गेहूं के अधिक उत्पादन के लिए उचित योजनाबंदी की ज़रूरत
गेहूं रबी की मुख्य फसल है, जिसकी काश्त 35 लाख हेक्टेयर रकबे पर की जाती है। चाहे इसकी बुआई का उचित समय नवम्बर का पहला पखवाड़ा है, परन्तु कुछ किसान अक्तूबर के तीसरे सप्ताह के दौरान उन किस्मों की बुआई शुरू कर देते हैं जो पकने में थोड़ा ज़्यादा समय लेती हैं। बुआई का ज़ोर नवम्बर के पहले सप्ताह शुरू होता है। भारत विश्व का दूसरा बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और पंजाब इस पक्ष से भारत के राज्यों में अग्रणी है। सब्ज़ क्रांति शुरू होने के बाद गेहूं का उत्पादन अब 9-10 गुना बढ़ गया है। 1964-65 में यह 1 करोड़ 23 लाख टन था और अब 12 करोड़ टन से अधिक हो गया है। पंजाब का उत्पादन 1.7 करोड़ से 1.8 करोड़ टन के आस-पास है। साल 2023-24 के दौरान यह 181.76 लाख टन था। पंजाब का प्रति एकड़ उत्पादन सबसे अधिक है, जो उस वर्ष 51.70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था जबकि भारत का औसत 35.90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस उपलब्धि का श्रेय कृषि वैज्ञानिकों और मेहनती किसानों को जाता है। चाहे पंजाब में गेहूं की बुआई शुरू होने में अभी एक महीने से अधिक का समय शेष है, लेकिन किसानों ने इस संबंध में अभी से सोच-विचार और योजनाबंदी शुरू कर दी है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित पीबीडब्ल्यू-887, पीबीडब्ल्यू-872, पीबीडब्ल्यू-826, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित एचडी-3386 और आईआईडब्ल्यूबीआर द्वारा विकसित डीबीडब्ल्यू-327, डीबीडब्ल्यू-371 और डीबीडब्ल्यू-372 किस्में किसानों की मुख्य पसंद हैं। किसान अपने अनुभव के आधार पर किस्मों का चयन करते हैं। कुछ समय से कुछ किसान गेहूं के बीज विक्रेता बन गए हैं और वे अप्रमाणित किस्में जो परीक्षण के अधीन हैं और फसलों की किस्मों एवं मानकों संबंधी स्वीकृति देने वाली अखिल भारतीय समिति द्वारा भी जारी नहीं की हुईं, किसानों को नए बीज कह कर महंगे दाम पर बेच रहे हैं। इनमें कुछ सिद्धांतहीन बीज विक्रेता भी शामिल हैं। किसानों को ऐसी किस्मों का बीज इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उन्हें अनुभव के आधार पर और वैज्ञानिकों की सलाह से ही किस्मों का चयन करना चाहिए। गेहूं का पूरा उत्पादन लेने के लिए किस्मों के चयन के अलावा फसल का अच्छा प्रबंधन जैसे समय पर बुआई, बीज की सही मात्रा, सिफारिश की गई रासायनिक खाद समय पर डालने के अतिरिक्त सिंचाई करना और नदीनों को समय पर खत्म करना आदि भी उत्पादन बढ़ाते हैं। खाद बताई गई मात्रा में या मिट्टी की जांच के आधार पर डालना ज़रूरी है। सामान्य ज़मीन में यूरिया 110 किलो (नीम-लिप्त), डीएपी 55 किलो और म्यूरेट ऑफ पोटाश 20 किलो प्रति एकड़ डालनी चाहिए। सारा फास्फोरस (55 किलो डीएपी) और म्यूरेट ऑफ पोटाश बुआई के समय डाल देने चाहिए। हो सके तो ज़मीन को लेज़र लेवलर से समतल करवाया जाए। इससे पानी की बचत भी होगी और उत्पादन भी बढ़ेगा।
आईसीएआर-आईएआरआई के गेहूं ब्रीडर (प्रमुख वैज्ञानिक) डॉ. राजबीर यादव ज़ीरो ड्रिल तकनीक की सिफारिश करते हुए कहते हैं कि इससे खेत में नदीनों की ज्यादा समस्या नहीं आती। कम जुताई की ज़रूरत है, जिससे डीज़ल और जुताई का खर्च बचता है। वायुमंडल का प्रदूषण कम होता है। गुल्ली डंडा जो कई खेतों में 60 प्रतिशत तक भी उत्पादन को कम कर देता है, की समस्या में भी कमी आती है। उनके अनुसार ज़ीरो ड्रिल तकनीक से बुआई के लिए कई सफल किस्में जैसे एचडी-3385, एचडी-3410, एचडी-3390 और एचडी-3298 उपलब्ध हैं, लेकिन लगातार तीन साल ज़ीरो ड्रिल से गेहूं बोने के बाद ज़मीन की जुताई करना ज़रूरी है। इससे बहु-नदीनों तथा चूहों की समस्या से छुटकारा मिलेगा। ज़ीरो ड्रिल से बुआई का रकबा बढ़ तो रहा है, लेकिन बहुत धीरे-धीरे।
अच्छे उत्पादन के लिए मिट्टी का स्वास्थ्य बरकरार रखना ज़रूरी है। यूरिया का इस्तेमाल सही समय पर और सही मात्रा में करना चाहिए। फसल के अवशेष और पराली को जलाने से पर्यावरण प्रदूषित होने के अलावा ज़मीन की उपजाऊ शक्ति भी कम होती है, इसमें सुधार लाना ज़रूरी है। पंजाब सरकार द्वारा इस संबंधी सब्सिडी पर मशीनें दी जा रही हैं ताकि किसान मशीनों का इस्तेमाल करें और फसल के अवशेष न जलाएं। गेहूं के अधिक उत्पादन के लिए सिंचाई का उचित प्रबंध करना चाहिए। गेहूं को 4 से 6 सिंचाई की ज़रूरत है। आम फसल पर बुआई के 21-28 दिन बाद पहली सिंचाई करनी चाहिए, दूसरी 45 दिन बाद, तीसरी 65 दिन, चौथी 85 दिन, पांचवीं 105 दिन और छठी 130 दिन बाद मौसम को ध्यान में रखते हुए करनी चाहिए। धान के बाद बोए गए गेहूं को सिंचाई की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि बुआई के लिए ज़मीन में नमी मौजूद होती है। गेहूं की फसल पर आमतौर पर दीमक, चेपा, पीली कुंगी, भूरी कुंगी तथा अन्य बीमारियां आ जाती हैं, जिन्हें सही नदीननाशकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करके नियंत्रित करने की ज़रूरत है। इस बारे में किसानों को वैज्ञानिकों की सलाह ले लेनी चाहिए।

