सर्वहिन्द गुरुद्वारा एक्ट के लिए फिर से हों यत्न 

वक्त के रहते सम्भल जाओ मेरे हमदम वरना,
वक्त फिर कब ही मिलेगा तुम्हे सम्भलने का।
—लाल फिरोज़पुरी

इस समय चाहे पंजाब में सबसे अधिक चर्चित विषय तो मुख्यमंत्री भगवंत मान के वीडियो का है, परन्तु हम फिलहाल इस पर टिप्पणी करने से गुरेज़ कर रहे हैं ताकि मामला थोड़ा और स्पष्ट रुख धारण कर ले। हालांकि यह मामला इस समय पंजाब की राजनीति में किसी  भूकम्प से कम नहीं है, परन्तु हमारे लिए इससे भी ज़रूरी मामला सिख संस्थाओं विशेषकर गुरुद्वारा प्रबंधन संबंधी आए दिन खड़े हो रहे सवालों का है। अब तख्त श्री सचखंड श्री हज़ूर साहिब का 1956 का एक्ट रद्द करके नया एक्ट बनाना सिखों को नागवार गुज़र रहा है, परन्तु महाराष्ट्र की भाजपा सरकार इस पर बज़िद दिखाई देती है। हम समझते हैं कि प्रतिदिन ऐसे उठते अलग-अलग मामलों का एकमात्र समाधान ‘सर्वहिन्द गुरुद्वारा एक्ट’ ही हो सकता है, परन्तु ऐसे एक्ट संबंधी 1999 में जो मसौदा शिरोमणि कमेटी द्वारा भारत सरकार को भेजा गया था, उसी तरह नहीं बन सकता। इस समय प्रत्येक राज्य में रहते सिखों की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां तथा हालात हैं। उनकी स्थानीय समस्याएं भी हैं। अत: सर्वहिन्द गुरुद्वारा एक्ट का नया मसौदा ऐसा होना चाहिए जो सही अर्थों में संघीय (फैडरल) हो और स्थानीय सिखों को धार्मिक तौर पर देश के सिखों के साथ एक सूत्र में पिरो कर रखे, परन्तु राजनीतिक रूप में वे पूरी तरह आज़ाद हों। ऐसा करके हम पूरे देश में और फिर पूरे विश्व में एक ही ‘रहित मर्यादा’ लागू कर सकेंगे। इसमें सभी तख्तों के जत्थेदारों की नियुक्ति तथा उन्हें हटाने का प्रावधान भी एक जैसा हो और उनके अधिकारों एवं कर्त्तव्यों संबंधी नियम निर्धारित किये जा सकते हैं। वैसे तो शिरोमणि कमेटी तथा अकाली दल किसी समय सर्वहिन्द गुरुद्वारा एक्ट के लिए मोर्चे भी लगाते रहे हैं, परन्तु अफसोस है कि बाद में जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा तथा प्रकाश सिंह बादल इससे पीछे हट गए। समझा जाता है कि उनके मन में डर था कि ऐसा करके उनका कब्ज़ा गुरुद्वारा प्रबंध से खत्म ही न हो जाए। चाहे जात-पात का सिखी में कोई सैद्धांतिक स्थान नहीं, परन्तु क्रियात्मक रूप से यह बहुत हावी है और चर्चा थी कि इस आल इंडिया एक्ट से पीछे हटने का एक कारण जात-पात भी था। हमें चाहिए कि एक ऐसा ‘सर्वहिन्द गुरुद्वारा एक्ट’ बनवा लें कि कोई भी राज्य सरकार गुरुद्वारा प्रबंधन पर हावी न हो सके। स्थानीय समस्याओं के समय सारी कौम उनके समर्थन में खड़ी हो और व्यापक स्तर पर दरपेश चुनौतियों के लिए कौम एकमात्र सामूहिक फैसला लेने के लिए एक समर्थ केन्द्रीय मंच की मालिक हो जहां प्रत्येक राज्य की सिख आबादी के अनुसार प्रतिनिधि चुने जाएं।  
नये प्रस्तावित एक्ट का विरोध क्यों?
हम ऊपर चर्चा कर ही चुके हैं कि ‘सर्वहिन्द गुरुद्वारा एक्ट’ ही देश भर में गुरुद्वारों में सरकारी हस्तक्षेप से बचने तथा सिख एक अलग कौम के सिद्धांत को बचाने का मार्ग है, परन्तु यह देखना भी ज़रूरी है कि सिख नये प्रस्तावित ‘तख्त सचखंड श्री हज़ूर साहिब अबचल नगर साहिब गुरुद्वारा एक्ट’ के मसौदे का विरोध क्यों कर रहे हैं? यहां तक कि श्री हज़ूर साहिब के पांच प्यारों द्वारा भी इसके खिलाफ गुरमता पारित किया गया है। 
पहला सवाल तो इसकी रचना को लेकर है कि चाहे इसमें अभी भी पहले की तरह ही 17 सदस्य होंगे, परन्तु पहले इनमें 4 प्रतिनिधि शिरोमणि कमेटी के, एक प्रतिनिधि चीफ खालसा दीवान का, दो सिख सांसद तथा चार सदस्य हज़ूर सचखंड दीवान के होते थे जबकि अब 12 सदस्य महाराष्ट्र सरकार नामज़द करेगी। नि:संदेह सभी सिख ही नामज़द होंगे, परन्तु सरकार का प्रभाव तो देखें कि 17 में से 12 उसके होंगे। दो सदस्य शिरोमणि कमेटी के और तीन अन्य सिख संस्थाओं के सदस्य अब नहीं लिए जाएंगे। पहले सदस्य प्रधान का चयन करते थे, परन्तु अब प्रधान भी महाराष्ट्र सरकार ही नामज़द कर सकेगी। उल्लेखनीय है कि स्थानीय सिखों को महत्व  देना अच्छी बात है, परन्तु श्री हज़ूर साहिब सिखों का 5वां तख्त है, इसलिए इसमें इतने नामज़द सदस्यों का होने क्या प्रभाव देता है। इसका जवाब सब को ही पता है। इस तरह गुरुद्वारा साहिब पर संगत का नियंत्रण बिल्कुल ही खत्म हो जाएगा, तथा सरकार का नियंत्रण पूरी तरह हावी हो जाएगा, जो लोकतांत्रिक तथा गुरुद्वारा प्रबंध में सिखों की धार्मिक आज़ादी के लिए खतरा समझा जा रहा है। वास्तव में सिखों के रद्द किए गए एक्ट में सुधार की ज़रूरत तो थी, परन्तु इस प्रकार प्रतीत होता है कि ये सुधार विपरीत दिशा में किए जा रहे हैं और सिख संगत को प्रबंध से दूर किया जा रहा है। इसे समझना ज़रूरी है कि नये का मतलब क्या है, तथा अर्थ क्या हैं?
कुछ मतलब की बातें हैं और कुछ बातें बे-मतलब की,
फर्क समझना मुश्किल है पर फर्क समझना लाज़िम है।
चन्नी के अध्यक्ष बनने के आसार 
हालांकि पंजाब कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग की राहुल गांधी के साथ निकटता किसी से छिपी हुई नहीं है, और वह स्वयं पंजाब कांग्रेस की अध्यक्षता छोड़ना भी नहीं चाहते, परन्तु कांग्रेस में उभरी गुटबंदी तथा जात-पात के समीकरणों ने उनकी अध्यक्षता खतरे में डाल दी है। वैसे यह स्पष्ट है कि उन्हें पूरी तरह दरकिनार नहीं किया जा रहा और उन्हें यदि अध्यक्षा छोड़नी भी पड़ी तो उन्हें किसी अच्छी जगह व्यवस्थित किया जाएगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस समय पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के आसार बहुत ज़्यादा हैं, क्योंकि पंजाब कांग्रेस पर काबिज़ गुट के शेष सभी विरोधी गुट चन्नी के पीछे इकट्ठा हो गए हैं और जात-पात के समीकरण भी चन्नी के पक्ष में जा रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार पंजाब कांग्रेस चुनाव लड़ने के लिए तीन विशेष कमेटियों भी बनाएगी, जिनमें सुखजिन्दर सिंह रंधावा, विजयइन्द्र सिंगला तथा यदि अध्यक्षता बदली गई तो अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग को किसी कमेटी का प्रमुख बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जातियों व वर्गों के प्रतिनिधित्व देने के लिए पार्टी के दो या तीन कार्यवाहक अध्यक्ष भी बनाए जाने के आसार हैं, जिनमें एक पिछड़े वर्ग में से हो सकता है। इस वर्ग में से एक नेता अंगद सिंह सैनी तो पहले ही व्यवस्थित किए जा चुके हैं जबकि कार्यवाहक अध्यक्ष के लिए संगत सिंह गिलजियां, हरदयाल सिंह कम्बोज तथा मदन लाल के नाम चर्चा में हैं जबकि दूसरे दो यदि बनाए जाते हैं तो एक हिन्दू तथा एक जट्ट सिख हो सकता है जबकि प्रताप सिंह बाजवा के नेता विपक्ष बने रहने के ही आसार हैं। इस समय कांग्रेसी नेताओं की हालत तो अहमद फराज़ के इस शे’अर जैसी है :
दिल को तेरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है,
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता।
एस.आई.आर. तथा सिख संस्थाओं के फज़र् 
उल्लेखनीय है कि पंजाब में सिख आबादी तेज़ी से कम हो रही है जिसके कारणों में सबसे बड़ा कारण तो सिख जोड़ों में जन्म दर सिर्फ 1.6 प्रतिशत रहना है, क्योंकि यदि आबादी स्थिर ही रखनी हो तो जन्म दर 2.1 प्रतिशत चाहिए। पंजाब में 2011 में 5 लाख, 11 हज़ार, 58 बच्चे जन्मे थे, जबकि 2020 में सिर्फ 3 लाख, 81 हज़ार, 200 बच्चों ने ही जन्म लिया। इसके अतिरिक्त प्राइमरी कक्षाओं में 3 से 8 वर्ष के सिख बच्चों की संख्या 49 प्रतिशत है जो पहले 56 प्रतिशत से अधिक होती थी। अत: स्पष्ट है कि सिखों की संख्या पंजाब में कम हो रही है। ऐसी हालत में यदि एस.आई.आर. में बंगाल तथा बिहार की तरह जहां अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों तथा ईसाइयों के वोट कम बनने के आरोप लगते हैं, की तरह सिख भी बे-परवाह रहे और यदि उनके पूरे वोट न बने तो इसका बहुत बड़ा खमियाज़ा भुगतना पड़ेगा। पंजाब में सिख आबादी कम होने के कारणों में सिखों का विदेशों में प्रवास तथा बिहार खासकर उत्तर प्रदेश और बंगाल, उड़ीसावासियों का पंजाब की ओर प्रवास भी है। इसलिए सभी सिख संस्थाओं, गुरुद्वारा कमेटियों, अकाली दलों को अपने-अपने वर्करों की विशेष ड्यूटियां लगानी चाहिएं कि वे सारे पंजाबियों, विशेषकर सिखों के जायज़ वोट न कटने दें और इसलिए घर-घर जाकर वोटरों को आवश्यक फार्म भरने तथा दस्तावेज़ बूथ स्तर के चुनाव अधिकारियों को उपलब्ध करने के लिए तैयार करें। वोटर चुनाव आयोग के बी.एल.ओज़ के सम्पर्क में भी रहें। इसके साथ ही जो प्रवासियों के वोट उनके राज्यों में हैं, उनके वोट गैर-कानूनी रूप में दूसरे स्थान अर्थात पंजाब में बनने से अवश्य रोकें। नहीं तो मीर तकी मीर का यह शे’अर बहुत याद आएगा :
ज़़ख्म झेले द़ाग भी खाये बहुत,
दिल लगा कर हम तो पछताये बहुत।
-मो. 92168-60000

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