कानून के शासन को महत्व दे पंजाब सरकार 

बस्तियां भी तो दरिंदों से नहीं मह़फूज़,
घर से निकले भी कोई श़ख्स तो क्योंकर निकले।

इ़फत जरीं का यह शे’अर मुझे पंजाब की वर्तमान हालत पर विचार करते हुए बार-बार याद आया है। यह नहीं कि पंजाब की मौजूदा भगवंत मान सरकार ने कोई अच्छा काम नहीं किया। कई अच्छे काम भी हुए हैं, जिनमें से सबसे बड़ा तथा प्रशंसनीय कार्य पंजाब में नहरी पानी के लगभग बंद हो चुके उपयोग को फिर से शुरू करना तथा कई दबे हुए खालों, रजबाहों व नालों की ज़मीन छुड़वा कर पानी टेलां तक पहुंचाना है। चाहे अभी भी इस तरफ अभी और ध्यान देने की ज़रूरत है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में भी काफी अच्छा कार्य हुआ है, परन्तु अफसोस की बात है कि पंजाब में नशा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा, अपितु बढ़ता ही जा रहा है। 2022 की पी.जी.आई. की रिपोर्ट थी कि पंजाब में 15.4 प्रतिशत लोग अर्थात लगभग प्रत्येक छठा व्यक्ति किसी न किसी नशे की चपेट में आ चुका है। 2024 के पहले पक्ष में ही नशा विरोधी कानून के तहत 4373 मामले दर्ज हुए हैं और 215 किलो हैरोइन पकड़ी गई है। एन.सी.आर.बी. की रिपोर्ट के अनुसार 2023 में पंजाब में नशे की ओवरडोज़ से सबसे अधिक 89 मौतों की रिपोर्ट हुई है। नि:संदेब पंजाब सरकार गैंगस्टरवाद को खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है, परन्तु 2023 से मार्च 2025 तक ही गैंगस्टरों द्वारा धमकियां और फिरौती मांगे जाने के 569 मामले दर्ज हुए हैं, जो 2026 में और बढ़ गए हैं। नि:संदेह पुलिस के अनुसार इनमें से अधिकतर मामले नकली धमकियों को होते हैं, परन्तु इस तरह का माहौल पंजाबियों को चैन से सोने भी तो नहीं देता। फिर पंजाब सरकार द्वारा इस स्थिति को खत्म करने के लिए जो तरीका-ए-कार अपनाया जा रहा है, वह पंजाब को ‘निरंकुश पुलिस राज’ की ओर धकेल रहा है। चाहे पंजाब में पुलिस मुकाबलों का लम्बा इतिहास है और चाहे अब के पुलिस मुकाबलों में मौतों की संख्या पहले से कम है, परन्तु जिस प्रकार पुलिस मुकाबलों की कहानी एक जैसी ही कॉपी-पेस्ट की गई दिखाई देती है, वह इनमें से ज़्यादातर मुकाबलों के वास्तविक होने पर सवाल तो खड़े करती ही है। फिर जहां एक ओर केन्द्रीय एजेंसियां राजनीतिक बदलाखोरी के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं, वहीं यह प्रभाव पंजाब की विजीलैंस का भी बनता जा रहै है। ड्रग्स माफिया के खिलाफ बुलडोज़र एक्शन भी कई बार तो राजनीतिक बदलाखोरी का प्रभाव सृजित करता है। यदि एक ही स्थान, एक ही शहर में बने 20 मकानों या दुकानों में से जो सभी ही अवैध एवं बिना नक्शा पास करवा कर बने हों और उनमें से सिर्फ एक पर बुलडोज़र चलता है तो यह राजनीतिक बदलाखोरी का प्रभाव ही देता है। इस प्रकार आम लोगों में भय का माहौल बनता है जो लम्बे समय के लिए सरकार की छवि हेतु भी अच्छा नहीं हो सकता। अत: पंजाब सरकार को चाहिए कि वह पंजाब में भय तथा सहम का माहौल बनने से रोके। अपने विधायकों, मंत्रियों तथा नेताओं को अवश्य कहे कि लोगों के साथ धक्काशाही होने से रोकने के लिए आगे आएं और स्वयं भी ऐसा न करें। नशे को रोकने के लिए बुलडोज़र अभियान के स्थान पर कानून के शासन तथा पारदर्शिता को पहल दी जाए और पुनर्वास एवं रोकथाम के तरीके अपनाए जाएं। पुलिस, नशा, गैंगस्टर तथा राजनीतिक गठजोड़ तोड़ा जाए। पुलिस मुकाबलों में पारदर्शिता लाई जाए। यह पुलिस अधिकारियों की तरक्की का पैमाना न हो और प्रत्येक पुलिस मुकाबले की मैजिस्ट्रेट जांच नहीं, अपितु जजों पर आधारित टीम द्वारा जांच ज़रूरी की जाए। विजीलैंस तथा अन्य एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बंद होना भी आवश्यक है।
उदास रातों की तीरगी में ना कोई तारा ना कोई जुगनू,
किसी का नक्श-ए-कदम ही चमके तो नूर का एतबार आए।
—हऩीफ ़फौक
(तीरगी = अंधेरा)
निकाय चुनाव परिणाम तथा विधानसभा चुनाव
रोज़ रौशन रहें हालात ज़रूरी तो नहीं,
चांदनी रात हो हर रात ज़रूरी तो नहीं। 
—गोपाल कृष्ण श़फक
अभी-अभी पंजाब में नगर कौंसिल तथा निगम चुनाव हुए हैं और इससे पहले ज़िला परिषद तथा पंचायत समितियों के चुनाव भी हो चुके हैं। इन चुनावों में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने शानदार जीत प्राप्त की है, परन्तु यह आम प्रचलन है कि इन चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी ही जीत प्राप्त करती है। इस बार 8 निगमों में से 5 पर ‘आप’, एक पर कांग्रेस, एक पर भाजपा काबिज़ हुई है, जबकि एक में भाजपा आगे है, परन्तु काबिज़ नहीं हो सकी। निगम चुनाव में 2021 में ‘आप’ को 10 प्रतिशत वोट मिले थे, परन्तु अब 2026 में 36.80 प्रतिशत वोट मिले हैं। कांग्रेस को 2021 में 47 प्रतिशत और अब 2026 में 26.42 प्रतिशत, भाजपा को 2021 में 17 प्रतिशत और अब 9 प्रतिशत वोट मिले हैं। 75 नगर कौंसिलों में ‘आप’ को 2021 में 20 प्रतिशत तथा अब 2026 में 35.24 प्रतिशत वोट मिले हैं। कांग्रेस को 2021 में 40 प्रतिशत और अब 21.89 प्रतिशत, अकाली दल को 2021 में 25 प्रतिशत तथा अब लगभग 12 प्रतिशत जबकि भाजपा को 2021 में 9 प्रतिशत तथा अब 2026 में 9.46 प्रतिशत वोट मिले हैं। 
इसी प्रकार ज़िला परिषद चुनाव में 2018 में ‘आप’ के पास कोई सीट नहीं थी, परन्तु 2025 में 218 सीटें हैं। कांग्रेस के पास 2018 में 331 सीटें थीं और अब 62 हैं। अकाली दल के पास 2018 में 18 सीटें थीं और अब 46 सीटें हैं। भाजपा के पास 2018 में 2 तथा अब 2025 में 7 सीटें हैं। जबकि पंचायत समितियों में ‘आप’ के पास 2018 में 20 सीटें थीं, परन्तु अब 1529 सीटें हैं। कांग्रेस के पास 2018 में 2351 सीटों के मुकाबले अब 611, अकाली दल के पास 2018 में 353 के मुकाबले अब 449 सीटें तथा भाजपा के पास 2018 की 63 सीटों के मुकाबले अब 2025 में 73 सीटें हैं। इस सारी स्थिति पर दृष्टिपात करने पर तो चाहे ऐसे प्रतीत होता है कि पंजाब के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ की जीत सुनिश्चित है, परन्तु वास्तव में ऐसे होता नहीं। ज़रा देखें तो 2018 में जिला परिषद और पंचायत समिति तथा 2021 में नगर कौंसिल तथा निगम चुनाव में कांग्रेस ने भारी जीत प्राप्त की थी, परन्तु एक वर्ष बाद विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का हाल भी सबसे सामने है। फिर ‘आप’ तो कांग्रेस जितनी बड़ी जीत भी प्राप्त नहीं कर सकी, अपितु उसका 2022 के विधानसभा चुनाव का प्रतिशत 42.01 से काफी कम है। दूसरी ओर चाहे यह बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं, परन्तु जिला परिषद तथा पंचायत समितियों अर्थात ग्राणीण क्षेत्रों में अकाली दल तथा शहरी क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति थोड़ी सुधरी है, परन्तु इन चुनावों में दूसरे अकाली गुट चुनाव मैदान में नहीं थे। विधानसभा चुनावों में चुनावी गठबंधन का रूप धारण करते हैं और एस.आई.आर. में वोट किस वर्ग के वोट कम होते या बढ़ते हैं, इस का प्रभाव भी अपना असर दिखाएगा। अत: फिलहाल स्थानीय जिला परिषद, पंचायत समितियों, नगर कौंसिलों तथा निगमों के चुनाव परिणाम के आधार पर किसी भी पार्टी की जीत-हार का अनुमान लगाना समय से पहले की बात होगी। नि:संदेह पंजाब में सत्ता विरोधी रुझान विशेषकर कर्मचारी वर्ग में उभर रहा है, परन्तु मुफ्त बिजली तथा जुलाई से महिलाओं के मिलने वाले पैसे भी अपना प्रभाव दिखाएंगे और भाजपा के पर्दे के पीछे की रणनीति कि वह पंजाब में चुनाव जीतने के लिए लड़ती है या कांग्रेस तथा अकाली दल को खत्म करने तथा ‘आप’ को गुजरात तथा हिमाचल में कांग्रेस एवं इंडिया गुट के वोट काटने के लिए मजबूत करने की नीति पर चलती है, का प्रभाव भी 2027 के परिणाम पर काफी प्रभावी होगा, परन्तु यह स्थिति कांग्रेस के लिए कोई ज़्यादा खुश होने वाली भी नहीं, क्योंकि वह खुद ही फूट का शिकार है। ़खामोश गाज़ीपुरी के शब्दों में :

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं,
हर शब-ए-़गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

 

-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, 
समराला रोड, खन्ना-141401
-मो. 92168-60000

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