एक लेखक का पुनर्जन्म
भोर की पहली किरण अभी पेड़ों की ओट से झांक ही रही थी कि अमलतास के पेड़ों पर टंगे पीले फूलों ने ओस की बूंदों को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया। हवा में भीगी हुई मिट्टी और रात की रानी की मद्धम पड़ती खुशबू घुली हुई थी। प्रकृति का यह मौन उत्सव अभी शुरू ही हुआ था कि आलोक की नींद खुल गई। खिड़की के बाहर चहचहाते पक्षी जैसे किसी नए अध्याय का स्वागत कर रहे थे।
अमर उजाला काव्य के डिजिटल पटल पर अपना नाम और उसके ठीक नीचे अपनी उन चंद पंक्तियों को निहारना वीरेन्द्र के लिए महज एक सुखद संयोग नहीं था। यह उस ब्रह्मांडीय स्वीकृति की पहली मुहर थी, जिसके लिए वह न जाने कितनी गुमनाम रातों से तड़प रहा था। उस सुबह जब उसने ईमेल के इनबॉक्स में देखा और पाया कि उसकी रचना वेबसाइट पर प्रकाशित कर दी गई है, तो उसे लगा जैसे उसके अस्तित्व का कोई खोया हुआ हिस्सा उसे वापस मिल गया हो। वह नाम, जो अब तक केवल स्कूल के रजिस्टरों या सरकारी दस्तावेजों तक सीमित था, आज सार्वजनिक चेतना का हिस्सा बन गया था। उस दिन के बाद से जैसे उसके जीवन में एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया। कभी किसी स्थानीय दैनिक में कोई छोटा सा लेख छप जाता, तो कभी किसी साहित्यिक पत्रिका के हाशिए पर उसकी कोई कविता जगह बना लेती। कभी-कभार किसी अनाम संपादक का संक्षिप्त और औपचारिक फोन आता, जो वीरेन्द्र के लिए किसी राजकीय सम्मान से कम नहीं होता था। उन दिनों उसे लगता था कि शब्द ही संसार हैं और इन शब्दों के माध्यम से वह दुनिया को बदल सकता है।
जब भी उसकी कोई रचना छपती, वह उसे कई बार पढ़ता। कभी पाठकों से प्रशंसा मिल जाती, कभी कोई सुझाव दे देता, तो वीरेन्द्र को लगता कि उसकी आवाज अब शून्य में नहीं भटक रही। उसे महसूस होता कि उसकी चेतना के तंतु समाज के उन अनछुए कोनों से जुड़ रहे हैं जहां तक वह स्वयं कभी नहीं पहुंच सका था। लेकिन जैसे-जैसे ख्याति के छोटे-छोटे द्वीप आकार लेने लगे, उसके भीतर कुछ अनकहे और चुभने वाले सवाल भी पनपने लगे। वह अक्सर आधी रात को अपनी ही लिखी पंक्तियों को पढ़ता और सोचता कि क्या यह सब वास्तव में असली है? क्या लोग उसके शब्दों की गहराई तक जा पा रहे हैं, या वे केवल उस नाम के पीछे भाग रहे हैं जिसे अब ‘उभरता हुआ लेखक’ कहा जाने लगा था? क्या उसकी कहानियां उन झुर्रियों वाले चेहरों, उन धूल भरे गांवों और उन सूनी आंखों तक पहुंच पा रही हैं जिनके दु:ख को उसने अपनी कहानी का आधार बनाया था?
एक दिन एक अनजान नंबर से उसके पाठक ने उसे फोन किया। उसने बताया कि उसकी ताजा कहानी पढ़कर उसे अपने पुरखों का वह घर याद आ गया जो बरसों पहले बाढ़ की भेंट चढ़ गया था। वह पाठक अपनी व्यथा सुनाने लगा और वीरेन्द्र चुपचाप सुनता रहा। उस दिन वीरेन्द्र के भीतर एक अनकही तृप्ति भर गई। उसे पहली बार लगा कि लेखक की सार्थकता किसी पुरस्कार में नहीं, बल्कि उस एक व्यक्ति की आंखों की नमी में है जो उसके शब्दों के साथ अपनी सांसें साझा कर रहा है। उसे लगा कि वह अब अकेला नहीं है। लेकिन विडंबना यह थी कि इसी संतोष के गर्भ से एक गहरा संदेह भी जन्म ले रहा था।
रात के सन्नाटे में, जब पूरा घर गहरी नींद में होता, वीरेन्द्र अपनी पुरानी कहानियों के पुलिंदे निकालकर मेज पर फैला देता। वह हर वाक्य को, हर विराम चिन्ह को ऐसे देखता जैसे वह किसी अजनबी की कृति हो। कई बार उसे लगता कि उसकी कहानियां भाषाई दृष्टि से बहुत सुंदर हैं, उपमाएं सटीक हैं और विस्तार अद्भुत है, लेकिन क्या वे सच हैं? उसे याद आता कि उसके पात्र कहीं आकाश से नहीं टपके थे। वे उसी गांव की सौंधी मिट्टी से उपजे थे जहां उसका बचपन बीता था। वे खेतों में काम करने वाली वे स्त्रियां थीं जिनकी पीठें जेठ की तपती धूप में झुलसकर काली पड़ गई थीं, लेकिन जिनकी आंखों में कभी व्यवस्था के प्रति कोई औपचारिक शिकायत नहीं दिखी। वे बूढ़े किसान थे जो हर साल मानसून की पहली फुहार के साथ नई उम्मीदें बोते थे और हर बार कर्ज के बोझ तले कुछ और टूटकर लौटते थे।
वीरेन्द्र खुद से पूछता क्या वह वास्तव में उनकी पीड़ा को शब्द दे पा रहा है? या वह केवल उनके दुखों को सुंदर, कलात्मक वाक्यों में सजाकर एक साहित्यिक उत्पाद बना रहा है? यह विचार उसे भीतर तक हिला देता। जब समाज के प्रबुद्ध लोग उससे कहते, ‘वीरेन्द्र जी, आपने ग्रामीण जीवन का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है,’ तो उसके भीतर का रचनाकार धीरे से फुसफुसाता ‘क्या यह वास्तव में उनकी आवाज़ है, या उसकी कल्पना का एक सुविधाजनक विस्तार?’ क्या उसने उन औरतों के पसीने की गंध को सचमुच महसूस किया है, या उसने केवल उस गंध के बारे में एक ‘सुंदर’ गल्प लिख दिया है? यह नैतिक द्वंद्व एक साये की तरह उसके पीछे चलने लगा। उसे लगने लगा कि सौंदर्य और सत्य के बीच एक बारीक रेखा होती है, और वह शायद केवल सौंदर्य के पाले में खड़ा होकर सत्य का तमाशा देख रहा है।
समय के साथ उसका लेखन बदलने लगा। अब वह केवल घटनाएं नहीं लिखता था। वह उनके पीछे छिपे मौन को पकड़ने की कोशिश करता। उसे समझ आने लगा था कि जो कहा गया है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह है जो अनकहा रह जाता है।
एक शाम वह शहर के एक पुराने पुस्तकालय में बैठा था। वहां की हवा में पुरानी जिल्दों, धूल और वक्त की एक मिली-जुली महक थी। ऊंची लकड़ी की अलमारियों में बंद हजारों किताबें जैसे अपने-अपने समय की गवाही दे रही थीं। बाहर डूबती हुई धूप की पीली किरणें खिड़की के कांच से छनकर फर्श पर एक टेढ़ा-मेढ़ा आकार बना रही थीं।
वीरेन्द्र अपनी डायरी में किसी नई कहानी के शुरुआती वाक्य को लेकर जूझ रहा था। उसे लग रहा था कि शब्द उसके वश में नहीं आ रहे। तभी एक बहुत ही वृद्ध व्यक्ति, जिनके चेहरे पर अनुभवों की गहरी लकीरें थीं, उनके पास आकर बैठ गए।
उन बुजुर्ग ने बिना कुछ कहे वीरेन्द्र की डायरी के बिखरे पन्नों को कुछ देर तक देखा, फिर एक धीमी लेकिन असरदार मुस्कान के साथ बोले, ‘तुम वीरेन्द्र हो न? मैंने तुम्हारी कुछ कहानियां पढ़ी हैं।’
वीरेन्द्र थोड़ा झेंप गया और संकोचवश अपनी डायरी बंद करने लगा। बुजुर्ग ने उसका हाथ रोक लिया और कहा, ‘घबराओ मत। तुम्हारे पास अब काफी कहानियां इकट्ठी हो गई हैं। क्यों न इन्हें एक संग्रह का रूप दे देते?’
वीरेन्द्र चुप रहा। बुजुर्ग ने आगे कहा-
‘याद रखना बेटा, एक किताब सिर्फ लेखक का सपना नहीं होती। वह उसके समय की गवाही होती है। अगर तुम नहीं लिखोगे, तो यह समय यूँ ही गुजर जाएगा।’ (क्रमश:)



