कहानी तपती छांव

रामरतन को बिजनेस में इतना बड़ा घाटा हुआ कि वह आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरे। अब क्या होगा-उनका सपना अभी पूरा कहां हुआ है? उतने बड़े घर में बेटी का विवाह तय किया है। देना-लेना तो अब बाकी न है, पर बारातियों का वैसा स्वागत कैसे करेंगे? उस स्वागत में तो अभी कई लाख धन की ज़रूरत है। इस चौपट बिजनेस में किस साख पर लोग इतने रुपये देंगे। यह मुंबई तो और मायानगरी है। पत्नी ने तो रास्ता सुझाया है, पर लड़के वाले इतनी दूर गांव जाने को तैयार होंगे तब न। नहीं तो, गांववाले बहुत कम में शादी-ब्याह पार कर देते हैं। जब तक शादी न हो जाए, एक पैर पर खड़ा रहता है पूरा गांव। लड़की की शादी में तो पूछो ही नहीं। 
और बहुत हाथ-पांव जोड़ने के बाद रामरतन के होने वाले समधी ने अपने स्टेटस के खिलाफ होने पर भी उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। पर शर्त रखी कि बारातियों का स्वागत-सत्कार उसी प्रकार होना चाहिए। डूबते को तिनके का सहारा। रामरतन सपरिवार अपने गांव के लिए ट्रेन पकड़ चुके थे।  रास्ते भर गांव-घर की वे स्मृतियां ज़िंदा और प्रोत्साहित कर रही थीं। सब हो जाएगा-लाखों की जगह हजारों में काम निबटता है वहां। क्या नहीं सहयोग करते हैं गांववाले। भोर हो जाता है, पर बिना विवाह पार हुए कोई खाता तक नहीं। किसी बाराती के रूठने पर पूरा गांव उसके पैरों पर गिर पड़ता है। बेटी अपने बाप की नहीं, पूरे गांव की हो जाती है।
और यही सब सोचते-साचते रात नौ बजे के करीब रामरतन अपने गांव में कदम रख रहे थे। देखकर तो आंखें चौंधिया गईं-अरे बिजली से नहाया हुआ है पूरा गांव! बहुत लोग अभी जगे भी हैं! लो, बिजली की भी समस्या हल। वाह रे मेरा गांव! इतने वर्षों में इतना बदल गया! बगल के पोल पर टंगी वेपरलाइट से उनका खुला दालान लगभग साफ दिखाई पड़ा। एक स्कूली कोचिंग का बोर्ड भी दिखा। हल्का गुस्सा तो आया, परन्तु उन्हें अपने गांववालों की पूरी ज़रूरत है। और इसमें बिगड़ा क्या है। दीया-बत्ती तो रोज जलता है। लो, यहां बल्ब और पंखा भी लटका है। उस रात कमरों में पसरी गंदगी की वजह से उन्हें अपने दालान में ही सोने पर कोई भारी दिक्कत न हुई।
शादी की तैयारियां जोरों-शोरों से चल रही थीं। नौकर छठुआ को तो शरबत, चाय पिलाते नाक में दम है। हमेशा रामरतन का दालान दस-बारह जनों से भरा रह रहा है। रामरतन उनके साथ सलाह-मशविरा कर रहे हैं। 
‘तुम चिंता काहे करते हो रामरतन भाई। एतना साल के बाद आए हो, तो का तोर गांव तोरा मदद न करेगा। ई सब कभी सोचबो न करिहो। बिआह तो अइसा होगा कि जेवार देखेगा।’ पड़ोसी देविंदर ने रामरतन को पूरा भरोसा दिलाया। 
‘सब आप ही लोगों पर है देविंदर भईया। गलती तो हमारी है ही। बंबई जाकर आप लोगों से इतने दिनों बाद मिले हैं। पर भूले थोड़े हैं। लड़के वालों से कहा-हम तो शादी अपने गांव से ही करेंगे। यह सब आप लोगों के भरोसे ही कहा है। अब तो यही विनती है कि बढ़िया से बिटिया का ब्याह संपन्न हो जाए।’ रामरतन ने कुछ भाव छुपाकर कहा।
‘एकदमे हो जाएगा रामरतन चा, आप चिंता तनिक्को मत कीजिए।’
‘हां-हां, पिंकी पूरे गांव की बेटी-बहन है। हम उसकी शादी धूमधाम से करेंगे।’ बाकी लोगों ने भी एक स्वर से हां-में-हां मिलाई। रामरतन गद्गद और आश्वस्त हो रहे थे।
‘ई रहा कदुआ, कोहरा, आऊ भतुआ। ई सब के काहां रख दें चच्चा।’ गांव के कई युवक गांव से सब्जियां इकट्ठी कर ले आए थे। ‘कल से दूधो तसीलने लगना है बेटा। सौओ घर में गाय-भईंस लगता है। दही तो एतना हो जाएगा कि जनावर के देना पड़ेगा।’ सिंगेसर सिंह ने लोगों को दूध इकट्ठा करने की आज्ञा दी।
‘आ मंड़वा के बांस के लेल कहीं जाए के ज़रूरत न है। हमरे बंसवाड़ी से सब बाँस हो जाएगा।’ सुन्द्रिका पाठक ने अपना ऐसा दिल खोला। 
‘घर-वर खोजन चललन अपनै पापा, दुअरे दुलरइतिन बेटी ठाड़-कइसन घरवा, कइसन दुअरबा से कइसन बर से करीथै बिआह, अजी पापा...!’
‘जी चललन दहिया बेचे गोआला बनके...।’ दिन को रामरतन का दालान जहां मर्दों के चौपाल से गूंजा करता था, वहीं लड़कियों-औरतों के गीत-झूमर-सगुन से आंगन में रातें नाचती थीं।
आज बारात आने वाली है। गांव के लोग रामरतन के यहां जुटने लगे हैं। दरी- सफेदा-तकिया गांव से तसीलाकर बिछ रहे हैं। शामियाना गाड़ने के लिए खेत चौकिया दिए गए हैं। लड़कियां महिलाएं सब्जियां काटने में लगी हैं। गांव के कहार आटा सान रहे हैं। माइक पर बिधों और गीतों की झंकार पूरे गांव को उत्साहित कर रही है। इधर आलू उबलाकर छीला रहा है। उधर एक बड़े कड़ाह को गांव वाले आलूदम बनाने को चढ़ाए हुए हैं। हलवाई सिर्फ पूरी-जलेबी-मिठाई बनाएंगे, बाकी सब गांव वाले। रामरतन निश्चिततापूर्वक पीली धोती-गंजी पहने घूम रहे हैं। लड़के नाश्ता पैक कर रहे हैं। भंडार में जमुना बाबा मुस्तैद हैं।
लो, होती शाम बारात भी आ गई। आधा गांव सत्कार में हाजिर! शर्बत-नाश्ता हो गया। दरवाजा लग रहा है। ‘आपन खोरिया बहारै ए रामरतन बाबूजी, आबै ताड़े दुलरा दमाद जी...।’ औरतों-लड़कियों के झंझकार गीत पूरी उड़ान पर थे। सभी बारातियों ने खा लिया, पर दूल्हे के पाहुन, मामू और फूफा रूठ गए हैं। समधी खिसिया पड़े, ‘हमारी भलमनसी का यह नतीजा कि हमारे मेहमानों का स्वागत नहीं हो रहा। एक तो आपने बारातियों को जमीन पर खिला दिया।’ रामरतन कांप रहे हैं। सुजान सिंह, जमुना बाबा, मुखिया जी समधी के पैरों पर गिर पड़े, ‘बेटीवाला तो गरीब होता ही है। छमा कीजिए। हम अप्पन पगड़ी रखते हैं।’ अन्य लोग भी हाथ जोड़े माफी मांग रहे हैं। पिघल गए समधी, मान गए पाहुन लोग।
कन्यादान हुआ, सिंदूरदान भी। अब लड़की विदाई हो रही है। औरतें जार-बेजार रो रही हैं। मर्दों की आंखें भी डबडबा हैं। पिंकी बिलख-बिलख कर मां-फूआ-चाची से भेंट कर रही है। पिता के पैर तो छोड़ नहीं रही। कंपसते-कंपसते फाटकर रो पड़े रामरतन। और नींद टूट जाती है। तो यह सपना था? पर शुभ संकेत मानते हुए उठते हैं रामरतन।
दिशा-मैदान, चाय-पानी कर निकल जाते हैं गाँव में। आज तीसरे दिन एकदम से हताश घर में बैठे थे-क्या से क्या हो गया गांव! सर-सरोकार, बैना-पेहानी, हा-हा-ही-ही, चौपाल सब कुछ खतम! सब्जी हो, दूध हो, आदमी हो, गांव में भी ठीक करना पड़ेगा! शहर दैत्य ने निगल लिया गांव को! और घोर अफसोस कि गांव भी खुश है! आह! अब कैसे बचेगी इज्जत? हे कुलदेवता! ग्रामदेवता! पार लगाओ भगवान।’ 
और आज उतना तो नहीं, पर कुछ खुश हैं रामरतन। पुराने भाव में एक सामान्य हद तक उठ खड़ा हुआ है गांव। 
(सुमन सागर)
 

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