आत्म-निर्भर भारत की नींव मज़बूत करते स्वदेशी मेले

भारत को समझना हो तो केवल उसके बाज़ारों को नहीं, बल्कि उसके कारीगरों, बुनकरों, किसानों और छोटे उद्यमियों के कौशल को भी समझना होगा। हमारे गांवों और कस्बों में बसा यही कौशल भारत की असली ताकत है। देश के गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में ऐसे लाखों लोग हैं, जो अपने हाथों के कौशल, परम्परागत ज्ञान और स्थानीय संसाधनों के बल पर आजीविका चलाते हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती हमेशा बाज़ार तक पहुंच की रही है। स्वदेशी जागरण मंच द्वारा आयोजित स्वदेशी मेले इसी चुनौती का एक सार्थक समाधान बनकर उभरे हैं। इन मेलों में भारत अपने असली रूप में दिखाई देता है।
22 नवम्बर, 1991 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में स्थापित स्वदेशी जागरण मंच भारत को आत्म-निर्भर बनाने, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने और विदेशी कम्पनियों के आर्थिक वर्चस्व को कम करने के उद्देश्य से कार्य कर रहा है। हालांकि स्वदेशी का विचार डेढ़ सौ साल पुराना है। राष्ट्र नायकों ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण शक्ति बनाया था। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का आह्वान केवल राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा नहीं था, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता का भी संदेश था।
आज़ादी के बाद भी यह सवाल बना रहा कि क्या केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही पर्याप्त है? यदि हमारी ज़रूरतों की पूर्ति और बाज़ारों पर दूसरों का नियंत्रण बना रहे तो आर्थिक स्वतंत्रता कैसे आएगी? इसी चिंता ने स्वदेशी के विचार को नई ऊर्जा दी। यदि देश को वास्तव में मज़बूत बनाना है तो आर्थिक आत्म-निर्भरता भी आवश्यक है। इसी सोच को व्यवहार में उतारने के लिए स्वदेशी जागरण मंच ने अनेक अभियान चलाए और उनमें स्वदेशी मेलों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है।
वर्ष 1991 में दिल्ली में आयोजित पहला स्वदेशी मेला एक नई शुरुआत थी। इसके बाद यह पहल एक आंदोलन का रूप लेती चली गई। अब तक देश के विभिन्न राज्यों में 600 से अधिक स्वदेशी मेलों का आयोजन किया जा चुका है। हर वर्ष लाखों लोग इन मेलों में शिरकत करते हैं। यह आंकड़ा केवल लोकप्रियता का प्रमाण नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि समाज का एक बड़ा वर्ग स्वदेशी और आत्म-निर्भरता की अवधारणा से जुड़ रहा है।
स्वदेशी मेलों में भारत की जीवंत संस्कृति, लोगों का आत्म-विश्वास और अपने कौशल के प्रति गर्व साफ दिखाई देता है। स्वदेशी मेलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये केवल उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं हैं। इन मेलों में भारत की आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक शक्ति एक साथ दिखाई देती है। छोटे उद्योगों, कुटीर उद्योगों, हस्त शिल्पियों, बुनकरों, किसानों और ग्रामीण उद्यमियों को इन मेलों में अपनी प्रतिभा और उत्पादों को सीधे उपभोक्ताओं के सामने प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। जो कारीगर विभिन्न कारणों से बड़े बाज़ारों तक नहीं पहुंच पाते, उन्हें इन मेलों के माध्यम से न सिर्फ पहचान मिलती है, बल्कि उत्पादों को खरीदने वाले ग्राहक भी मिलते हैं। 
कई बार देखा है कि लोग किसी कारीगर से सीधे सामान खरीदते समय उसके काम की कहानी भी सुनते हैं। उस समय लेन-देन केवल क्रय-विक्रय तक सीमित नहीं रह जाता। एक ओर कारीगर को अपनी प्रतिभा की पहचान मिलने की खुशी होती है और दूसरी ओर खरीदार को यह संतोष होता है कि उसका पैसा किसी स्थानीय परिवार की आजीविका को मजबूत कर रहा है। यही इन मेलों की सबसे बड़ी ताकत है। इन मेलों में हथकरघा उत्पाद, हस्तशिल्प, जैविक कृषि उत्पाद, आयुर्वेदिक वस्तुएं, ग्रामीण तकनीक तथा विभिन्न कुटीर उद्योगों के उत्पाद प्रदर्शित किए जाते हैं। इसके साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, जन-कला का प्रदर्शन और कारीगरों द्वारा अपने कौशल का प्रत्यक्ष प्रदर्शन भी आकर्षण का केंद्र होते हैं। यही कारण है कि स्वदेशी मेले अब केवल व्यापारिक आयोजन नहीं रह गए हैं, अपितु भारतीय संस्कृति, लोक-जीवन और स्वावलंबन के उत्सव बन चुके हैं।
आज जब वैश्वीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां बाज़ार पर अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं, तब स्वदेशी मेले स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का एक प्रभावी माध्यम बनकर सामने आए हैं। ये मेले ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को व्यावहारिक रूप देते हैं। जब लोग अपने आसपास बने उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं तो उसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों को मिलता है। इससे रोज़गार बढ़ता है, छोटे उद्योगों को सहारा मिलता है और गांवों-कस्बों की अर्थव्यवस्था में नई जान आती है। आत्म-निर्भर भारत की अवधारणा भी इसी सोच पर आधारित है। आत्म-निर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि अपनी क्षमताओं को पहचानना और उन्हें सशक्त बनाना है। स्वदेशी मेले इसी दिशा में समाज को प्रेरित करते हैं। स्वदेशी मेले उपभोक्ता और उत्पादक के बीच एक सेतु बनकर उभरे हैं। (अदिति)

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