किसानों की आय कैसे बढ़ाई जाए ?
पंजाब की बहुसंख्यक आबादी के विकास और आजीविका का आधार कृषि है। पंजाब में लगभग 65 प्रतिशत लोग कृषि से अपनी आजीविका चला रहे हैं। यह आबादी देश की औसत से ज़्यादा है। जीडीपी में कृषि का योगदान कम हो रहा है। विगत चार दशकों से अधिक समय से कृषि का रकबा लगभग स्थिर बना हुआ है। चाहे धान की काश्त का कुछ रकबा प्रत्येक वर्ष बढ़ रहा है। सिंचाई वाला रकबा ज़रूर बढ़ा है और नहरों का पानी भी खेतों तक पहुंचाया गया है। कृषि का 99 प्रतिशत रकबा सिंचाई के अधीन है, लेकिन इसके बावजूद ज़मीन की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है जो गंभीर समस्या है, जिसे रोकने की ज़रूरत है। इस वर्ष खरीफ में धान की फसल बहुत अच्छी है, जिससे उत्पादन बढ़ने की सम्भावना है। पंजाब के अधिकतर ब्लॉकों में भू-जल स्तर कम हो रहा है, जहां नये ट्यूबवेल नहीं लग सकते।
पंजाब में धान और गेहूं का उत्पादन अन्य राज्यों से अधिक है, परन्तु अब दूसरे राज्य जैसे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि भी उत्पादन के पक्ष से आगे आ रहे हैं। पंजाब के उत्पादन में स्थिरता लाने के लिए प्रयासों की ज़रूरत है। पहली सब्ज़ क्रांति के दौरान कृषि का विकास तो हुआ, लेकिन वह दीर्घकालिक नहीं था। वर्ष 1980-85 के बीच कृषि विकास दर देश की आर्थिक विकास दर से अधिक रही, लेकिन 1997-98 में यह कम हो गई। 2002-03 में भारत ने गेहूं निर्यात किया। फिर 2007-08 में बाहर से मंगवाया। उसके बाद देश आत्म-निर्भर ही नहीं, अपितु निर्यात करने के योग्य भी हो गया।
पंजाब की कृषि आर्थिकता धान और गेहूं पर ही आधारित है। उत्पादन बढ़ाने में बीजों की अहम भूमिका है। बीजों और नई किस्मों संबंधी जागरूकता बढ़ी है, लेकिन अभी भी बीज दर कम है। विगत दो वर्षों में यह देखा गया कि डीलरों और अन्य संस्थाओं की बीजों की बिक्री बहुत कम हुई है और किसान अपना बीज ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इस रूझान को रोकने की ज़रूरत है। अब 82 प्रतिशत काश्त अधीन रकबे में से 32-33 लाख हेक्टेयर में धान, बासमती और 35 लाख हेक्टेयर रकबे में गेहूं की काश्त होती है। पंजाब का केन्द्रीय पूल में गेहूं का योगदान 40 प्रतिशत और चावल का 23 प्रतिशत तक है। गेहूं का औसत उत्पादन 50 क्ंिवटल प्रति हेक्टेयर और धान का औसत उत्पादन 70 क्ंिवटल प्रति हेक्टेयर तक रहा। संशोधित बीजों का इस्तेमाल और बीज बदल दर बढ़ने से उत्पादन और बढ़ सकता है। किसान मेलों और किसान प्रशिक्षण शिविरों के ज़रिए संशोधित बीज अधिक किसानों तक पहुंचते हैं। बीज वितरण प्रबंधन की पूर्ण योजनाबंदी करने की ज़रूरत है ताकि दूरवर्ती गांवों के छोटे किसानों तक पहुंचाए जा सकें। पीएयू लुधियाना और अन्य संस्थाओं द्वारा ऐसे यत्न किये जा रहे हैं। आईसीएआर—इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. विश्वानाथन सी. का कहना है कि आईएआरआई द्वारा पंजाब को अधिक पैदावार देने वाली अन्य किस्में विकसित करके देने के यत्न किए जा रहे हैं। गेहूं और बासमती की सफल किस्मों के बीज किसानों को देने के लिए आईएआरआई का प्रभावशाली योगदान है। कृषि को व्यापारिक तौर पर लाभदायक बनाने की ज़रूरत है। कृषि व्यवसाय मुनाफे के लिए अपनाया जाए, सिर्फ निर्वाह के लिए नहीं। पीढ़ी दर पीढ़ी ज़मीन के अधिकारों के कारण खेतों का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है। लगभग 60 प्रतिशत किसानों के पास 10 एकड़ से कम ज़मीन है। इसलिए किसानों की कृषि से होने वाली आय कम है, जिससे किसान निराश हैं। लेज़र कराहे के इस्तेमाल को व्यापक स्तर पर उत्साहित किया जाना चाहिए। इस तकनीक से खेतों को समतल करने के बाद पानी एक समान लगता है और खाद, खासकर यूरिया, का बहुत अच्छे से इस्तेमाल होता है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ता है। पानी की बचत क्यारी में रोपाई जैसी तकनीक अपना कर भी की जा सकती है और धान की सीधी बुवाई जो इस वर्ष बढ़ी है, और बढ़ाई जा सकती है। किसानों का लक्ष्य अपनी आय बढ़ाना होना चाहिए, जिसके लिए सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए।
ज़मीन की उपजाऊ शक्ति का कम होना, भू-जल स्तर में गिरावट, पर्यावरण प्रदूषित होना और मौसम में बदलाव पंजाब में कृषि की गंभीर समस्याएं हैं। कृषि में सरकारी लागत बढ़ाने की ज़रूरत है। किसान पहले से ही कज़र् तले दबे हुए हैं और पंजाब में प्रति व्यक्ति कज़र् दो राज्यों के बाद तीसरे नम्बर पर है। किसानों की आय बढ़ाने और फसली विभिन्नता लाने के लिए गेहूं-धान के अलावा अन्य फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद होनी ज़रूरी है। इससे फसली विभिन्नता भी आएगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी। कृषि अनुसंधान में लागत बढ़ाकर इसे मज़बूत किया जाए। मुख्य समस्या यह है कि सरकार की नीतियां उपभोक्ता-पक्षीय अधिक हैं और किसान सहायक कम। ये किसान और उत्पादक पक्षीय होनी चाहिएं।



