चुड़ैल की कहानी
रात होते ही मोनू, बिट्टू, विक्की, पिंकी और श्वेता अपनी दादी मां के पास आकर बैठ गए और कहने लगे-‘दादा मां आज भी कोई कहानी सुनाओ न।’ आज तुम कौन सी कहानी सुनोग? दादी मां पूछ पड़ी।
‘दादी मां, दादी मां आज हम सब चुड़ैल की कहानी सुनेंगे।’
‘ठीक है, आज मैं तुम सबको एक चुड़ैल की कहानी सुनाने जा रही हूं। मगर चुड़ैल की कहानी सुनकर कोई डरेगा नहीं।’
‘नहीं दादी मां, हम सब कहानी सुनकर बिल्कुल नहीं डरेंगे।’ तो सुनो एक चुड़ैल की सच्ची कहानी। बहुत समय पहले की बात है। हमारे गांव के बाहर एक विशाल पीपल का पेड़ था। उस पेड़ पर एक चुड़ैल रहती थी। पीपल का पेड़ रास्ते में पड़ता था। इसलिए गांव के लोगों का उसी पीपल के पेड़ के रास्ते आना-जाना लगा रहता था। वह चुड़ैल दोपहर और रात में पीपल के पेड़ के नीचे आकर बैठ जाती थी। दोपहर और रात में जो भी मिल जाता उसे चुड़ैल पकड़ लेती थी और उन्हें खूब सताती थी। चुड़ैल गांव के सारे लोगों को डराकर उनकी जान भी ले चुकी थी। इसलिए गांव के लोग दोपहर और रात में पीपल के पेड़ के पास नहीं जाते थे। एक रोज मैं गोरखपुर से शाम को बस से घर आ रही थी। मेरे गांव का नाम सेमरी था। मगर बस गोला बाजार तक आती थी। गोला बाजार से सेमरी गांव तीन किलोमीटर दूर पड़ता था। उस जमाने में रिक्शा, तांगा कम चलता था। लोगों को गांव की यात्रा पैदल ही तय करनी पड़ती थी।
जब मैं गोला बाजार पहुंची तब रात के आठ बज गए थे। चौराहे पर इक्का-दुक्का लोग दिखाई दे रहे थे। मुझे अपने गांव जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला।
मैं अपना बैग कंधे पर लटका कर पैदल ही गांव को चल पड़ी। मुझे चारों तरफ दूर-दूर तक खेत और बगिया दिखाई दे रहे थे तथा रह-रहकर सियारों की आवाज़ें कानों में सुनाई पड़ रही थी।
मैं जब गांव के पीपल के पेड़ के पास पहुंची तो चुड़ैल के डर के मारे थर-थर कांपने लगी। मैं हनुमान चालीस का पाठ पढ़ने लगी। तभी वह चुड़ैल हमारे सामने आकर प्रकट हो गई। उसने सफेद साड़ी पहन रखी थीं उसके चांदी जैसे सफेद बाल हवा में लहरा रहे थे। उसके बड़े-बड़े लम्बे नाखून, बड़ी-बड़ी दांते और बड़ी-बड़ी आंखें देखकर मैं एकदम से डर गई। मेरे शरीर से पसीना बहने लगा। चुड़ैल को देखकर मेरे तो होश उड़ गए।
वह चुड़ैल मेरे पास आकर बोली आज मैं तुम्हें ज़िंदा नहीं छोडूंगी। तेरा खून पी जाऊंगी। इतना कहकर चुड़ैल ने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी ओर खिंचने लगी। तभी हमारे शरीर में न जाने कहां से शक्ति आ गई और मैं चुड़ैल को जान से मारने के लिए उस पर टूट पड़ी। मैंने चुड़ैल के बाल नोंच डाले उसकी साड़ी फाड़ डाले और उसे उठाकर जमीन पर पटक कर उसके सीने पर बैठकर उसके शरीर पर मुक्के और थप्पड़ से मारने लगी। तभी मेरे हाथ में चुड़ैल का डखना नकाब आ गया। चुड़ैल के चेहरे से नकाब हटते ही मैंने उसे पहचान लिया। वह गांव के ठाकुर साहब मोहन की पत्नी थीं।
चेहरे से नकाब हटते ही, ठाकुर साहब की बीवी बोली-‘गीता बहन यह राज की बात गांव वालों को कभी मत बताना। आज के बाद मैं चुड़ैल बनकर किसी को नहीं सताऊंगी। न किसी का जान लूंगी। मैं ठाकुर साहब के कहने पर चुड़ैल का रुप बनाकर गांव वालों को सताती रही। मेरे चुड़ैल बनने का राज ठाकुर साहब के अलावा कोई नहीं जानता था। आज मेरा राज तुमने खोल दिया। मैं तुमसे वादा करती हूं कल यह गांव छोड़कर कहीं और चली जाऊंगी। फिर वापस नहीं आऊंगी।’
मैं ठाकुर साहब की बीवी को वहीं छोड़कर घर चली आयी। घर पहुंचने पर मेरे घर वालों ने पूछा-‘क्या तुम्हें रास्ते में पीपल के पेड़ पर रहने वाली चुड़ैल नहीं मिली।’
‘नहीं, मुझे तो कोई चुड़ैल नहीं मिली।’
मेरे घर वालों ने मेरी फटी साड़ी और शरीर पर खरोंच देखकर पूछ पड़े। ‘अगर तुम्हें चुड़ैल नहीं मिली तो यह साड़ी कैसे फटी, शरीर पर यह खरोंच कैसे लगी?’
मैंने कहा रास्ते में एक जगह कांटों भर गड्ढा था। मैं उसे देख न सकी और उसी में गिर जाने के कारण मेरी साड़ी फट गई और खरोंच भी लग गई।
मैंने घर वालों से झूठ बोलकर चुड़ैल का सारा राज छुपा लिया। कुछ साल के बाद मैं गांव छोड़कर शहर गोरखपुर में अपना एक मकान बनाकर रहने लगी। बहुत साल गुजर गए मैं अपने गांव नहीं गई। मेरे कारण गांव वालों को हमेशा के लिए चुड़ैल से छुटकारा मिल गई। इस बात से मैं बहुत खुश थी।
चुड़ैल की कहानी सुनकर मोन, बिट्टू, विक्की, पिंकी और श्वेता सभी हंस पड़े और दादी मां को उसकी हिम्मत की बधाई देने लगे। (सुमन सागर)



