नेपाल में भयावह जलप्रलय, भरत रहे सतर्क

नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर 26 अगस्त, 2026 की सुबह लगभग 8 बजकर 37 मिनट पर तेज झटके महसूस किये गये। शुरुआत में इन झटकों के बारे में अमरीकी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) ने इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप माना। लेकिन कुछ ही घंटों बाद यह बात सामने आयी कि यह भूकंप नहीं, वास्तव में ये झटके पहाड़ के एक बड़े हिस्से के बर्फ  और चट्टान सहित ल्हेंदे खोला नदी में टूटकर गिर जाने की वजह से आये। ल्हेंदे खोला नदी, भोटेकोशी नदी की सहायक नदी है। भोटेकोशी नदी चीन से निकलकर नेपाल में प्रवेश करती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पहाड़ से ग्लेशियर का जो बड़ा हिस्सा टूटने के साथ भारी लैंड्लाइड हुआ, उस कारण ज़मीन में भूकंप जैसा तेज झटका महसूस किया गया। वैज्ञानिकों की इस पुष्टि के बाद यूएसजीएस ने भी स्पष्ट किया कि उसने सुबह जो भूकंप महसूस किया था, वह झटका वास्तव में पहाड़ से हुए बड़े लैंड्लाइड के कारण पैदा हुआ था और जिसकी तीव्रता 4.4 नहीं बल्कि 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी यानी भूकंप पहले नहीं आया था बल्कि लैंड्लाइड से भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ था। वास्तव में इस जलप्रलय की भयावहता को देखकर उसी तरह पूरी दुनिया सहम गई है। जैसे 16 जून 2013 को शाम करीब 5 बजकर 15 मिनट पर केदारनाथ में ग्लेशियर के टूटने से भयावह आपदा आयी थी। 
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इस तबाही में 175 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और करीबन 2100 से ज्यादा लोग लापता थे, जिसमें 300 भारतीय, 550 तिब्बती, 826 नेपाली और 300 से ज्यादा भारतीयों को छोड़कर अन्य विदेशी लोग थे। लेकिन जानकारों को आशंका है कि इससे कहीं ज्यादा लोग इस जलप्रलय के शिकार हो सकते हैं। अभी तक इस भयावह त्रासदी में जान गंवाने वाले जिन लोगों के शव बरामद हुए हैं, उनमें से 165 नेपाली और 3 तिब्बती लोगों की पुष्टि हुई है। आपदा के बाद से आज सुबह 11 बजे तक (27 अगस्त 2026) 116 लोगों को सुरक्षित निकाला गया था, जिसमें 95 नेपाली और 21 भारतीय तथा कुछ अन्य थे।
इस जलप्रलय के जो वीडियो सामने आये हैं वे इस कदर रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं कि पूरी दुनिया में भय की लहर दौड़ गई है। आपदा की भयावहता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तिब्बत-चीन सीमा पर बने ग्यिरोंग पोर्ट के पांच मंजिला इमिग्रेशन कॉम्प्लैक्स में जब लोगों ने खतरे को भांपकर भागने की कोशिश की, तो पलक झपकते मलबे की लहरों ने पांच मंज़िला कॉम्प्लैक्स को अपने में समेटते हुए ताश के महल की तरह चकनाचूर कर दिया। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद इसे देखकर सकते में हैं। तिब्बत से निकली यह भयावह जलप्रलय नेपाल को अपने आगोश में समेटते हुए अब भारत की तरफ  आगे बढ़ रही है। 27 अगस्त, 2026 की सुबह 11 बजे तक नेपाल की त्रिशूली नदी से होते हुए इस जलप्रलय की बाढ़ बिहार में बहने वाली गंडक नदी तक पहुंच गई थी, जिसमें लोगों ने देखा है कि मलबे के साथ भैंस और फ्रिज तक बह रहे थे। 26-27 अगस्त की रात 12 बजे नेपाल की ओर से करीब 150 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया, जिसके लिए बगहा स्थित गंडक बैराज के 36 गेट खोल दिये गये। नेपाल की इस तबाही से भारत में बिहार के कई ज़िलों को एलर्ट पर रखा गया है, जिनमें पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली के साथ सीतामढ़ी और शिवहर को भी एलर्ट कर दिया गया है। बिहार के बाद बाढ़ का यह पानी उत्तर प्रदेश के महराजगंज और कुशीनगर को भी अपनी चपेट में ले सकता है। इसलिए यहां भी एलर्ट जारी किया गया है। 
इस भयावह त्रासदी के बाद भारत ने नेपाल को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक राहत सामग्री की दो खेप भेज चुका था। हिमालय क्षेत्र में एक देश की आपदा दूसरे देश की आपदा बनने में घंटों नहीं, कभी-कभी कुछ मिनटभर का समय लेती है। इस त्रासदी का सटीक वैज्ञानिक कारण भले अभी अंतिम रूप से निर्धारित न हुआ हो, लेकिन प्रारंभिक जांच में प्लेनेट लैब के सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर नेपाल-चीन सीमा से लगभग 20 किलोमीटर बर्फीले पहाड़ के भू-स्खलन को जो भयावह दृश्य सामने आया है, उससे साफ  हो गया है कि इसमें आंख मूंदकर जलवायु परिवर्तन की भूमिका तलाशनी जल्दबाजी होगी। इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) ने स्पष्ट रूप से कहा है कि साल 1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्रफल और 9 प्रतिशत अनुमानित बर्फ  का भंडार खोया है। 1975 के बाद से कुछ स्थानों पर बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी हो चुकी है और 2000 के बाद से तो ग्लेशियल आईस लॉस की दर दोगुनी बनी हुई है। इसका अर्थ केवल जलवायु परिवर्तन तक नहीं जाता बल्कि लगातार हिमालय क्षेत्र में हो रहे विकास व निर्माण कार्य भी हैं। 
नेपाल की इस भयावह जलप्रलय के बाद सभी क्षेत्रीय देशों को तुरंत और भारत को तो खास तौर पर अपनी निगरानी व्यवस्था कई स्तर की और तेज करना होगा। भारत को चीन से स्पष्ट मांग रखनी चाहिए कि सीमा विवाद अपनी जगह है, लेकिन बाढ़ तथा जलवायु संबंधी जीवन रक्षक डेटा राजनीति से ऊपर रखकर तुरंत साझा किया जाना चाहिए। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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