पहलवान से महान गायक बनने तक का मन्ना डे का स़फर

मन्ना डे सभी प्लेबैक गायकों में अपने से बेहतर केवल मुहम्मद रफी को मानते थे। जबकि दूसरी ओर मुहम्मद रफी का कहना था, ‘दुनिया मुझे सुनती है और मैं मन्ना डे को सुनना पसंद करता हूं।’ यह दो महान कलाकारों का एक-दूसरे को सम्मान देने का तरीका था, जिन्होंने साथ मिलकर 120 से अधिक युगल गीत गाये, जिनमें से अधिकतर आज भी लोकप्रिय हैं और बहुत चाव से सुने जाते हैं लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मन्ना डे गायक नहीं बल्कि पहलवान व मुक्केबाज़ बनना चाहते थे, जिसके लिए वह बहुत लगन से प्रैक्टिस भी कर रहे थे। जवानी के दिनों की कसरत का ही नतीजा था कि मन्ना डे ने 94 वर्ष की लम्बी व स्वस्थ आयु पायी, जबकि उनके समकालीन सभी गायक उनसे बहुत कम आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गये। बहरहाल, 4,000 से अधिक विभिन्न भाषाओं के गानों में अपनी आवाज़ देने वाले मन्ना डे ज़बरदस्त प्रतिभा के धनी थे कि वह पंडित भीमसेन जोशी के साथ ‘केतकी गुलाब जूही’ (फिल्म बसंत बहार, 1956) में शास्त्रीय जुगलबंदी करने में भी निपुण थे और किशोर कुमार के साथ ‘एक चतुर नार करके सिंगार’ (फिल्म पड़ोसन, 1968) जैसे कॉमेडी गाने को भी सहजता से निभा देते थे। दरअसल, मन्ना डे क्लासिकल से लेकर ़गज़ल व हल्के-फुल्के रोमांटिक गानों को गाने में माहिर थे और हर गाने में अपनी विशेष छाप छोड़ जाते थे। भला उनका गाया हुआ कालजयी गीत ‘ए मेरे प्यारे वतन’ (फिल्म काबुलीवाला, 1961) को कौन भूल सकता है जो रूह की गहराइयों में उतर जाता है। 
हिंदी फिल्मों में मन्ना डे का विशेष योगदान यह है कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत के तत्वों का पॉपुलर धुनों के साथ बहुत शानदार व प्रभावी मिश्रण किया और उनकी इस शैली ने हिंदी सिनेमा के सुनहरे युग में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। हालांकि उनके अधिकतर गीत बंगाली व हिंदी में थे, लेकिन उन्होंने भारत की 15 भाषाओं में गीत गाये जिनमें उर्दू, भोजपुरी, पंजाबी, असमी, गुजरती, कन्नड़, मलयालम व छत्तीसगढ़ी शामिल हैं। 1950 के मध्य से 1970 के दशक तक उनकी ख्याति अपने चरम पर रही। भारतीय संगीत में अपने योगदान के लिए मन्ना डे को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें पद्मश्री (1971), पदम् भूषण (2005) और दादासाहेब फाल्के अवार्ड (2007) विशेष रूप से शामिल हैं। मन्ना डे का संबंध भिंडी बाज़ार घराने से था और उन्होंने उस्ताद अमन अली खान से तालीम पायी। 
मन्ना डे का जन्म 1 मई 1919 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक बंगाली परिवार में प्रबोध चन्द्र डे के रूप में महामाया व पूरण चन्द्र डे के घर में हुआ था। अपने माता-पिता के अतिरिक्त वह अपने सबसे छोटे चाचा संगीताचार्य कृष्ण चन्द्र डे से बहुत अधिक प्रभावित व प्रेरित थे। प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने एक छोटे से प्राइमरी स्कूल इंदु बाबुर पाठशाला में हासिल की। वह 10 साल की आयु में ही स्टेज शोज़ करने लगे थे। जब वह स्कॉटिश चर्च कॉलेज में थे तो वह गोबर गुहा से ट्रेनिंग लेकर कुश्ती व मुक्केबाजी के मुकाबलों में हिस्सा लिया करते थे और उनका इरादा भी इन्हीं खेलों में अपना करियर बनाने का था। लेकिन विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की डिग्री लेने के दौरान उनका रुझान संगीत की तरफ अधिक हो गया और उस्ताद दबीर खान से तालीम लेते हुए उन्होंने लगातार तीन साल तक संगीत की तीन विभिन्न श्रेणियों में अंतर-विश्वविद्यालय प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार जीते। इस सफलता से प्रेरित होकर उनका रुझान संगीत की तरफ अधिक हो गया और अपने चाचा कृष्ण चन्द्र डे के कहने पर उन्होंने अपना स्टेज नाम मन्ना डे रखा। कृष्ण चन्द्र डे फिल्मों में संगीत निर्देशक थे। उन्होंने ही मन्ना डे को गाने का पहला ब्रेक दिया फिल्म ‘तमन्ना’ (1942) में- सुरैय्या के साथ युगल गीत ‘जागो आयी उषा, पंछी बोले जागो’। यह गीत हिट रहा और मन्ना डे अपनी गायकी में अतिरिक्त सुधार के लिए उस्ताद अमन अली खान से तालीम लेने लगे। उनकी गायकी में इतना निखार आया कि फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मन्ना डे का पहला सोलो गीत फिल्म ‘राम राज्य’ (1943) ‘गयी तू गयी सीता सती’ था और इसकी सफलता के चलते वह भक्ति गीतों के लिए संगीतकारों की पहली पसंद बन गये। यह गीत एकमात्र फिल्मी गीत था जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सुना। 
मन्ना डे ने दिसम्बर 1953 में कन्नूर, केरलम की सुलोचना कुमारन से विवाह किया। उनके दो बेटियां हुईं- शुरोमा हेरेकर (1956-2016) जो अमरीका में वैज्ञानिक रहीं और शुमिता देव (जन्म 1958), जो बेंग्लुरु में बिज़नेसवुमन हैं। सुलोचना का जनवरी 2012 में बेंग्लुरु में निधन हो गया, वह कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थीं। अपनी पत्नी के निधन के बाद मन्ना डे मुंबई में पांच से अधिक दशक गुज़ारने के बाद बेंग्लुरु के कल्याण नगर में रहने लगे। पत्नी के निधन के बाद मन्ना डे भी अधिक दिनों तक ज़िन्दा न रह सके और 24 अक्तूबर 2013 को दिल का दौरा पड़ने से उनका भी निधन हो गया, बेंग्लुरु में। वह 94 वर्ष के थे।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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