बाल श्रम के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का समय

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जब कोई बच्चा स्कूल की कक्षा में बैठने के बजाय ईंट-भट्ठे की तपिश में पसीना बहा रहा हो, जब उसके हाथों में किताबों की जगह औज़ार थमा दिए जाएं, जब खेल के मैदान की जगह कारखाने, खदानें और घरों की चारदीवारी उसका संसार बन जाए, तब यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रहती बल्कि मानव सभ्यता के माथे पर लगा ऐसा कलंक बन जाती है, जिसे किसी भी विकास, आर्थिक प्रगति या तकनीकी उपलब्धि से छिपाया नहीं जा सकता। दुनिया आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.), अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल क्रांति के नए शिखर छू रही है लेकिन करोड़ों बच्चे अभी भी अपने बचपन की कीमत पर श्रम करने को मजबूर हैं। 
प्रतिवर्ष 12 जून को ‘विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’ यह बताने के लिए मनाया जाता है कि बच्चों का स्थान श्रम बाज़ार में नहीं, अपितु विद्यालयों, खेल के मैदानों और सुरक्षित पारिवारिक वातावरण में है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) द्वारा वर्ष 2002 में शुरू किया गया यह दिवस इस वर्ष ‘बाल श्रम के खिलाफ लाल कार्ड : बच्चों के लिए निष्पक्ष खेल, व्यस्कों के लिए सम्मानजनक काम’ विषय के साथ मनाया जा रहा है। खेल की भाषा में लाल कार्ड सबसे कठोर चेतावनी माना जाता है। इस वर्ष की थीम दुनिया को यह संदेश देती है कि बाल श्रम को अब केवल एक सामाजिक बुराई नहीं बल्कि मानवाधिकारों के विरुद्ध अपराध मानते हुए उसके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का समय आ गया है।
विडंबना यह है कि बाल श्रम समाप्त करने के लिए दशकों से चल रहे वैश्विक अभियानों, कानूनों और योजनाओं के बावजूद आज भी करोज़ों बच्चे अपने बचपन से वंचित हैं। आईएलओ और यूनिसेफ की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न हैं। इनमें लगभग 7.9 करोड़ बच्चे ऐसे कार्यों में लगे हैं, जिन्हें खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। ये बच्चे खदानों, निर्माण स्थलों, कृषि क्षेत्रों, घरेलू श्रम, फैक्ट्रियों, कचरा बीनने और अन्य जोखिमपूर्ण कार्यों में लगे हुए हैं। यह स्थिति इसलिए और चिंताजनक है क्योंकि वर्ष 2000 से 2016 तक बाल श्रमिकों की संख्या में लगातार कमी आ रही थी किंतु हाल के वर्षों में यह प्रगति धीमी पड़ गई है। वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक बाल श्रमिक उप-सहारा अफ्रीका में पाए जाते हैं, जहां लगभग प्रत्येक चार में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में श्रम कर रहा है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी करोड़ों बच्चे इस समस्या से प्रभावित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, जहां बाल श्रम का अनुपात शहरी क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक है। कृषि क्षेत्र अकेले विश्व के लगभग 70 प्रतिशत बाल श्रमिकों को रोज़गार देता है। यह तथ्य बताता है कि बाल श्रम केवल औद्योगिक समस्या नहीं बल्कि ग्रामीण गरीबी और सामाजिक विषमता का भी परिणाम है।
यूनिसेफ के अनुसार कोविड महामारी के कारण लगभग 90 लाख अतिरिक्त बच्चे बाल श्रम के जोखिम में आ गए। आर्थिक असुरक्षा ने अनेक परिवारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि बच्चों की कमाई भी परिवार के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। बाल श्रम के पीछे सबसे बड़ा कारण गरीबी है, लेकिन केवल गरीबी ही इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं है। शिक्षा की अनुपलब्धता, सामाजिक असमानता, बेरोज़गारी, कमजोर कानून व्यवस्था, जनसंख्या दबाव और जागरूकता का अभाव भी इसके प्रमुख कारण हैं। कई समाजों में आज भी बच्चों के श्रम को पारिवारिक सहयोग या प्रशिक्षण के नाम पर उचित ठहराया जाता है। यही सोच धीरे-धीरे शोषण को वैधता प्रदान कर देती है। अनेक बार बच्चे ऐसे कार्यों में फंसा दिए जाते हैं, जहां से बाहर निकलना उनके लिए लगभग असंभव हो जाता है।
भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार 5 से 14 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 1.01 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी में संलग्न थे। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि बड़ी संख्या में बाल श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं, जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होता। कृषि, बीड़ी उद्योग, कालीन निर्माण, आतिशबाजी, कांच उद्योग, रत्न पॉलिश, घरेलू कार्य और छोटे कारखाने ऐसे क्षेत्र हैं, जहां बच्चों की मौजूदगी आज भी देखी जा सकती है। बाल श्रम केवल आर्थिक शोषण नहीं है, बल्कि बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी गंभीर प्रहार है। कम उम्र में लंबे समय तक काम करने से बच्चों की हड्डियों, मांसपेशियों और श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। खतरनाक रसायनों और धूल के संपर्क में रहने से उन्हें अस्थमा, त्वचा रोग, आंखों की समस्याएं और अन्य गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। 
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