शांति और धार्मिक आस्था का केन्द्र है अशोक धाम मंदिर
भारत में कई ऐसे तीर्थ स्थल व प्राचीन मंदिर हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग को मालूम है। ऐसे प्राचीन मंदिरों व तीर्थ स्थलों का प्रसिद्धि का दायरा सीमित होता है। मंदिर व तीर्थ स्थल तो प्रसिद्ध होते हैं लेकिन यह क्षेत्रीय मंदिर व तीर्थ स्थल बनकर रह जाते हैं। हम चर्चा कर रहे हैं अशोक धाम मंदिर की जो हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेलमार्ग पर लखीसराय में अवस्थित है। यह क्षेत्र हिंदू और बौद्ध देवी देवताओं के लिए प्रसिद्ध है। बौद्ध साहित्य में इस स्थान को अंगुत्री के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ है-ज़िला। प्राचीन काल में यह अंग प्रदेश का सीमांत क्षेत्र था। पाल वंश के समय में यह स्थान कुछ समय के लिए राजधानी भी रह चुका है। इस स्थान पर धर्मपाल से संबंधित साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। ज़िले के बालगुदर क्षेत्र में मदन पाल का स्मारक (1161-1162) भी पाया गया है। हवेन ने इस जगह पर 10 बौद्ध मठ होने के संबंध में विस्तार से बताया है। उनके अनुसार यहां मुख्य रूप से हीनयान संप्रदाय के बौद्ध मतावलंबी आते थे। इतिहास के अनुसार 11वीं सदी में मोहम्मद बिन बख्तियार ने यहां आक्रमण किया था। शेरशाह ने 15वीं सदी में यहां शासन किया था जबकि यहां स्थित सूर्यगढ़ा शेरशाह और मुगल सम्राट हुमायूं (1534) के युद्ध का साक्षी है।
लखीसराय स्थित अशोक धाम मंदिर में महाशिवरात्रि और सावन के महीने में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। अशोक धाम हिन्दू तीर्थ यात्रियों के पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। अशोक धाम मंदिर की शिवलिंग की बात करें तो यहां का शिवलिंग काफी बड़ा। इस स्थान पर कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान भी होते रहते हैं। इनमें से मुंडन बहुत लोकप्रिय है।
लोगों का कहना है कि अशोक धाम का नामकरण लखीसराय के एक चारवाहा अशोक के नाम पर किया गया है। एक दिन जब अशोक गाय चरा रहा था तब उसकी नजर एक बहुत बड़ी शिवलिंग पर पड़ी जो धरती में गड़ा हुआ था। अशोक ने उस शिवलिंग को बहुत उखाड़ने का बहुत प्रयास किया लेकिन शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। अशोक ने इसकी जानकारी अन्य लोगों को दी और पुन: शिवलिंग उखाड़ने का प्रयास किया गया पर इस बार भी असफलता ही हाथ लगी। अंत में हार कर उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करने का निर्णय किया गया। शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह अवतरित शिवलिंग हैं जो स्वत: धरती से बाहर निकला। शिवलिंग के सर्वप्रथम दर्शन चरवाहा अशोक को होने के कारण यह इस मंदिर का नामकरण चरवाहा अशोक के नाम पर ‘अशोक धाम’ हुआ। अशोक धाम मंदिर में महाशिवरात्रि और सावन के महीने में बिहार के कई ज़िलों के श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। माना जाता है कि यहां सच्चे श्रद्धा के साथ मनोकामना मांगने से भोले भंडारी उनकी कामना पूर्ण करते हैें। अशोक धाम दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालु जलप्पा स्थान, गोबिंद बाबा स्थान, श्रृंगऋषि व पोखरामा भी अवश्य दर्शनार्थ जाएं।
जलप्पा स्थान : जलप्पा स्थान में मुख्य रुप से गौ पूजा होती है। जिसके लिए यह काफी प्रसिद्ध है। जलप्पा स्थान पहाड़ी पर स्थित है। यहां विशेषकर मंगलवार को श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। यहां पहुंचने के लिए वाहन के माध्यम से लखीसराय से चानन क्षेत्र होते यहां पहुंचा जा सकता है। यदि आप पैदल यहां आना चाहते हैं तो मानो गांव होते हुए लगभग दो घंटे का सफर तय करने के बाद जलप्पा स्थान पहुंचेंगे।
गोबिंद बाबा स्थान : इस मंदिर की मुख्य विशेषता यहां का पूजा है जिसको ढ़ाक के नाम से जाना जाता है। गोबिंद बाबा का स्थान इस पूर क्षेत्र में पूजनीय है। यह मंदिर मानो-रामपुर गांव में स्थित है। धार्मिक रूप से इस स्थान का काफी महत्व है।
श्रृंगऋषि : यहां शिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए झरना आकर्षण के केन्द्र बिदू में रहता है। खड़गपुर की पहाड़ियों पर स्थित यह तीर्थस्थल लखीसराय का श्रृंगार है। यह स्थान ज़िले के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसका नाम प्रसिद्ध ऋषि श्रृंग के नाम पर रखा गया है।
पोखरामा : यहां छठ के अवसर पर श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है। यह एक दर्शनीय स्थान है, यहां बहुत सारे मंदिर और तालाब है।
(सुमन सागर)





