ज़िन्दा होने का अपराध

‘क्या आप अभी ज़िन्दा हो?’ अचानक एक फोन आया। उधर से बोलने वाला पूरी उम्मीद के साथ पूछ रहा था, कि हम अवश्य कहेंगे, नहीं।
लेकिन बात को सनसनीखेज तरीके से पेश करने की अपनी आदत नहीं। इसीलिए हमने अपराधी भाव से जवाब दे दिया, ‘जी हां, हैं।’ इसके बावजूद कि आप लोगों की इतनी तपस्या के बावजूद डिग्रियां रद्दी के भाव भी नहीं बिकतीं। इसके बावजूद कि आपने गैर-कानूनी या कानूनी तरीके से सात समुद्र पार करके करोड़पति होने का जो सपना देखा था, उसे विदेशी सरकारें हथकड़ियां एवं बेड़ियां लगा कर अयाचित आगन्तुक के कपाल क ल्पित सपने कह कर थोक के हिसाब से वापस भेज रही हैं।
देखिये जनाब, हम आज तक केवल सपने ही तो देखते रहे। उनमें एक बड़ा सपना था कि वैध हो या अवैध, घोड़ा बन या डंकी, किसी तरीके से विदेशी धरा को छू लिया जाये। फिर अपनी मातृ भूमि से निष्कासित प्रताड़ित के झूठे बयान देकर शरण मांग ली जाएगी। मिल ही जाती थी, इसलिए उस शस्य श्यामला भूमि से छुटकारा तो मिल ही जाता, जहां भूख के पौधे निराश और खण्डित होते सपनों का झलंकार करते हैं, लेकिन यह अलंकार ही तो भाग्य बन जाता है, जब विदेश पहुंचा भाई बंधु कागज़ों या इजाज़त न होने के कारण जालिया करार दे दिया जाता है और उसे बैरंग लौटना पड़ता है।
‘बैरंग कहां लौट कर आते साहब?’ हमारा नाम न राजू था, न घराना अनाम था। न जहां गंगा बहती है, वहां हमारा धाम था। यह सही है कि इतने जाने-पहचाने थे, कि हम राम हैं कि श्याम हैं, नरेश हैं कि रमेश, बताने की ज़रूरत ही न पड़ती। हमारा रंग-बहिरंग, रूप-कुरूप देख कर ही हमारा परिचय मिल जाता। सड़क पर रोटी बेचते ढाबों को हम लालसा के साथ देख रहे थे, इसलिए हम भूखे तो थे ही, और मनरेगा दफ्तर का पता पूछ रहे थे, इसलिए बिना कहे हम इस देश की आधी आबादी में शामिल थे, जो नौकरी दिलवाने वाली खिड़कियों का पता पूछने की बजाय सस्ता राशन बांटने वाली दुकानों का पता पूछती है, जहां वंचितों में पांच किलो अनाज बांट कर उन्हें प्रवंचित किया जाता है, और हर आम-ओ-खास के लिए घोषणा कर दी जाती है कि इस देश में किसी को भूख से आत्महत्या करने नहीं दी जाएगी। गारण्टी भूख से न मरने देने की होती है, इसलिए अगर आप किसी अवसाद के कारण इस दुनिया से कूच कर लेने का इरादा कर रहे हैं, तो उसे भूख से मरना नहीं कह सकते।
कोई बेकार अगर मर गया तो यह वर्ग दूसरा है। उसके जान बचाने के नुस्खे भी दूसरे हैं, लेकिन इनमें हर एक को रोज़गार देने की गारण्टी नहीं होती है। जी हां, यहां समस्याओं के सीधे समाधान नहीं मिलते। यहां बेकारी की समस्या का हल बहुत दिन समुद्र पार पलायन रहा। अब विदेशी महाप्रभुओं ने अपने प्रवेश द्वार हमारे मुंह पर बन्द करने शुरू कर दिए, तो नई नौकरियां देने की बजाय, खुद पकौड़े बना कर बेचने की सलाह दी जाती है। जिसे किसी तीसरे दर्जे की नौकरी पाने की आशा नहीं होती, उसे कहा जाता है कि अपने आप को इस योग्य बनाओ, कि नौकरियां मांगते नज़र नहीं आओ, नौकरियां देने की सामर्थ्य पैदा करते नज़र आओ।
हम नौकरियां देने की सामर्थ्य रखने वाले इन बेकारों को देखने के लिए गये थे। कोई कच्ची आसामी पा सका था, और कोई आरजी लेकिन जो धोखाधड़ी या उल्लू बनाने का धंधा नहीं सीख सका, वह आरजी नौकरी करते हुए भी मुर्दे के समान हो गया। नेताओं को इससे कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि ऐसे लोग बहुत अच्छे ध्वजा-वाहक साबित होते हैं, जो हर समय उनकी कुर्सियों की सलामती के लिए अपने ज़िन्दाबाद कुर्बान करते रहते हैं।
और जो ऐसा नहीं कर पाते, उनके लिए अवैध शराब से लेकर चिट्टा और हैरोइन बांटने का काम हर समय उन्हें आवाज़ लगा कर कमाई देता है। उनकी किस्मत और भी अच्छी हो गई। इस बीच युग बदला। ज़माना डिजिटल हो गया। कृत्रिम मेधा का ज़माना आ गया। आया तो सबके लिए था, लेकिन अधिकांश जनता तो अपने गांव घरों के पहाड़े रटती रह गई और चतुर सुजान इस कला में पारंगत होकर साइबर क्राइम के लिए मील पत्थर अपने नाम करने लगे। बनारस के ठग तो बहुत दिन से सुने थे, परन्तु यह डिजिटल ठग हैं। बड़े मौलिक हैं साहब। आपको पता भी नहीं चलता कि आपका बैंक खाता खाली हो जाता है। आप कहते हैं साइबर ताकत मौलिकता का हनन करती है, और यहां नित्य नये तरीके से ठगियां होती हैं, कि जैसे पुराने ढग आंखों से सुरमा तक चुरा लेते थे। 

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