पाकिस्तान द्वारा गुप-चुप सैनिक तैयारी के मायने !
पाकिस्तान ने बला की तेजी दिखाते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान ध्वस्त आतंकी ठिकानों, प्रशिक्षण केंद्रों को फिर से खड़ा कर लिया। जैश-ए-मोहम्मद जिसे संयुक्त राष्ट्र और अमरीका आतंकवादी संगठन मानते हैं, उसके बहावलपुर स्थित मरकज़ सुभानल्लाह परिसर का सैन्य कार्रवाई के बाद फिर बनाना उस नेटवर्क का पुनर्संगठन और पाकिस्तान की मिलीभगत बहुत कुछ कहती है। मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच मुस्लिम नाटो के रूप में देखे जाने वाला एक त्रिपक्षीय रणनीतिक समझौता, जिसमें अब किसी एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, के बाद अमरीकी विदेश विभाग ने पाकिस्तान के सैन्य इरादों पर निशाना साधा। पाकिस्तान ने अपना रक्षा व्यय अचानक अंधाधुंध तरीके से तीन ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये (लगभग 10.8 अरब डॉलर) बढ़ा दिया। यह उसके संघीय खर्च का करीब 16 प्रतिशत और अनुमानित जीडीपी का 2 प्रतिशत से अधिक है। इससे अमरीका ने सवाल खड़े कर दिये कि जब देश में गरीबी दर तीस प्रतिशत तक पहुंच रही हो और 7 करोड़ से अधिक लोग अत्यधिक गरीबी में जीने को मजबूर हैं, तो मिलिट्री और इंटेलिजेंस पर यह खर्च कितना उचित है? जिस देश को आर्थिक स्थिरता, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए संसाधनों की सख्त जरूरत है, वहां सैन्य क्षमता विस्तार को इतनी प्राथमिकता क्यों? उसका दावा है कि इस रक्षा व्यय पर पर्याप्त संसदीय और नागरिक निगरानी नहीं हुई। पाकिस्तान ने पैसे कहां खर्च किए इसका कोई हिसाब किताब नहीं है।
इसी महीने पाकिस्तान में लगातार साठ घंटों तक हर बार देर रात को रावलपिंडी के नूर खान और कराची के मसरूर एयरबेस पर तुर्की के सी-130 सैन्य विमानों की और मुरीदके एयरबेस पर ए-400-एम विमान की आवाजाही ने दुनियाभर के कान खड़े कर दिये। पता लगा कि इसके जरिये तुर्की ने पाकिस्तान को बायरक्तार टीबी2 और अकिंसी ड्रोन के अलावा एआई-गाइडेड क्रूज मिसाइल तथा कुछ अन्य घातक हथियारों की बड़ी खेप पहुंचाई। सीपरी के अनुसार 2021 से 2025 तक पाकिस्तान के हथियार आयात में 66 प्रतिशत वृद्धि हुई और वह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा प्रमुख हथियार आयातक देश बन गया है। तुर्की और चीन की मदद से पाकिस्तान का अपना हथियारों का जखीरा बढ़ाना सामान्य बात है पर इस तरह गुपचुप तरीके से लेना सवाल खड़े करता है। भले मक्का समझौता सामान्य पहल हो पर उसमें बांग्लादेश को साथ लेना प्रश्न पैदा करता है। आखिर पाकिस्तान की मंशा क्या है? उसे किससे इतना खतरा है कि इतनी तैयारी की ज़रूरत है या फिर किसे अपनी सैन्य ताकत दिखाना है? वह यह सब किस रणनीतिक उद्देश्य के लिये कर रहा है? भारत ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से उसका प्राथमिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। यों तो अफगानिस्तान के साथ उसकी क्षेत्रीय दुश्मनी हाल के महीनों में खुले सैन्य संघर्ष में बदल गई है, पर क्या उस छोटे से देश के विरुद्ध इतनी बड़ी तैयारी है? बलूचिस्तान के सक्रिय बलूच विद्रोही समूहों की गतिविधियों के नियंत्रण के लिये भी इतनी तैयारी गैर मुनासिब है। इस तरह बचता सिर्फ भारत ही है।
यह ठीक है कि इन हथियारों का एक छोटा हिस्सा पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा अभियानों, अफगानिस्तान और बलूच विद्रोहियों के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है लेकिन भारत को असली खतरा इस संभावित दोहरे इस्तेमाल से है। पाकिस्तान जिस सैन्य क्षमता को बलूचिस्तान के लिए खरीदता है, वही क्षमता भविष्य में भारत के खिलाफ भी इस्तेमाल की जा सकती है। यही कारण है कि ‘बलूचिस्तान बहाना है और भारत निशाना’ के नारे को भले अभी निष्कर्ष की तरह नहीं तो भी गंभीर सुरक्षा परिकल्पना की तरह तो देखना ही चाहिए। पाकिस्तान की रणनीति लंबे समय से पारंपरिक युद्ध और अप्रत्यक्ष युद्ध दोनों को साथ लेकर चलने की रही है। ड्रोन इस रणनीति के लिए अत्यंत सुविधाजनक माध्यम हैं- कम लागत, कम जोखिम, सीमा पार घुसपैठ के बिना हमला, निगरानी और हथियार पहुंचाने की क्षमता। पाकिस्तान केवल परंपरागत हथियारों की संख्या नहीं बढ़ा रहा बल्कि युद्ध की प्रकृति बदलने वाली प्रणालियों- ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, निगरानी प्रणालियों, वायु रक्षा और सटीक मारक क्षमता पर जोर दे रहा है।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौता नई चिंता पैदा करता है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने जिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, इसमें किसी एक पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला मानने के अलावा रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। इसे सीधे-सीधे ‘भारत विरोधी सैन्य गठबंधन’ कहना तो ठीक नहीं, लेकिन इसके रणनीतिक परिणामों को कम करके नहीं आंका जा सकता। बांग्लादेश का इससे संभावित जुड़ाव बेहद संवेदनशील है। यदि ढाका पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये के रक्षा ढांचे में औपचारिक रूप से शामिल होता है, तो भारत के पश्चिमी मोर्चे के साथ पूर्वी पड़ोस में भी एक नया रणनीतिक समीकरण और घेरेबंदी की वजह बन सकता है। वैसे भी पहली बार पाकिस्तान को एक ऐसे त्रिपक्षीय ढांचे में जगह मिली है, जिसमें एक परमाणु शक्ति, एक बड़ी रक्षा औद्योगिक अत्यंत सम्पन्न आर्थिक शक्ति एक साथ हैं।
तुर्किये द्वारा भारत को ड्रोन देने से साफ इन्कार और खुद तुर्की ड्रोन पाकर खुश पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद यह सीख ज़रूर ली होगी कि केवल ड्रोन खरीदना पर्याप्त नहीं होता; सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कमांड-एंड-कंट्रोल, मिसाइल और काउंटर-यूएएस प्रणालियों का एकीकृत नेटवर्क अधिक निर्णायक है। उसने देखा होगा कि 2025 में उसके ड्रोन और मिसाइल हमलों को भारत की वायु रक्षा प्रणालियों के एकीकृत प्रयास ने कैसे निष्क्रिय किया था। हाल में भारतीय सेना ने पश्चिमी मोर्चे पर पहला समर्पित ड्रोन बटालियन भी गठित किया है। सीमा और शहरी क्षेत्रों में मोबाइल काउंटर-ड्रोन प्रणालियों को मजबूत करने के लिए भी नए कदम उठाए जा रहे हैं। पाकिस्तानी तैयारी का हमारा जवाब बेहतर नेटवर्क, अधिक संख्या, स्वदेशी उत्पादन और तेज निर्णय-चक्र है।
परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरी को उसकी सैन्य कमजोरी समझना भूल होगी। कभी-कभी कंगाली में भी सेना की राजनीतिक प्रधानता बढ़ जाती है। पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा खर्च, चीन पर उसकी भारी हथियार निर्भरता, तुर्किये के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग और आतंकी ढांचे के पुनर्जीवन की खबरें मिलकर एक ऐसा सुरक्षा वातावरण बना रही हैं जिसमें भारत को न तो चिंता की जरूरत है, न आत्मसंतुष्ट होने की। भविष्य का युद्ध केवल लड़ाकू विमानों और मिसाइलों का नहीं होगा। वह ड्रोन, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उपग्रह, साइबर क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और कूटनीतिक गठबंधनों का भी होगा। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



