यूरोपीय देशों पर भीषण गर्मी का कहर
बात थोड़ी अचरजभरी लग सकती है, परन्तु सही मायने में देखा जाए तो यूरोपीय देश जिस तरह से भीषण गर्मी की चपेट में आए हैं, उसका बड़ा और प्रमुख कारण वायुमण्डलीय ट्रेफिक जाम माना जा रहा है। इस तरह की गर्मी का कारण ओमेगा ब्लॉक की स्थिति होती है। दरअसल यूरोप के वायुमण्डल में हीट डोम बनने के कारण ऐसा हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि सामान्य रूप से हवाएं पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए आगे बढ़ती हैं। ओमेगा ब्लॉक की स्थिति में ये हवाएं उत्तर और दक्षिण की ओर मुड़कर ग्रीक शब्द ओमेगा का आकार बना लेती है और इस तरह से वायुमण्डल में ट्रेफिक जाम के हालात हो जाते हैं। इस कारण आसमान साफ हो जाता है, गर्म हवाएं क्षेत्र विशेष में फंस जाती हैं और सूर्य की किरणें सीधे उस क्षेत्र में पड़ने लगती हैं जिस कारण गर्मी अपना असर दिखाने लगती है। इसी कारण से हीटवेव का असर अधिक हो जाता है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि सामान्यत: ऐसे हालात दो-तीन दिन या सप्ताह तक रह सकते हैं, परन्तु इस बार यूरोप में यह दौर लंबा चला है। इससे इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, जर्मनी सहित करीब 23 देश प्रभावित हुए हैं।
आस्ट्रेलियाई नेशनल यूनिवर्सिटी और सिडनी यूनिवर्सिटी की नेचर पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने छह बड़े हीटवेव्स का अध्ययन किया है। जलवायु परिवर्तन, नमी बढ़ने गगनचुंबी इमारतों में तापमान रोधक सामग्री का उपयोग न के बराबर होने और सुविधा के नाम पर इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के अत्यधिक उपयोग से वातावरण प्रभावित हो रहा है। सामान्यत: यह माना जाता है कि अधिक गर्मी बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए जानलेवा तक हो जाती है, परन्तु इस बार की हीटवेव ने अपना रौद्र दिखाया। दरअसल यूरोपवासी इतनी गर्मी के आदी भी नहीं है। इसके साथ ही हीटवेव का असर इतना अधिक रहा है कि वे स्वयं को तापमान के अनुकूल नहीं बना सके। ओमेगा ब्लॉक के कारण यूरोप में भीषण गर्मी से सड़कों की डामर पिघल गई, रेल की पटरियां टेड़ी-मेड़ी हो गईं। इससे ही हालात की गंभीरता को समझा जा सकता है। इसके कारण यातायात बाधित हो गया है। अधिक गर्मी के कारण जंगलों में आग के समाचार आम हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हालात के चलते चेतावनी जारी की है। यूरोपीय देशों में तापमान 40 सेल्सियस से अधिक पहुंच गया और इससे जनजीवन तक बुरी तक प्रभावित हो गया। देखा जाए तो यूरोप का मौसम संतुलन तक बिगड़ गया है। हालांकि प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़-छाड का परिणाम समूचा विश्व भुगत रहा है। भीषण गर्मी के कारण मौसम जनित बीमारियों और लू के चपेट में आने से हज़ारों लोगों को जीवन से हाथ धौना पड़ा है।
सीधी बात है कि यह प्राकृतिक प्रकोप कोई एक दिन की देन नहीं है। हालात को देखते हुए यूरोपीय देशों में एयर कंडीशनर जैसे उपकरणों की मांग बढ़ी है। यहां तक कि इंग्लैण्ड में 300 फीसदी से अधिक तो फ्रांस में हज़ार फीसदी तक मांग बढ़ गई है। इसके साथ ही तापमान नियंत्रित करने वाले अन्य उपकरण फ्रीज़ आदि की मांग भी बढ़ी है। हीटवेव का असर जहां सीधे तौर पर स्वास्थ्य पर पड़ता है, वहीं पूरी अर्थव्यवस्था को भी इसने प्रभावित किया है। ऐसा नहीं है कि ओमेगा ब्लॉक पहली बार बना है, बल्कि पहले भी बनता रहा है। एक ओर जिस तरह से धरती का तापामान लगातार बढ़ता जा रहा है और जिस तरह से ग्लेशियरों की पिघलने की गति तेज़ हुई और प्रदूषण का स्तर दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। अब ओमेगा ब्लॉक की अवधि बढ़ती जा रही है। इसका प्रभाव पहले से अधिक गंभीर होता जा रहा है। ऐसे में कहीं न कहीं गंभीर प्रयास करने होंगे ताकि इस तरह के हालात भविष्य में न बने। हमें ऐसी परिस्थितियां पैदा करनी होंगी जो प्रकृति के अनुकूल हो। अन्यथा पृथ्वी पर जीवन संकट में पड़ जाएगा। यह मानव सभ्यता के लिए गंभीर चुनौती से कम नहीं हैं। वैज्ञानिक तो यहां तक कहने लगे हैं कि भविष्य में तापमान में दो से तीन डिग्री बढ़ोतरी धरती पर गंभीर संकट का संकेत होगा।
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