कवि प्रदीप की देशप्रेम गीतों में दिलचस्पी 

रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी, जो कवि प्रदीप के नाम से अधिक विख्यात हुए, ने देशप्रेम व देशभक्ति से संबंधित सैंकड़ों प्रभावी गीत लिखे, जिनमें से सर्वश्रेष्ठ 5 का चयन करना कठिन है, लेकिन उनके कुछ गीत ऐसे हैं जो न सिर्फ आज तक लोगों की ज़ुबान पर हैं (और भविष्य में भी रहेंगे) बल्कि उनके साथ ऐसे दिलचस्प किस्से जुड़े हुए हैं कि काम आसान हो जाता है। 
प्रदीप ने परम वीर मेजर शैतान सिंह भाटी के बारे में सुना था। वह उनकी कुर्बानी व बहादुरी से इतने प्रभावित हुए कि ‘ए मेरे वतन के लोगो’ गीत की रचना कर बैठे, जो देश का सबसे महान देशभक्ति गीत बना, जिसे लिखने के लिए प्रदीप को भारत सरकार ने राष्ट्रीय कवि घोषित किया। प्रदीप चाहते थे कि इस गीत को लता मंगेशकर गायें, लेकिन उस समय संगीतकार सी रामचंद्र व लता के बीच बोलचाल बंद थी, इसलिए रामचंद्र आशा भोंसले से यह गीत गवाना चाहते थे। प्रदीप को लगता था कि लता के अतिरिक्त कोई अन्य गायिका इस गीत से न्याय नहीं कर सकती। वह लता के लिए ज़िद पर अड़ गये। आखिर थककर रामचंद्र ने प्रदीप से कहा कि वह लता को अगर उनके साथ काम करने के लिए मना लेंगे तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। प्रदीप लता के पास गये और बोले कि रामचंद्र के नाम पर भड़कें नहीं, पहले गीत सुन लें। गीत सुनते ही लता की आंखों में आंसू आ गये, वह गीत गाने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन इस शर्त पर कि रिहर्सल व रिकॉर्डिंग पर प्रदीप मौजूद रहेंगे। इस तरह यह कालजयी गीत बना जिसे 26 जनवरी, 1963 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर नेहरूजी के समक्ष गाया गया और वह भी इसे सुनकर रो पड़े थे। 
प्रदीप ने इस गीत की रॉयल्टी ‘वॉर विडो फंड’ को दान कर दी थी, लेकिन सारेगामा (एचएमवी) ने आनाकानी की तो 25 अगस्त, 2005 के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश से 10 लाख रुपये का बकाया फंड में गया। प्रदीप ने 1987 में कहा था, ‘आपको कोई देशभक्त नहीं बना सकता। यह जज्बा आपके खून में होता है, जो आपको देश की सेवा करने के लिए प्रेरित करता है और आपको अलग बनाता है।’ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फिल्म ‘किस्मत’ ऐसे समय रिलीज़ हुई थी जब ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन’ चल रहा था और देश के लगभग सभी राष्ट्रवादी नेता सलाखों के पीछे थे। कवि प्रदीप ने बहुत होशियारी के साथ इस फिल्म के लिए ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है’ गीत लिखा। चूंकि इस गीत में ‘जर्मन व जापानी’ शब्दों का प्रयोग हुआ था (शुरू हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठो हिन्दुस्तानी/तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी/आज सभी के लिए हमारा यही कौमी नारा है/दूर हटो ए दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है) इसलिए ब्रिटिश शासक इससे धोखा खा गये, विशेषकर इस वजह से भी कि वह दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी व जापान के विरुद्ध लड़ रहे थे और सेंसर बोर्ड ने इस गीत को पास कर दिया। 
लेकिन गीत के पहले बंद (दूर हटो ए दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है। जहां हमारा ताज महल है और कुतुबमीनार है/जहां हमारे मंदिर मस्जिद सिखों का गुरुद्वारा है/इस धरती पर कदम बढ़ाना अत्याचार तुम्हारा है/दूर हटो ए दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है) से ही भारतीय दर्शक समझ गये थे कि यह अंग्रेजों के विरोध में व भारतीयों में देश प्रेम जागृत करने के लिए लिखा गया है। इसलिए वह सिनेमाघरों में इस गीत को बार-बार चलाने की मांग करते थे। देशभर के थिएटरों में ‘वन्स मोर, वन्स मोर’ के नारे गूंजते और जनता को संतुष्ट करने के लिए रील को रीवाउंड करके गीत को कई बार सुनाया जाता था। ‘किस्मत’ ने उस समय का बॉक्स ऑफिस इतिहास रच दिया कि एक सिनेमाघर में तो साढ़े तीन साल तक चली। बहरहाल, ब्रिटिश को जल्द ही अपनी चूक का एहसास हो गया कि गीत के असल अर्थ तो कुछ और हैं और प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए गये। गिरफ्तारी से बचने के लिए प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा। इस गीत का उल्लेख करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने संस्मरणों में लिखा, ‘प्रदीप जी दूरदर्शी थे, उन्होंने चित्रपट की क्षमता को पहचान कर एक सशक्त माध्यम के रूप में उसका इस्तेमाल किया।’ प्रदीप ने एक अवसर पर पंडित नेहरू से कहा था, ‘देशभक्ति के गीत लिखना मेरा रोग है, मैं इस रोग से ग्रस्त हूं।’
फिल्म ‘जागृति’ में कवि प्रदीप ने देशभक्ति पर तीन शानदार गीत लिखे, जिन्हें हम क्रमश: तीसरे, चौथे व पांचवें नंबर पर रखना चाहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि प्रदीप महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे और प्रेम भी, इसलिए फिल्म ‘जागृति’ का गीत- ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’- जो उन्होंने गांधी जी के सम्मान में लिखा, वह उनके दिल की आवाज़ ही है। इसी फिल्म में गीत ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’ हमारे देश के गौरवशाली इतिहास पर केंद्रित है और हमें इतिहास-पुरुषों से प्रेरणा लेकर देशप्रेम के लिए प्रेरित करता है। एक दिलचस्प बात यह है कि ‘जागृति’ को 1956 में रफीक रिज़वी ने पाकिस्तान में ‘बेदारी’ के नाम से बनाया और प्रदीप के गीतों में बेशर्मी से पाकिस्तानी प्रतीकों को ठूंस दिया, मसलन प्रदीप का गीत है ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’ को ‘आओ बच्चो सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की’ कर दिया गया। इस हरकत पर इतना विवाद हुआ कि पाकिस्तान सरकार को इस फिल्म व गीत पर सख्ती के साथ पाबंदी लगानी पड़ी। कुछ साल पहले इस गीत को किसी ने पाकिस्तान टीवी पर फिर प्रसारित कर दिया था। तब भी विवाद हुआ और गीत को पुन: प्रतिबंधित किया गया। बहरहाल, फिल्म ‘जागृति’ का एक अन्य गीत नेहरू जी के सम्मान में है - ‘हम लायें हैं तूफान से किश्ती निकाल के’, जो बताता है कि आज़ादी कितनी मुश्किलों से मिली है, जिसे संभालकर रखने की आवश्यकता है। यह गीत आज भी बाल दिवस (14 नवम्बर) पर विशेषरूप से गाया जाता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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