आसान नहीं है कांग्रेस का रास्ता
इस देश में प्रधानमंत्री मोदी का गुणगान करना एक फैशन तथा भाजपा की तारीफ करना एक शुगल बन गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले 12 सालों में मोदी ने देश की राजनीति को पूरी तरह से बदल दिया है। ये लगने लगा है कि ये वो भारत नहीं है जिसे हमारी पीढ़ी जानती थी। भाजपा ने समाज को इस कदर बदला है कि अपने दशकों पुराने दोस्तों को पहचानना मुश्किल हो गया है। वे जो जुबान बोलते हैं वो कम से कम मेरे जैसे व्यक्ति को अजनबी लगती है। जिस तरह के तर्क दिये जाते हैं, वो मैं समझ नहीं पाता हूँ। समाज और राजनीति की इस नई भाषा और नये विमर्श का कैसे सामना किया जाये, इस ‘नये भारत’ की संरचना को कैसे देखा जाये और इससे निपटने के लिये क्या रणनीति बनाई जाये, ये एक पेचीदा सवाल है। विपक्ष इस सवाल पर काफी समय तक भ्रमित रहा है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि उसने दिशा पकड़ ली है। और इस काम में कांग्रेस आगे बढ़ती दिखाई पड़ती है खासतौर पर राहुल गांधी।
मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अपनी बौद्धिक और व्यावहारिक खीझ को राहुल या कांग्रेस पर निकालते हैं। इस देश में तथाकथित बुद्धिजीवियों और उदारवादियों का एक ऐसा तबका भी है जो इस नये भारत की तासीर और तबियत से त्रस्त होकर खुद को इससे एडजस्ट नहीं कर पा रहा है, वो बेबसी और बेचैनी के आलम में कांग्रेस पर अपना गुस्सा निकालता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा के उभार में कांग्रेस की खामियों और कमज़ोरियों का बड़ा हाथ है। जवाहर लाल नेहरू के बाद कांग्रेस में जिस तरह से विचारधारा को दरकिनार करने की कोशिश की गई और पार्टी सत्ता हासिल करने की मशीन बन गई, उसका नतीजा ये हुआ कि वो भाजपा के हिंदुत्व का सामना नहीं कर पाई और 2014 में कांग्रेस नामक इमारत पूरी तरह से ध्वस्त हो गई।
इंदिरा गांधी ने जिस तरह से पार्टी के मज़बूत नेताओं को दरकिनार किया और दरबारियों को आगे बढ़ाया, जिनकी एकमात्र योग्यता चमचागिरी थी और जो सत्ता के भूखे थे, जिनमें विचारधारा का अभाव था और जो राजनीति को सेवा की जगह धंधा समझते थे, ऐसे लोगों को ऊंचे पदों पर बिठाया और सम्मान दिया, उसने पार्टी को गहरे घाव दिये। जो कांग्रेस की विचारधारा के प्रति समर्पित थे, जो गांधी और नेहरू के विचारों से सहमत थे और राजनीति जिनके लिये सिर्फ सत्ता पाने का माध्यम नहीं था, जो जमीन से जुड़े थे, जिनका सामाजिक आधार था, ऐसे लोगों को हाशिये पर डालने का असर ये हुआ कि कांग्रेस अस्सी के दशक में दिखती तो मज़बूत थी लेकिन वो पूरी तरह से खोखली हो चुकी थी। ऐसे में जब नब्बे के दशक में उसे मंडल के ज़रिये सामाजिक न्याय और राम मंदिर के जरिये हिंदुत्व का झटका लगा तो वो समझ ही नहीं पाई कि कैसे और किस तरह से वो उनका मुकाबला करे, नई रणनीति बनाये। नतीजा ये हुआ कि पार्टी जर्जर होती गई और शिराजा बिखरता गया।
सामाजिक न्याय की राजनीति ने जहां भारतीय समाज में उस दमित चेतना को आवाज़ दी जो सदियों से दबी हुई थी, जिसने गैर बराबरी पर आधारित भारतीय समाज के बहुसंख्यक वर्ग की ऊर्जा को पूरी तरह से ग़ुलाम बना रखा था। जब इस ऊर्जा को भारतीय संविधान ने प्रस्फुटन का रास्ता दिखाया तो इसके विरोध में वर्चस्ववादी ताकतें उठ खड़ी हुईं और उसको दबाने के लिये तमाम तरह के हथकंडे अपनाये गये और कई तरह के तर्क गढ़े गये। हिंदुत्व का उभार उसी प्रतिकार का एक रूप है। ये सामाजिक न्याय को और भारत को ‘आधुनिक भारत’ बनने से रोकने की कोशिश का एक नतीजा है। ये दोनों सामाजिक ताकतें एक-दूसरे की धुर विरोधी हैं और एक-दूसरे को रोकने की प्रक्रिया में जुटी हैं। इस संघर्ष में सामाजिक न्याय की जीत तय है।
2014 की हार के बाद कांग्रेस को ये समझने में लगभग 8 साल लग गये कि हिंदुत्व का सामना करने के लिये क्या रणनीति बनाये, लेकिन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस को इस वैचारिक ऊहापोह से दूर कर दिया। उसे समझ में आ गया कि उसकी लड़ाई हिंदू धर्म से नहीं बल्कि हिंदुत्व नाम की विचारधारा से है और इसका मुकाबला करने का अर्थ हिंदू धर्म का विरोध करना नहीं है। इस समझ के साथ उसे ये भी समझ आई की हिंदुत्व विचारधारा को हराने के लिये एक समानान्तर विचारधारा को बनाना पड़ेगा और इस समानांतर विचारधारा की जड़ों को सामाजिक न्याय में खोजा जा सकता है जो बहुसंख्यक हिंदू आबादी की इंसाफ की पुकार है। राहुल ने जाति जनगणना के बहाने सामाजिक न्याय के सिद्धांत को अपनाने की कोशिश की। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय कोलार की रैली से उन्होंने जाति जनगणना की मांग बुलंद की और लगातार वो इस मुद्दे को उठा रहे हैं। भाजपा ने पहले इसको नज़रअंदाज़ करने का काम किया लेकिन बाद में उसने घुटने टेक दिये।
इस बीच राहुल ने संविधान बचाओ का मुद्दा भी उठा लिया। संविधान बचाओ का मुद्दा एक तरफ दलित चेतना को ऊर्जस्वित करता है तो दूसरी तरफ भारत के सेक्युलरवाद को भारतीय राजनीति के केन्द्र में स्थापित करता है और साथ ही गैर बराबरी पर आधारित भारतीय समाज को चुनौती भी देता है। ध्यान से अगर देखें तो राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस हिंदुत्व के बरक्स सेक्युलरवाद, संविधानवाद और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का एक तानाबना बुन कर एक वैचारिक इमारत खड़ी करने की कोशिश कर रही है लेकिन ये काम उतना आसान नहीं है। अभी सिर्फ एक खाका बना है। इस खाके को एक जीवित स्वरूप देना है और इसे एक आंदोलन में तब्दील करना है। भाजपा इस वैचारिक इमारत की ताकत को समझ गई है इसलिये उसने पहले जाति जनगणना का विरोध किया लेकिन बाद में वो इसे कराने को तैयार हो गई। केन्द्र और राज्यों के मंत्रिमंडल में पिछड़ी जाति के नेताओं को लाकर वो सामाजिक न्याय के वकीलों को ये बताने का प्रयास कर रही है कि वो सामाजिक न्याय के खिलाफ नहीं हैं।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत मोदी हैं। वो खुद पिछड़े समाज से आते हैं। वो राहुल के नये राजनीतिक प्रयोग को समझते हैं। इसलिये उनका राहुल पर हमला लगातार तेज होता जा रहा है। राहुल के लिये भी ये काम आसान नहीं है। खासतौर पर ऐसे वातावरण में जब राजनीति लोकतांत्रिक व्यवस्था से खिसक कर अधिनायकवाद की ओर चली गई है। जिसमें सत्ता तंत्र बहुत दमनकारी हो गया है, जिसमें संस्थाओं ने पूरी तरह से सत्ता के सामने सरेंडर कर दिया है। मीडिया सिर्फ सरकार की बात करता है। सिविल सोसायटी डरी हुई है और प्रचार तंत्र इतना प्रभावशाली है कि लिबरल तबके के लोग भी वही भाषा बोलने लगे हैं जो सत्ता चाहती है। ऐसे में ये संघर्ष आसान नहीं है। इसके रास्ते में कांटे बहुत हैं, प्रतिरोध की बाधाएं बहुत हैं। इतिहास गवाह है कि वर्चस्ववादी ताकतें आसानी से रास्ता नहीं देतीं। ऐसे में संघर्ष लंबा ज़रूर चलेगा लेकिन सही मायनों में आधुनिक भारत बनेगा। ये मेरा विश्वास है जिसमें कोई गैर-बराबरी नहीं होगी और जाति के नाम पर किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।



