जेन अल्फा के आंदोलन को गम्भीरता से लें सरकारें

जंतर-मंतर (नई दिल्ली) पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जेन-ज़ी ने प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की जवाबदेही व शिक्षा नीतियों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। अब सीजेपी का फोकस देशभर के सरकारी स्कूलों में सुधार लाने के संदर्भ में है, लेकिन इस सिलसिले में अग्रणी भूमिका जेन अल्फा निभा रही है। ज़मीनी स्तर पर स्कूली छात्रों का यह आंदोलन बुनियादी स्कूल इन्फ्रास्ट्रक्चर व बेहतर शैक्षिक सुविधाओं की मांग कर रहा है। विस्तृत राजनीतिक प्रदर्शनों के विपरीत जेन अल्फा स्कूली छात्रों का फोकस इस बात पर है कि स्कूलों में पीने का साफा पानी उपलब्ध हो, खाने योग्य मिड-डे-मील हो, शौचाल्य साफ सुथरे हों, कक्षाओं में पंखें व कुर्सी-मेज़ हों और पर्याप्त संख्या में अध्यापक हों। जेन अल्फा के ये प्रदर्शन व धरने मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में देखने को मिल रहे हैं। इन राज्यों में अधिकतर सरकारी स्कूलों में हालात बद से भी बदतर हैं कि किसी स्कूल में एक अध्यापक है या एक भी नहीं है और कोई स्कूल जानवरों के तबेले में चल रहा है। 
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में सर्वोदय इंटर कॉलेज के 1500 से अधिक जेन अल्फा छात्रों ने स्कूल में ख़राब सैनिटेशन व पीने का पानी न होने के विरोध में ज़बरदस्त धरना दिया, जिससे स्कूल व ज़िला प्रशासनों को हस्तक्षेप करते हुए लिखित में आश्वासन देना पड़ा। राजस्थान में छात्रों ने स्कूल के दरवाज़ों पर ताले लगाकर कक्षाओं का बायकाट किया, क्योंकि पर्याप्त संख्या में अध्यापक नहीं थे। राज्य सरकार तुरंत हरकत में आयी और टीचिंग स्टाफ  को तैनात किया। मध्य प्रदेश व बिहार में जेन अल्फा ने सड़कों व स्थानीय प्रशासनिक कार्यालयों के सामने ख़राब मिड-डे-मील को लेकर विरोध प्रदर्शन किये, नतीजतन आधिकारिक जांच के आदेश दिये गये। जेन अल्फा प्रदर्शनकारियों ने अपनी स्थानीय परेशानियों व शिकायतों को उजागर करने के लिए सोशल मीडिया व डिजिटल टूल्स का भी भरपूर इस्तेमाल किया। 
राज्य सरकारों को चाहिए कि वह जेन अल्फा की उचित मांगों व शिकायतों का संज्ञान लें और सरकारी स्कूलों के हालात बेहतर करने के लिए कदम उठाएं। लेकिन देखने में कुछ और ही आ रहा है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि जहां सरकारें अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिशों में लगी हुई हैं, वहीं ऐसे लोगों व संगठनों की भी कमी नहीं है, जो आपदा में अवसर तलाशते हुए अपनी राजनीतिक व आर्थिक रोटियां सेकने के जुगाड़ में लग गये हैं। जो सोशल मीडिया यूजर्स सरकारी स्कूलों में तथाकथित अनियमितताओं को उजागर कर रहे हैं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी जा रही हैं। उत्तर प्रदेश के कम से कम आठ ज़िलों में सरकारी स्कूलों की दयनीय हलात के वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए एफआईआर करायी गई हैं और अन्य अनेक ज़िलों में बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) ने लगभग समान निर्देश जारी किये हैं कि यू-ट्यूर्ब्स व अन्य ‘बाहरी व्यक्ति’ बिना अनुमति के कैंपस में प्रवेश करके फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी नहीं कर सकते। 
गौरतलब है कि इस किस्म का आदेश सबसे पहले राजस्थान के शिक्षामंत्री ने जारी किया था। कुछ सरकारी स्कूलों को तो तिरपाल, शामियाने आदि से भी ढका गया ताकि कोई दूर से वीडियोग्राफी न की जा सके। इस पर्दादारी की ज़रूरत ही न पड़ती अगर राज्य सरकारें स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने पर ध्यान देतीं, जैसा कि दिल्ली व दक्षिण के कुछ राज्यों में दिया गया। 
एफआईआर या गिरफ्तारी इस समस्या का समाधान नहीं है। एक 30 वर्षीय ग्रामीण कुलदीप यादव ने हाथरस (गांव नओली, सिकंदराराव) के एक सरकारी स्कूल के टूटे व पानी भरे हिस्से का वीडियो पोस्ट किया, जिसके वायरल होने के बाद उसे जेल भेज दिया गया। शिक्षा विभाग का आरोप है कि संबंधित ग्रामीण ने ‘भ्रम फैलाने’ के लिए ‘स्कूल के उस हिस्से को फिल्म किया जिसका इस्तेमाल नहीं किया जाता है’। इस स्कूल की चारदीवारी नहीं है, जिससे ग्रामीण अपने मवेशी स्कूल के अंदर ले आते हैं और स्कूल में गंदगी फैलती है, इस बात को शिक्षा विभाग ने भी माना है। 
सीजेपी ने 15 अगस्त, 2026 को अपना ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान आरंभ किया था, जिसके तहत अभिजीत दीपके ने वालंटियर्स से आग्रह किया था कि वह सरकारी स्कूलों में जायें, उनकी स्थिति को रिकॉर्ड करें और फुटेज को अपलोड करें। स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सबके सामने लाने का यह एक अच्छा प्रयास है, जिससे राज्य सरकारों पर दबाव बनाया जा सकता है कि वह स्कूलों को ठीक करें। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अपने व्यूज़ बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ यू-ट्यूर्ब्स बिना अनुमति के सरकारी स्कूलों में घुस जाते हैं और स्कूल व स्टाफ की तस्वीरें व वीडियो लेकर सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं, जिससे पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और अध्यापकों की छवि भी खराब हो सकती है। 
देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों की हालत चिंताजनक है। नीति आयोग व शिक्षा मंत्रालय के डाटा के अनुसार 2014-15 व 2024-25 के दौरान देशभर में 94,000 सरकारी स्कूलों को बंद किया गया या दूसरे स्कूलों में मिलाया गया यानी औसतन 25 स्कूलों के साथ रोज़ाना ऐसा हुआ। इस अवधि के दौरान 2.26 करोड़ छात्रों ने सरकारी स्कूलों को छोड़ा। यूडीआईएसई के हाल के डाटा में बताया गया है कि देश में 1,00,843 स्कूलों में सिर्फ  एक अध्यापक है, जबकि इन स्कूलों में 33 लाख से अधिक छात्र हैं। दरअसल, अध्यापकों का वेतन इतना ज़्यादा कर दिया है कि राज्य सरकारें नई नियुक्तियों से कतराती हैं। फिर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है। बहरहाल, अगर राज्य सरकारों ने सरकारी स्कूलों के हालात सुधारने के लिए जल्द सकारात्मक कदम न उठाये, तो जेन अल्फा व जेन-ज़ी का ‘स्कूल ठीक करो’ आंदोलन ज़बरदस्त राजनीतिक व चुनावी मुद्दा बन सकता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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