सुरजीत हांस का पंजाब तथा उसके वारिसों का मेलबर्न 

ज़िला लुधियाना के गांव सुजानपुर में जन्में तथा अमृतसर से दिल्ली तक के कालेजों में इतिहास एवं अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले सुरजीत हांस मेरे बुद्धिजीवि मित्रों में प्रमुख थे। उन्होंने अपनी बेटी का नाम नानकी रखा था और नाती का सुफी। उनकी शिक्षा और दूर-दृष्टि को पंजाबी साहित्य का महारथी संत सिंह सेखों भी मानते थे।
नानकी हांस अंग्रेज़ी ट्रिब्यून के सम्पादकीय स्टाफ में कार्य करके सेवा-निवृत्त हुई हैं और सूफी 12 वर्ष पहले आस्ट्रेलिया पढ़ने चला गया था और डाक्टर बन कर वहीं काम कर रहा है। काम करते हुए उसकी मुलाकात सैलिनी नामक एक लड़की से हुई, जो बैंकर है। उसका बैंक बड़े उद्योगपतियों को कज़र् देता है। वैसे उसके माता-पिता का फार्म हाऊस बल्लारॉबट में है जो मेलबर्न से 90 किलोमीटर की दूरी पर है।
सूफी के ससुराल के पास 1700 एकड़ के दो फार्म हैं। दोनों समान रकबे में हैं। एक फिनले में और दूसरा एल्बरी में। वह एक में सिर्फ कृषि करते हैं और दूसरे में कृषि के अतिरिक्त 200 एकड़ में उनकी रिहायश है, जिसे फार्म हाऊस कहते हैं। 
नानकी हांस मई 2026 में सूफी के देखने गई सभी स्थान देखकर आई है। अपने भारत में तो हम 3400 एकड़ की मालिकी वाले जट्ट ज़िमीदार होने का सपना ही ले सकते हैं।
जब उन्हें पता चला कि नानकी के पिता एक दर्जन पुस्तकों के लेखक हैं, तो पारिवारिक सदस्य नानकी को उस कमरे में ले गए, जहां गुल्लीवर ट्रैवल्स (गुलीवर दे सफरनामे) लिखने वाले विश्व प्रसिद्ध लेखक जौनाथन स्विफ्ट की फ्रेम में जड़ी फोटो दीवार पर लटक रही थी। उन्होंने बताया कि जौनाथन स्विफ्ट उनकी एक चाची का पूवर्ज था। ऐसे कार्यन्वयन को ताश खेलने वाले रंगों का पत्ता चलना कहते हैं।
सैलिनी स्वयं तो बड़े उद्योगपतियों को कज़र् देने वाले बैंक से संबंधित है, परन्तु उनकी माता जौनाथन स्विफ्ट की परपोत्री है। सैलिनी की मौसी शैक्षणिक संस्थानों में नाटककारी पढ़ाने के अतिरिक्त फिल्मों में काम करती रही है। सैलिनी का मौसा बौद्धि बन गया था, परन्तु उसके बाद किसी स्पर्शसंचारी बीमारी का शिकार होकर अल्प आयु में चल बसा था।
सूफी प्राथमिक मैडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद एड़ी, टखना तथा पांवों के रोगों का विशेषज्ञ बन चुका है। सैलिनी की सहेली किसी ऐसे रोगी को सूफी के दिखाने के लिए आई थी, जहां दोनों की मित्रता हो गई और विवाह बंधन में बंध गए। आस्ट्रेलिया के साथ मेरी भी साझ है। 1971 में अमृता प्रीतम के नई दिल्ली स्थित मेरी मुलाकात आस्ट्रेलियन गल्पकार बैटी कालिन्ज़ से हो गई जो चार दशक पहले बैटी के निधन तक रही।
मैंने उसे अपनी कार में दिल्ली तथा नई दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें भी दिखाईं और होशियारपुर ज़िले में स्थित अपना पैतृक गांव तथा संत सिंह सेखों का दाखा भी दिखाया। उसे टाइप करना आता था और लम्बे पत्र लिखने का शौक था। उसे भारत के ऐतिहासिक स्थान इतने पसंद थे कि किसी न किसी बहाने यहां आती रही है। कम से कम तीन बार। 
एक बार जब वह सिडनी से मेलबर्न जा रही थीं तो टैक्सी ऐसे स्थान पर खराब हो गई, जहां ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं 50 किलोमीटर तक कोई आबादी नहीं थी। वह घबरा गई। फिर टैक्सी चालक ने उसे आकाश में घूमता एक हैलीकाप्टर दिखा कर शांत कर दिया जिसमें मकैनिक हो सकता था। यदि टैक्सी ठीक न भी होती तो हैलीकाप्टर टैक्सी को वहां छोड़ कर बैटी कालिन्ज़ तथा टैक्सी चालक को किसी आबादी वाले स्थान तक ले जा सकता था। बैटी को बिल्कुल नहीं पता था कि उसके देश में वहां की सरकार ने ये प्रबंध भी किए हुए थे। 
बैटी ने मुझे इस तरह की जानकारी देकर निहाल कर दिया था। सिर्फ सिडनी के बारे में ही नहीं, तस्मानिया तथा पापुया न्यू गिन्नी के बारे में भी।
नानकी का सूफी तो वहां 12 वर्ष से रह रहा है, परन्तु नानकी पहली बार वहां जाकर इतनी खुश लौटी है कि प्रत्येक वर्ष वहां कुछ न कुछ समय व्यतीत करके आया करेगी।  
अंतिका
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ऐ गर्दिश-ए-आयाम तेरा शुक्रिया
हमने हर पहलू से दुनिया देख ली। 
ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com

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