ब्रिक्स सम्मेलन : भारतीय कूटनीति की अग्नि-परीक्षा
नई दिल्ली में 12-13 सितम्बर, 2026 को जब दुनिया की 11 उभरती शक्तियों के नेता एक मेज पर आमने-सामने बैठेंगे, तब भारत के सामने केवल एक शिखर सम्मेलन को सफलतापूर्वक आयोजित करने की चुनौती भर नहीं होगी। असली परीक्षा उस कूटनीति की होगी, जिसे भारत वर्षों से अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ बताता आया है। इस बार दांव बड़ा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत आ रहे हैं, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मौजूद होंगे और पश्चिम एशिया का युद्ध ब्रिक्स के भीतर ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के हितों को आमने-सामने ला रहा है अर्थात नई दिल्ली को एक साथ चीन से संवाद करना है, रूस से साझेदारी बरकरार रखना है, पश्चिम से संबंध और वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व यानी एक साथ चारों मोर्चे साधने होंगे। यही वह क्षण है, जब भारत की कूटनीति को केवल संतुलन बनाने वाली नहीं बल्कि मतभेदों के बीच सहमति गढ़ने वाली शक्ति साबित होना है। ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए एक अवसर ज़रूर है, लेकिन इस बार यह अवसर जितना बड़ा है, अग्नि परीक्षा भी उतनी ही कठिन है।
भारत इस समय एक असाधारण रूप से जटिल मंच की अध्यक्षता कर रहा है। ब्रिक्स अब ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक ही नहीं सीमित। अब इसके मित्र इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त 10 भागीदार देश भी हैं— बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाखस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम। भारत में अपनी अध्यक्षता का आधार, ‘बिल्डिंग फॉर रेजिलिएशन, इनोवेशन, को-ऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ रखा है। पूरे साल 25 से अधिक शहरों में सम्पन्न 350 से अधिक बैठकों के बाद जब यह उच्चस्तरीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है, तब पूरी दुनिया की निगाहें इसकी तरफ हैं। ऐसा होना स्वाभाविक ही है। दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्था भारत और अमरीका के बाद दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति चीन दोनों इस संगठन के प्रमुख देश हैं। लेकिन भारत की कूटनीति की अग्नि परीक्षा यह सम्मेलन इस मायने में भी है कि इन दोनों उभरती हुई आर्थिक महाशक्तियों के बीच सीमा तनाव लगातार जारी है। हालांकि 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के ठीक पहले दोनों देशों ने बातचीत के कई दौर चलाकर किसी हद तक सीमा विवाद पर तात्कालिक रूप से नरमी दिखायी है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि यह लगातार मौजूद सीमा विवाद खत्म हो।
हम सब जानते हैं रूस और पश्चिम के बीच लगातार टकराव जारी है। सऊदी अरब और यूएई की अपनी सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं और दोनों को न-न करते ईरान के साथ कुछ गहरे मतभेद भी हैं। फिर भी ये सब एक मंच में जब बैठे होंगे तो उस बैठक को सार्थक बनाने में भारतीय कूटनीति को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ेगा। ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका की वैश्विक प्राथमिकताएं ब्रिक्स के दूसरे देशों से अलग हैं। ऐसी भिन्न-भिन्न प्राथमिकताओं और समीकरणों वाले देशों को एक ताकतवर समूह के रूप में एकत्र करना और इन सबकी साझी ताकत को एक दिशा देना भारत जैसे मौजूदा अध्यक्ष के लिए दो खंभों में बंधी रस्सी पर चलने जैसा है। यह संतुलन तब और कठिन हो जाता है, जब मौजूदा समय में विश्व व्यवस्था एक असाधारण तनाव से गुज़र रही हो। 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में अंतिम समय तक पहले लग रहा था कि शायद शी जिनपिंग नहीं आएंगे और अब जबकि इन पंक्तियों के लिखे जाने के कुछ घंटे पहले ही उनके आने की अधिकृत घोषणा हुई है, तो एक तरफ जहां इस सम्मेलन का अतिरिक्त महत्व बढ़ गया है, वहीं भारत के लिए शी जिनपिंग की मौजूदगी एक महत्वपूर्ण चुनौती भी बन गई है।
साल 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद दोनो देशों के राजनीतिक संबंधों में गंभीर गिरावट आयी थी। अब सीमा पर तनाव कम करने, रुके हुए संवाद को न सिर्फ बहाल करने बल्कि तेज़ करने तथा आर्थिक संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिशें हो रही हैं। भारत-चीन संबंधों में सुधार का अर्थ यह भी नहीं है कि दोनो देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। भारत को इन दोनों वास्तविकताओं को एक साथ संभालना होगा। यही भारतीय कूटनीति की पहली और शायद सबसे बड़ी परीक्षा है कि चीन से संवाद भी हो और राष्ट्रीय हितों पर स्पष्टता भी बनी रहे।
भारतीय कूटनीति की इस सम्मेलन में दूसरी बड़ी परीक्षा यह होगी कि ब्रिक्स ‘चीन-रूस’ धुरी बनकर न रह जाए। ब्रिक्स के विस्तार के साथ ही यह एक बात लगातार चलती रहती है कि क्या यह पश्चिमी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था का विकल्प बनने की तरफ बढ़ रहा है, भारत के लिए यहां भी रास्ता साफ है। भारत ऐसे ब्रिक्स में है, जो वैश्विक दक्षिण की मज़बूत आवाज़ बने, लेकिन किसी एक शक्ति के प्रभुत्व में खुद का विलय न कर ले। व्यापार, विकास-वित्त, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक संस्थाओं के सुधार जैसे विषयों पर ब्रिक्स वास्तविक उपयोगिता पैदा कर सकता है। भारत को अपनी अध्यक्षता में इन्हीं व्यवहारिक और विकासोन्मुखी नीतियों को स्पष्ट करना है।
वास्तव में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय विदेश नीति की यही वह मानक रस्सी है, जिस पर उसे इस सम्मेलन में लगातार सावधानी के साथ चलना होगा। इस सम्मेलन को केवल अंतिम घोषणा पत्र की भाषा से भी आंकलन उचित नहीं होगा। इतने विविध समूह में हर मुद्दे पर पूर्ण सहमति बन जाए, यह आसान नहीं है। इसलिए असली सफलता यह होगी कि भारत मतभेदों को बातचीत की प्रक्त्रिया से बाहर न जाने दे। यदि पश्चिम एशिया पर शब्दों को लेकर मतभेद होते हैं, तो भारत की भूमिका समझौता कराने वाले मध्यस्थ की होनी चाहिए। यदि वित्तीय सहयोग पर चीन और भारत की प्राथमिकताएं भिन्न हों, तो भारत को अपनी वैकल्पिक और व्यवहारिक सोच सामने रखनी होगी। यदि वैश्विक संस्थाओं के सुधार पर सभी सहमत हों, तो भारत को उस सहमति को ठोस बदलाव में बदलने की कोशिश करनी होगी। कुल मिलाकर अध्यक्षता का अर्थ केवल बैठक बुलाना भर नहीं है। असहमति को उपयोगी संवाद में बदलना भी है और यही इस सम्मेलन के दौरान भारत की सबसे कठिन कूटनीतिक परीक्षा होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



