चीनी की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाना ज़रूरी

विगत कुछ दिनों में गन्ना से उत्पादित वस्तुओं चीनी और गुड़ की कीमतों में एकाएक आए बड़े उछाल ने एक ओर जहां मध्यम-वर्गीय और आम गरीब आदमी की चाय का स्वाद कसैला किया है, वहीं आगामी त्योहारी मौसम में आवश्यक रूप से प्रयुक्त होने वाली मिठाइयों की टोकरी के दाम आकाश की ओर बढ़ने की सम्भावनाएं पैदा कर दी हैं। सरकार ने बेशक स्थितियों की गम्भीरता को तत्काल रूप से भांपते हुए चीनी एवं गुड़ के बढ़ते दामों को थामने हेतु चीनी के आयात की घोषणा की है, किन्तु अच्छा होता अगर सरकार इस मामले में पहले ही चेत गई होती जब चीनी के दामों के बढ़ने की आहट ही अभी सुनाई दी थी। वैसे सरकार की चीनी आयात संबंधी इस घोषणा से स्थितियों की विकरालता का पता भी चल जाता है क्योंकि चीनी के आयात की यह नौबत विगत दस वर्ष के बाद आई है। चार वर्ष पूर्व तक देश से चीनी योरुपीय संघ और अमरीका को निर्यात की जाती थी। फिर एकाएक ऐसी क्या नौबत आ गई कि रुपयों में बिकती चीनी को विदेशों से डॉलरों के बदले खरीदना पड़ रहा है।
नि:संदेह इस गम्भीर स्थिति के लिए केन्द्र सरकार की एथेनॉल बनाने और इसे पेट्रोल में मिला कर बेचने की नई नीति कुछ हद तक उत्तरदायी तो हो सकती है, किन्तु इसके लिए यह एकमात्र बड़ा कारण नहीं है। सरकार ने बेशक इसके लिए खराब मौसम को ज़िम्मेदार माना है, किन्तु यह भी इतना बड़ा कारण नहीं है कि जिससे चीनी की कीमतें आसमान छूने लगतीं। तथापि एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार देश भर में चीनी के सरकार-नियंत्रित स्टॉक में 20 प्रतिशत की कमी तो आई है। यह कमी क्यों आई, समस्या की जड़ यहीं कहीं है। इसी सर्वेक्षण के अनुसार इस वर्ष किसानों ने दालों, तिलों और अन्य मोटे अनाज पदार्थों की अपेक्षा गन्ना की काश्त अधिक की है। इससे एथेनॉल वाली बात यहां सटीक भी नहीं बैठती। इससे पूर्व देश की चीनी मिलें देश की कुल ज़रूरत से 30-40 लाख टन अधिक चीनी का उत्पादन करती थीं, तथा इसी बढ़े उत्पादन से चीनी का निर्यात किया जाता था।
नि:संदेह देश की चीनी संबंधी नीतियों के अनुपालन में चूक तो अवश्य कहीं हुई है। अब जो चीनी के आयात का फैसला सरकार ने लिया है, उससे भी देश के गन्ना उत्पादक किसानों और चीनी मिलों का नुक्सान तो अवश्य होगा। एक अन्य विशेषज्ञ के अनुसार पिछले वर्ष नवम्बर में बीस लाख टन चीनी का निर्यात भी मौजूदा स्थिति के उपजने में सहायक हुआ हो सकता है। बेशक इस स्थिति के लिए कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं हो सकता। चीनी की कीमतों में वृद्धि दर्ज होने की आहट ़गालिबन मार्च के महीने से आने लगी थी किन्तु अगस्त मास के प्रारम्भ से, जब पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का विवाद देश में शुरू हुआ, उसके बाद से तो जैसे चीनी की कीमतें बड़ी तेज़ी से उछली हैं। इस मामले से जुड़ा एक अन्य पक्ष यह भी है कि गुड़ की कीमतें भी एकाएक बढ़ने लगी हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी बड़ी संख्या में लोग चीनी की बजाय गुड़ वाली चाय पीते हैं। तो भी, मौजूदा त्योहारी मौसम के शुरू में ही चीनी की कीमतों में हुई यह अथाह वृद्धि आने वाले दिनों में उग्र रूप दिखा सकती है।
हम समझते हैं कि बेशक इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए केन्द्र सरकार को सामूहिक एवं समन्वित प्रयासों की बड़ी आवश्यकता होगी। चीनी के आयात का फैसला भी स्थायी समाधान तो कदापि नहीं है। इससे चीनी और महंगी होने का भी खतरा है। इससे देश का किसान और चीनी उद्योग भी प्रभावित हो सकता है। किसानों ने इस वर्ष गन्ना की अधिक काश्त की है। चीनी मिलों को चीनी के अधिक उत्पादन हेतु प्रेरित करना भी समस्या का एक समाधान हो सकता है। हम समझते हैं कि स्थितियों को काबू में करने के लिए सरकार को तत्काल रूप से अनुचित भण्डारण, जमाखोरी, घरेलू मांग और निर्यात के बीच संतुलित व्यवहार पर कड़ी नज़र रखनी होगी। देश में चीनी की कृत्रिम कमी पैदा करने वालों पर भी अंकुश लगना चाहिए। सरकार को आगामी दिनों में चीनी का उत्पादन बढ़ाने और निर्यात रोकने पर भी दृढ़ता से अमल करना होगा। ऐसे कुछ नियंत्रित एवं सतत् प्रयासों से चीनी की कीमतों के सुरसा-मुख को बन्द किया जा सकता है।

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