आगा खान पैलेस के बिना स्वतंत्रता आन्दोलन की हर कहानी अधूरी

भारत की स्वतंत्रता का जश्न मनाते हुए हमें यह याद अवश्य रखना चाहिए कि हमारे देश को आज़ादी एक रात में नहीं मिली थी। यह लगभग 200 वर्षों का संघर्ष था, जिसमें हमारे पूर्वजों को विविध प्रकार की कठिनाइयों से गुज़रना पड़ा था, स्वतंत्रता हासिल करने के लिए क्योंकि एक ताकतवर अंग्रेज़ हुकूमत से लड़ना आसान नहीं था। पूरा देश ही जंग का मैदान बन गया था और हर किसी ने अपने अपने तरीके से इस संघर्ष में योगदान दिया था। इसलिए बहुत से स्थल इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण हो गये कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका अनमोल रही। अब ये सभी जगहें पर्यटक स्थल बन गयी हैं, जिनमें से एक आगा खान पैलेस भी है, जो न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन की बारीकियों को समझने के लिए आवश्यक है बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जिनके नेतृत्व में देश आज़ाद हुआ, के विचारों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। 
सुबह पुणे रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद मैंने पहले फ्रेश होकर नाश्ता किया और फिर होटल के बाहर ही सड़क पर आकर आगा खान पैलेस के लिए ऑटो रिक्शा लिया। हालांकि सिटी बस भी वहां तक जाती है, लेकिन ऑटो रिक्शा को मैंने इसलिए प्राथमिकता दी, क्योंकि वह सीधा मुझे मेरी मंजिल तक ले जाता। लगभग 7 किमी का सफर तय करने के बाद मैं आगा खान पैलेस के सामने था। उसकी भव्य इमारत को देखते ही मुझे एहसास हुआ कि जैसे मैंने इतिहास के पन्नों में प्रवेश कर लिया हो। आगा खान पैलेस का काम्प्लेक्स इतालवी मेहराबों व विशाल लॉन्स का विशिष्ट मिश्रण है। इसी जगह पर गांधी स्मारक समिति की बैठकें नियमित आयोजित की जाती हैं। यह पैलेस 19 एकड़ में फैला हुआ है और इसके प्रांगण में पांच हॉल हैं। दो मंजिला इमारत की ‘परिक्रमा’ एक अढ़ाई मीटर चैड़ा गलियारा करता है। 
अब यह इमारत गांधी मेमोरियल सोसाइटी का मुख्यालय बना हुआ है। इसके अतिरिक्त यहां सैंकड़ों तस्वीरें, कलाकृतियां हैं, जिनका गांधी जी से संबंध है, जिनसे गांधी जी को समझने और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके विशिष्ट योगदान को समझने का अवसर मिलता है। पैलेस में खादी व अन्य हैंडलूम टेक्सटाइल्स की दुकानें भी हैं। पैलेस की प्रमुख गतिविधियों में आज भी खादी का बुना जाना शामिल है। इस पैलेस का निर्माण सुल्तान मुहम्मद शाह आगा-3 ने 1892 में कराया था। यह भारत के इतिहास में अति महत्वपूर्ण लैंडमार्क है और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक अहम पलों का स्रोत भी यही है। गांधी जी, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी, सरोजनी नायडू व महादेव देसाई को अंग्रेजों ने इसी पैलेस में कैद में रखा था। इसलिए इस पैलेस का महत्व दोनों आर्किटेक्चरल व ऐतिहासिक है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कोई कहानी आगा खान पैलेस के ज़िक्र के बिना पूर्ण नहीं हो सकती। 
पुणे के आसपास के क्षेत्र भीषण अकाल से प्रभावित हो गये थे। लोगों के पास न खाने को था और न ही रोज़गार था। इन लोगों की मदद करने के लिए सुल्तान ने इस पैलेस का निर्माण कराया था। बाद में आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरेया ने पैलेस के प्रांगण में कस्तूरबा गांधी व महादेव देसाई की याद में उनके स्मारकों का भी निर्माण कराया। इस पैलेस में एक म्यूजियम भी है, जिसमें उस दौर की तस्वीरों के साथ ही गांधी जी की व्यक्तिगत चीज़ें भी हैं। गांधी जी की अस्थियों को भी पैलेस के लॉन में दफनाया गया है। आगा खान पैलेस को 2003 में राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया गया था। आगा खान पैलेस के इतिहास की जड़ें बहुत गहरी हैं। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी, उनकी पत्नी कस्तूरबा व उनके सचिव महादेव देसाई को 9 अगस्त, 1942 से 6 मई, 1944 तक यहीं बंद रखा गया था। इसी कैद के दौरान दोनों कस्तूरबा गांधी व महादेव देसाई का निधन हो गया था, इसलिए दोनों के स्मारक इसी पैलेस में हैं। 
गांधी जी व उनके दर्शन के सम्मान में आगा खान ने 1968 में आगा खान पैलेस भारत के नागरिकों को दान कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1974 में इस पैलेस की यात्रा की और इसके रख रखाव के लिए 20,000 रुपये वार्षिक आवंटित किये। अब यह राशि बढ़कर एक करोड़ रुपये हो गई है। पैलेस में चहलकदमी करते हुए मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं गांधी जी के रूबरू हूं। जैसे वो मुझसे कह रहे हों- ‘हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकालकर/मेरे बच्चों इस देश को रखना संभालकर।’ हालांकि दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी जी को पहली सफलता चम्पारण सत्यग्रह में मिली थी, जहां अंग्रेज़ भारतीय किसानों से आजीविका के लिए आवश्यक फसलों की बजाय जबरन नील की खेती करा रहे थे, जिसे कपड़े डाई करने के काम में लाया जाता है। गांधी जी ने इसका अहिंसक तरीके से विरोध करके कामयाबी पायी और यही अहिंसा उनकी राजनीति का आधार बन गई। चम्पारण में वृंदावन व अशोक स्तम्भ देखने लायक हैं लेकिन अगर गांधी जी को समझना है तो आगा खान पैलेस की यात्रा अवश्य करें।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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