देश की आर्थिक स्थिति पर सरकार समर्थक अर्थ-शास्त्री भी चिंतित
सरकार को किसी भी मुद्दे पर जब विपक्षी पार्टियां सलाह देती हैं तो उन्हें राजनीतिक आलोचना कह कर खारिज कर दिया जाता है। राहुल गांधी कई वर्षों से बार-बार कह रहे हैं कि भारत अर्थिक रूप में पिछड़ रहा है, लेकिन उनकी बात सुनने की बजाय, उल्टे उन्हें ‘पप्पू’ सिद्ध करने का अभियान चलता रहता है। लेकिन अब तो सरकार के समर्थक अर्थशास्त्री भी कह रहे हैं कि ‘भारत गाथा’ अर्थात भारती की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई है, जिसे फिर से पटरी पर लाने के लिए बड़े सुधारों की ज़रूरत है। सरकार के समर्थक अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने लगातार दूसरी बार अपने कॉलम में सरकार की नीतियों में कमियां बताई हैं और सुधार की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। उन्होंने एक अंग्रेज़ी अखबार में अपने पिछले कॉलम में कहा था कि भाजपा चुनाव जीत रही है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है। अपने ताज़ा कॉलम में उन्होंने इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अपेक्षित सुधार लागू नहीं किए गए हैं।
उन्होंने प्रत्यक्ष रूप में 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद की विफलताओं का ज़िक्र करते हुए कहा है कि 2014 में भारत और इंडोनेशिया की कहानी शुरू हुई थी। इंडोनेशिया ने ऐसे सुधार किए जिससे उसे निवेश और सम्मान मिला, जबकि भारत द्वारा आवश्यक सुधार लागू न करने पर विदेशी निवेशक पूंजी निकल कर ले गए।
पहचान पत्र किस काम के?
अहम सवाल है कि व्यक्ति की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाले तीन पहचान पत्रों—आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी का क्या काम रह गया है? सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मामले पर दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा कि ये तीनों पहचान पत्र किसी की नागरिकता प्रमाणित नहीं करते हैं अर्थात इन तीनों के आधार पर कोई व्यक्ति देश का मतदाता भी नहीं बन सकता है। अभी किसी के पास मतदाता पहचान पत्र है, जिसका इस्तेमाल करके उसने 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान किया था, लेकिन इसके इस्तेमाल से वह मतदाता सूची में अपना नाम शामिल नहीं करवा सकता। ऐसा पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में हो चुका है और अब जिन 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर का काम चल रहा है, वहां भी ऐसा ही होगा। लोगों ने कितनी मशक्कत की थी आधार कार्ड बनवाने के लिए। अब भी अगर किसी को आधार में कोई बदलाव कराना होता है तो बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। इसी तरह वोटर कार्ड बनवाना भी आसान काम नहीं होता। लोगों को इन दस्तावेज़ों को बनवाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद स्पष्ट है कि मतदाता सूची में नाम शामिल करवाने के लिए किसी भी व्यक्ति को इन तीनों पहचान पत्रों के अतिरिक्त और दस्तावेज़ भी देने पड़ेंगे।
भारतीय शेयर बाज़ार लुढ़का
भारत के शेयर बाज़ार का मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। अब यह खिसक कर 7वें स्थान पर पहुंच गया है। हाल ही में ताइवान की सिर्फ एक कंपनी टीएसएमसी का बाज़ार मूल्य बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) में सूचीबद्ध सभी कंपनियों के बाज़ार मूल्य से ज्यादा हो गया है। ज़ाहिर है जब एक कंपनी का मूल्य किसी देश की पूरी स्टाक मार्किट से अधिक होगा तो उस देश का पूरा शेयर बाज़ार तो आगे निकलेगा ही। सो, ताइवान के शेयर बाज़ार का मूल्य भारत के शेयर बाज़ार से ज्यादा हो गया। इसके बाद दक्षिण कोरिया का बाज़ार भी भारत से आगे निकल गया। अमरीका, जापान, चीन और हांगकांग पहले से ऊपर थे। ताइवान और दक्षिण कोरिया की सिर्फ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कंपनियों के शेयरों में आई तेज़ी की वजह से भारत इनसे पिछड़ गया। गौरतलब है कि दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग चिप डिज़ाइन करने वाली सबसे बड़ी दो कंपनियों में से एक है। दक्षिण कोरिया का शेयर बाज़ार पांच ट्रिलियन डॉलर का है और ताइवान का शेयर बाज़ार 5.2 ट्रिलियन डॉलर का है। भारत का शेयर बाज़ार 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है।
भाजपा के हर काम में देरी
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष पद पर जे.पी. नड्डा का तीन साल का कार्यकाल छह साल तक चला। बाद के तीन साल तो वह वैसे ही सेवा विस्तार पर चले, जैसे सीबीआई और ईडी के निदेशक और अन्य अधिकारी चलते हैं। अब नितिन नबीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो करीब साढ़े चार महीने के बाद भी अभी तक उनकी टीम का गठन नहीं हुआ है। यही हाल दो राज्यों में बनी नई सरकार का है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की और सरकार बनाई, लेकिन करीब एक महीने तक मुख्यमंत्री ने सिर्फ पांच मंत्रियों के साथ सरकार चलाई। मुख्यमंत्री सुवेंदू अधिकारी ने अकेले 42 विभागों को संभाला। अब बड़ी मशक्कत के बाद वहां मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ। 35 नए मंत्री बनाए गए। ऐसे ही असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक महीने तक चार मंत्रियों के साथ सरकार चलाई और एक महीने बाद वहां मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ है। अगर ऐसा किसी कांग्रेस शासित राज्य में होता तो भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना लेना था। जब केरल में कांग्रेस को नेता चुनने में भाजपा के मुकाबले दो दिन का अधिक समय लगा था, तो टीवी चैनलों पर 150 से ज्यादा बहसें इस वित्तांत के आधार पर हुई थीं कि ‘काग्रेंस केरल में नेता चुनने में असमर्थ है।’
राजनीतिक पार्टियां और महिलाएं
अप्रैल में जब नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का विधेयक संसद के विशेष सत्र में पेश किया गया था तो ऐसा लगा जैसे भाजपा और उसके नेताओं को महिलाओं की कितनी परवाह है। विपक्षी पार्टियों ने भले ही इसका विरोध किया था लेकिन महिलाओं के प्रति जुबानी जमाखर्च करने में उसने भी कंजूसी नहीं की थी। उसके बाद पांच राज्यों के चुनाव मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रचार के दौरान विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। भाजपा अपने को इस बात के लिए प्रतिबद्ध बता रही है कि वह महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देगी। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव में उसने 294 सीटों में से कुल 33 सीटों पर महिलाओं को उतारा था। यानी करीब 11 फीसदी टिकट महिलाओं को दिए थे। भाजपा को 207 सीटें मिली हैं, जिनमें से 21 महिलाएं हैं। इनमें से 7 महिलाओं को मंत्री बनाया गया है। कुल 41 मंत्री बने हैं, उनमें सिर्फ 7 महिलाएं है। यानी 20 फीसदी से कुछ कम महिलाओं को मंत्री बनाया गया। इसका अर्थ है कि जब तक कानून नहीं बनेगा, तब तक महिलाओं को 33 फीसदी हिस्सा भाजपा भी नहीं देगी। उधर कर्नाटक में कांग्रेस की नई सरकार बनी तो पहले चरण में 14 मंत्रियों ने शपथ ली। उनमें एक भी महिला मंत्री नहीं है। इसी प्रकार केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन द्वारा मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन की अगुवाई में 21 सदस्यी मंत्रिमंडल ने शपथ ली तो इसमें सिर्फ दो महिलाओं को मंत्री बनाया गया है।





