केवल खेल नहीं, वैश्विक संस्कृति का महोत्सव है ओलम्पिक

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ओलम्पिक खेल केवल एक खेल महाकुंभ नहीं बल्कि मानवता, संस्कृति, समरसता और शांति का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। यह आयोजन न केवल एथलीटों की व्यक्तिगत जीत की कहानी कहता है, बल्कि राष्ट्रों की गौरवगाथा भी रचता है। हर चार वर्ष बाद पूरी दुनिया की नज़रें जिस आयोजन पर टिकी होती हैं, वह ओलम्पिक केवल खेल या पदकों की दौड़ नहीं, बल्कि उस वैश्विक चेतना का उत्सव है, जिसमें खेल, संस्कार, साहस, संकल्प और समर्पण के स्वर एक साथ गूंजते हैं। ओलम्पिक का इतिहास मानव अभिरुचियों, आदर्शों और वैश्विक एकता का दर्पण रहा है। इसकी शुरुआत 776 ईसा पूर्व यूनान से हुई थी, जहां प्रत्येक चार वर्ष बाद एथेंस के पास के एलिमिया मैदानों में एथलेटिक्स और जूझ प्रतियोगिताएं आयोजित होती थीं। करीब सात शताब्दियों तक जारी उस पौराणिक आयोजन को 393 ईस्वी में रोमन सम्राट थ्योदोसियस ने ईसाई धर्म के प्रसार के बहाने बंद करवा दिया। उसके बाद लगभग 1500 वर्षों तक ओलम्पिक का अस्तित्व विस्मृति के गर्त में चला गया।
आज के ओलम्पिक, जिसे हम ‘आधुनिक ओलम्पिक’ कहते हैं, की पुनरुत्थान गाथा पियरे द कुबर्तिन से जुड़ी है। पियरे द कुबर्तिन के ही प्रयासों से 23 जून, 1894 को अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (आईओसी) की स्थापना हुई और इसी दिन को अब ‘अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। फ्रांसीसी शिक्षा शास्त्री कुबर्तिन ने 1894 में पेरिस में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में आधुनिक ओलम्पिक की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसका पहला प्रत्यक्ष परिणाम 5 अप्रैल, 1896 को एथेंस (यूनान) में देखने को मिला था। 13 देशों के लगभग 300 एथलीट, जो किसी आधिकारिक प्रतिनिधित्व के तहत नहीं थे, अपने निजी साधनों से वहां पहुंचे और विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लिया। उस उद्घाटन में ओलम्पिक में महिलाओं की भागीदारी नहीं थी, परंतु 1900 के पेरिस ओलम्पिक से इस दिशा में परिवर्तन शुरू हुआ, जहां 19 खेलों में 25 देशों के 1226 एथलीटों ने भाग लिया और महिलाओं को भी प्रतियोगिताओं में भाग लेने की अनुमति दी गई। 1904 के सेंट लुइस (अमेरिका) ओलम्पिक में पहली बार बॉक्सिंग को शामिल किया गया, हालांकि अधिकांश प्रतिभागी अमरीका से थे। 1908 लंदन ओलम्पिक में मोटरबोटिंग और हॉकी को अधिकारिक खेलों के रूप में शामिल किया गया था।1912 के स्टॉकहोम ओलम्पिक में पहली बार महिला तैराकों और प्रशिक्षित गोताखोरों ने भाग लिया। 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक में पहली बार मशाल रिले की शुरुआत हुई और 1936 बर्लिन ओलम्पिक में कार्ल दीम के नेतृत्व में यह परम्परा औपचारिक रूप से विकसित हुई। ओलम्पिक ध्वज, जिसमें श्वत पृष्ठभूमि पर पांच रंगीन गोले हैं, 1914 में पियरे दे कुबर्तिन द्वारा प्रस्तुत किया गया था। ये गोले पांच महाद्वीपों के प्रतिनिधित्व और वैश्विक मित्रता का प्रतीक हैं।
ओलम्पिक के साथ भारत का संबंध पेरिस 1900 से जुड़ता है, जहां नॉर्मन प्रिट्चर्ड ने दो रजत पदक जीते। हालांकि स्वतंत्र भारत को पहला ओलम्पिक पदक 1952 के हेलसिंकी ओलम्पिक में कुश्ती में खाशाबा जाधव ने कांस्य जीतकर दिलाया। भारत की हॉकी टीम ने 1928 से 1980 तक के दौर में छह स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा, लेकिन 1980 के बाद से एक लंबा सूखा रहा। 21वीं सदी में भारत की व्यक्तिगत उपलब्धियों में निरंतर सुधार देखने को मिला है। 2000 सिडनी ओलम्पिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीतकर भारतीय महिलाओं के लिए नई राह खोली। 2008 बीजिंग ओलम्पिक में अभिनव बिंद्रा ने भारत को शूटिंग में पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाया। 2012 लंदन ओलम्पिक में भारत ने 6 पदक और 2020 टोक्यो ओलंपिक में 7 पदक (1 स्वर्ण, 2 रजत, 4 कांस्य) जीते। पेरिस 2024 ओलम्पिक का आयोजन 26 जुलाई से 11 अगस्त तक हुआ। भारत से 110 एथलीटों (65 पुरुष और 45 महिलाएं) ने 16 खेलों में भाग लिया और कुल 6 पदक (1 रजत, 5 कांस्य) जीतकर भारत 71वें स्थान पर रहा। 
पेरिस ओलम्पिक भारत ने पारम्परिक खेलों हॉकी, कुश्ती, शूटिंग और एथलेटिक्स में सफलता पाई जबकि बैडमिंटन, बॉक्सिंग, तैराकी, टेनिस और जूडो जैसे क्षेत्रों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो सका। पेरिस 2024 का एक और महत्वपूर्ण पहलू था ‘इंडिया हाउस’ का आयोजन, जिसमें भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासत, खेल उपलब्धियों और भविष्य की मेजबानी की आकांक्षा को प्रस्तुत किया था। यह आयोजन भारत की खेल कूटनीति के नए युग की शुरुआत का प्रतीक था, जिसमें निजी निवेश, नीति समर्थन, कोचिंग विस्तार और बुनियादी ढांचे में सुधार की भूमिका अहम रही। भारत की ओलम्पिक यात्रा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से आगे बढ़ते हुए वह 2036 ओलम्पिक की मेजबानी की ओर स्पष्ट संकेत दे रही है। ओलम्पिक में भारत का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते उसकी योजनाएं, बुनियादी ढांचे और रणनीतियां समय पर क्रियान्वित होती रहें।

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