अधिकाधिक पौधारोपण किए जाने की ज़रूरत 

पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना लोगों के मन में केवल शिक्षा के माध्यम से ही विकसित की जा सकती है। ऐसी शिक्षा जो केवल जानकारी देने तक सीमित न होकर जीवन के व्यापक दृष्टिकोण को भी जागृत करे। प्रकृति के प्रति श्रद्धा और सम्मान को पुन: स्थापित करे। पर्यावरण से हमारा संबंध मानवीय अनुभव का प्रथम स्तर है। जब हमारा परिवेश स्वच्छ, संतुलित और सकारात्मक होता है, तब उसका अनुकूल प्रभाव हमारे अस्तित्व के अन्य सभी आयामों पर भी पड़ता है।
इतिहास साक्षी है कि मानव मन और प्रकृति के बीच एक गहरा और आत्मीय संबंध बनाने का प्रयत्न सदा होता रहा है। जब हम प्रकृति और स्वयं के अस्तित्व से दूर होने लगते हैं, तभी प्रदूषण और पर्यावरण विनाश की प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं। भारतीय परम्परा में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। पर्वत, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चंद्रमा और पंचमहाभूत सभी श्रद्धा के पात्र रहे हैं। वस्तुत: विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में भी प्रकृति के प्रति यही गहन आदरभाव विद्यमान था। आज आवश्यकता इस बात की है कि मानव मन को तनाव और लोभ से मुक्त कर पुन: उसी श्रद्धा और संवेदनशीलता से जोड़ा जाए।
हमारे अनुसंधान केंद्र में किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि ध्यान और साधना की प्रक्रियाएं पर्यावरणीय कार्यों में सामुदायिक सहभागिता तथा व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करती हैं। इसे ‘सामूहिक प्रभाव’ कहा जाता है, अर्थात वह सकारात्मक परिवर्तन जो समाज के लोगों के पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण और आचरण में दिखाई देता है।
पंचमहाभूत एक-दूसरे से अत्यंत गहराई से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक तत्व का प्रदूषण शेष चारों को भी प्रभावित करता है। इन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। यदि आप प्लास्टिक जलाते हैं, तो वह केवल पृथ्वी को ही नहीं, वायु को भी प्रदूषित करता है। यदि उसे जल में फेंक दिया जाए, तो वह जल को भी उतना ही दूषित कर देता है।
वृक्षों को धरती के फेफड़े कहा जाता है और यह उपमा पूर्णत: उचित है। इसलिए हमें अधिकाधिक पौधारोपण करना चाहिए। हमारे प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति एक वृक्ष काटे, उसे पांच नए पौधे लगाने चाहिएं। प्रकृति स्वयं हमें सतत और संतुलित सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाती है। यदि हम किसी वन में जाएं तो देखेंगे कि असंख्य जीव-जंतु वहां निवास करते हैं, परन्तु वे मनुष्यों की भांति अपने परिवेश को गंदा नहीं करते। अत: हमें अपनी आध्यात्मिक जड़ों की ओर लौटना होगा और इस जागरूकता को पुन: स्थापित करना होगा। हमें इस धरती के साथ आत्मीयता का संबंध स्थापित करना होगा। वृक्षों, नदियों और समस्त मानव समाज को अपना मानना होगा। 

#अधिकाधिक पौधारोपण किए जाने की ज़रूरत