबंधी अपनी नीति का ज़िक्र नहीं किया और इस संबंध में इतना ही कहा है कि इस पर बातचीत बाद में की जाएगी। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ट्रम्प ने यह कहा है कि उसे ईरान का नया प्रस्ताव स्वीकार नहीं है और वह किसी भी स्थिति में ईरान को परमाणु बम बनाने की इजाज़त नहीं देगा और उसे अपना यूरेनियम अमरीका को सौंपना होगा। पैदा हुए इस नए हालात से स्थिति और भी गम्भीर हो गई प्रतीत होती है। यदि अन्तर्राष्ट्रीय यत्नों से इस मामले का कोई हल नहीं निकाला गया तो पश्चिम एशिया के देशों के लिए जहां ये हालात विनाशकारी सिद्ध हो सकते हैं, वहीं विश्व भर के अन्य देश भी बड़ी आर्थिक जकड़ में फंस सकते हैं। नि:संदेह आज जल्द से जल्द इस बेहद ़खतरनाक हो रही स्थिति से निकलने की ज़रूरत है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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