अपना अस्तित्व खो रहीं वामपंथी पार्टियां
पांच राज्यों के 4 मई के चुनाव परिणाम देश में बड़े बदलाव का संकेत लेकर आए। एक और जहां पश्चिम बंगाल में पिछले 15 साल का ममता बनर्जी सरकार की करारी हार हुई है तो केरलम में एलडीएफ की बड़ी हार के साथ ही देश में एक मात्र वामपंथी सरकार का भी अंत हो गया है। असम में हिमंता सरकार की हेटट्रिक, पुडुचेरी में एनडीए की वापसी और तमिलनाडु में डीएमके-एआईडीएम के की 57 साल की राजनीति का अंत और अभिनेता से नेता बने विजय का उदय बहुत कुछ कहता है।
सबसे अधिक चिंतनीय व गंभीर परिणाम यह रहा है कि केरलम में वामपंथी सरकार की हार के साथ ही देश में वामपंथ हाशिये पर चला गया है। उल्लेखनीय है कि 1956 में त्रावणकोर, कोचिन और मालाबार को मिलाकर बने केरलम की 1957 की पहली चुनी हुई सरकार कम्यूनिस्ट पार्टी ई,एम.एस. नंबूदरीपाद की बनी। ठीक 70 साल बाद केरलम में वामपंथियों की हार के साथ ही देश में वामपंथियों की एकमात्र राज्य की अंतिम सरकार का भी अंत हो गया है। सवाल यह उठने लगा है कि प. बंगाल और त्रिपुरा की तरह केरलम में भी क्या अब वामपंथी सरकार आने वाले सालों में वापसी कर पायेगी? इतिहास तो यही बता रहा है कि 34 साल के लगातार शासन के बावजूद 2011 के बाद से प. बंगाल में वामपंथी सरकार की वापसी नहीं हो पायी तो 25 साल सरकार के बावजूद त्रिपुरा में भी 2018 के बाद से वामपंथी सरकार की वापसी नहीं हो पायी है। इससे लगता है कि वामपंथी पार्टियां या वामपंथी सरकारें अब इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है। लोकसभा में भी आज वामपंथियों का प्रतिनिधित्व सिमट कर 4 की संख्या तक रह गया हैं। हालांकि यह गत लोकसभा से एक ज्यादा है। यह नहीं भूलना चाहिए कि 1977 के बाद जिस तरह से भारतीय राजनीति में वामपंथी पार्टियों का दबदबा बढ़ा था, वह 1990 के दशक में किंग मेकर की स्थिति में आ गया था। यहां तक कि 2004 में लोकसभा में 59 सदस्यों के साथ वामपंथी पार्टियों की सर्वाधिक भागीदारी रही और ज्योति बसु को एक बार नहीं अपितु तीन बार देश के प्रधानमंत्री के पद की पेशकश की गई, परन्तु वामपंथियों में अहम् की लड़ाई के कारण यह अवसर छिन गया और इसके बाद तो वामपंथी पार्टियां धीरे-धीरे हाशिये की ओर जाती रही जबकि सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष रहे तो उस दौर में वामपंथी पार्टियां किंग मेकर की भूमिका निभा रही थी। एक दौर था जब वामपंथी पार्टियों का बड़ा प्रभाव होता था। फिर धीरे-धीरे ये पार्टियां पहचान खोने लगीं।
देश में कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास आज़ादी से पहले का है। 26 दिसम्बर, 1925 को मानवेन्द्र नाथ रॉय जिन्हें एम.एन. रॉय के नाम से भी जाना जाता रहा है, ने कानपुर में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। उस समय अवनी मुखर्जी, एस.बी. घाटे, मोहम्मद अली और मोहम्मद शफीक सिद्धिकी उनके संस्थापक साथी थे। वामपंथियों के भारतीय राजनीति में उभार को इसी से समझा जा सकता है कि आज़ादी के बाद 1957 में केरल की पहली चुनी हुई सरकार वामपंथियाें की थी। यह दूसरी बात है कि बाद में कांग्रेस द्वारा इस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। पर आज़ादी के बाद से अब तक केरल में अधिकांश शासन वामपंथी पार्टियों का ही रहा है। प. बंगाल में भी 1977 से 2011 तक लगातार वामपंथी सरकार रही। त्रिपुरा में भी वामपंथियों का बीच-बीच में काफी समय तक शासन रहा है। माणिक सरकार के बाद से एनडीए गठबंधन ने त्रिपुरा में सत्ता संभाल ली है। 1964 में चीन को लेकर कम्यूनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ और भाकपा और माकपा दो पार्टियां बन गई। धीरे-धीरे वर्चस्व और अहम् की लड़ाई के कारण वामपंथी आंदोलन के कुंद होने के बाद भारतीय राजनीति में भी वामपंथी पार्टियों का प्रभाव कम होता गया। सवाल यह है कि क्या केरलम की विजयन सरकार की हार को देश में वामपंथी सरकारों का अंत माना जाना चाहिए या फिर वापसी की संभावना है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब केन्द्र में वामपंथियों का दखल बढ़ा तो वही वामपंथी पार्टिंयों के बिखराव का कारण बन गया।
-मो. 94142-40049



