मतदाता सूचियों और नागरिकता का गड़बड़झाला
भारतीय चुनाव आयोग और केन्द्र सरकार ने एक ही समय में देश के नागरिकों की पहचान निश्चित करने या उनकी पहचान बनाने के लिए ऐसी पहलकदमियां शुरू कर दी हैं, जिनसे एक बार तो देश-वासी अचम्भित होकर रह गए हैं। लगभग एक वर्ष पहले चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिससे लोगों में कई तरह के संदेह उत्पन्न हुए हैं। यह समीक्षा विगत वर्ष 24 जून से शुरू की गई थी। उस समय बिहार के चुनाव नज़दीक थे। चुनाव आयोग ने यह जानते हुए भी मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन (एस.आई.आर.) शुरू कर दिया था। इसके लिए तैयारियां भी कम थीं और प्रदेश के चुनाव होने में भी कम समय रहता था, जिस कारण वहां के लाखों ही लोग मताधिकार का उपयोग नहीं कर सके थे। उस समय इस सूची से लगभग 65 लाख नाम हटा दिए गए थे।
इसके उपरांत पश्चिम बंगाल की बारी आई थी, जहां चुनाव के दौरान मतदाताओं की पहचान का मामला गम्भीर रूप में सामने आया था। लाखों ही लोगों को इस सूची से बाहर कर दिये जाने से जहां विपक्षी दलों ने व्यापक स्तर पर इसकी आलोचना की, वहीं यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंचा था। इसी वर्ष मार्च माह में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की इस कार्रवाई की संवैधानिक वैधता पर मोहर लगा दी थी, परन्तु फिर भी भारतीय चुनाव आयोग की देश में कड़ी आलोचना हुई थी और उस पर केन्द्र सरकार के इशारे पर चलने के आरोप भी लगाए गए थे। अब यह कार्रवाई देश के 16 प्रदेशों और 3 केन्द्र शासित प्रदेशों में चल रही है और सूचना के अनुसार अब तक 6 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। तीसरा चरण 14 मई को शुरू किया गया था, जो इस वर्ष के अंत तक पूर्ण हो जाएगा। पंजाब में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन का यह काम जारी है। प्रदेश में इसके प्रति गम्भीरता के साथ योजनाबंदी की गई है, जिसके सन्तोषजनक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है, परन्तु सवाल यह भी है कि मतदाता सूचियों को नव-निर्माण की इस कार्रवाई में अब तक जिन 6 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, उनका भविष्य क्या होगा? क्या उनमें योग्य मतदाताओं की पहचान करके उन्हें पुन: मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा? इसी दौरान लोगों की नागरिकता की प्रमाणिकता संबंधी भी व्यापक स्तर पर गड़बड़झाला पड़ा दिखाई दे रहा है। विदेश मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट संबंधी दी गई सफाई ने इस गड़बड़झाला को और भी बढ़ा दिया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारतीय पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज़ है। इससे धारक के भारतीय नागरिक होने की प्रमाणिकता निर्धारित नहीं होती। नागरिकता की पहचान के लिए अब तक जो दस्तावेज़ उपलब्ध हैं, उनमें पैन कार्ड, राशन कार्ड और यहां तक कि आधार कार्ड भी स्थायी नागरिकता की पहचान के लिए उचित नहीं माने जा रहे। भारतीय नागरिकता एक्ट 1955 जिसके अनुसार नागरिकता जन्म या रजिस्ट्रेशन द्वारा मिलती है, आज ज्यादातर व्यक्तियों के पास जन्म प्रमाण-पत्र ही नहीं हैं। इसके लिए स्कूल रिकार्ड या पुराने सरकारी रिकार्ड की पहचान की जानी ज़रूरी है, परन्तु अब तक इनमें नागरिकता संबंधी किसी पुख्ता रिकार्ड को मान्यता नहीं दी गई। कुछ वर्ष पहले असम में भी नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप की कार्रवाई शुरू की गई थी, जिसके बाद 19 लाख से अधिक लोगों को ़गैर-नागरिक करार दे दिया गया था। अब केन्द्र सरकार द्वारा देश भर में जनगणना की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है, जिसके लिए बहुत ही विशाल और बड़ी योजनाबंदी की ज़रूरत है, ताकि यह कार्रवाई भी गड़बड़झाला की एक और कड़ी न बन जाए।
यह केन्द्र सरकार और उससे संबंधित मंत्रालयों और संस्थानों के लिए एक बड़ा चुनौतीपूर्ण मामला बना दिखाई देता है, जिसके प्रत्येक स्थिति में सन्तोषजनक परिणाम पर पहुंचने के लिए इससे समूचे ढंग से निपटा जाना बहुत ज़रूरी है। उदाहरणतया देश के स्वतंत्र होने के बाद हुए विभाजन के समय करोड़ों ही व्यक्ति नई बनी सीमाओं के आर-पार आए-गए थे। उस समय भारत में इस विस्थापन से प्रभावित लाखों ही परिवारों का पुनर्स्थापन नई सरकार और गठित हुए नए प्रशासन के समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती थी, परन्तु देश के स्वतंत्र होने के बाद जिस सन्तोषजनक ढंग से इस पूरे बड़े बिखराव को सम्भाला गया, वह एक ऐसा उदाहरण था जो आज भी 79 वर्ष बाद हमारी सरकारों के लिए एक उदाहरण बनना चाहिए।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

