दुष्कर्म के विरुद्ध कानून से अधिक संस्कार और नैतिकता की ज़रूरत

दुष्कर्म की कोई भी घटना समाज की संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती है। जब यौन हिंसा का शिकार नाबालिग बच्चियां होती हैं, तब यह पीड़ा और भी गहरी हो जाती है। बचपन सुरक्षा, शिक्षा, संस्कार और सपनों का समय होता है। ऐसे में किसी बच्ची के साथ होने वाला यौन दुराचार केवल एक अपराध नहीं, बल्कि सभ्य समाज के सामने खड़ा गंभीर प्रश्न यह सोचने के लिए विवश करता है कि आखिर कानून, पुलिस व्यवस्था और सामाजिक चेतना के बावजूद ऐसी घटनाओं को पूरी तरह रोकने में हम क्यों सफल नहीं हो पा रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में नाबालिगों के साथ दुष्कर्म की हाल की तीन घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा को लेकर पुलिस की गश्त और निगरानी पर सवाल उठाए। अदालत ने इन घटनाओं को 2012 के निर्भया कांड की याद दिलाने वाला बताते हुए यह जानना चाहा कि उस भयावह घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था से क्या सीख ली गई?
हाल की घटनाओं में एक नाबालिग के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। दूसरी घटना में स्वरूप नगर में नाबालिग के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी गई। तीसरी घटना कालकाजी मंदिर के निकट आस्था कुंज पार्क की है, जहां एक नाबालिग छात्रा के साथ तीन युवकों द्वारा अपराध किए जाने का आरोप है। इन घटनाओं ने सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा, पुलिस गश्त और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट की चिंता केवल इन तीन घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक प्रश्न है कि महिलाओं और बच्चों के लिए शहरों को सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी किस तरह प्रभावी ढंग से निभाई जाए।
कानून अपराधी को सजा देने का माध्यम है लेकिन केवल कानून की कठोरता से अपराध की मानसिकता समाप्त नहीं होती। देश में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए पॉक्सो कानून मौजूद है। अपराध की गंभीरता के अनुसार इसमें कठोर दंड का प्रावधान है। इसके बावजूद अपराध सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में दिल्ली में बच्चों से संबंधित यौन अपराधों के तहत 1553 मामले दर्ज हुए। आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि समाज की सोच, परिवार के वातावरण, शिक्षा, पुलिस व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा को लेकर निरंतर जागरूकता की भी है। दुष्कर्म जैसी घटनाओं को रोकने के लिए समाज को केवल सख्त कानून की मांग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कानून जरूरी है, लेकिन उसके साथ नीति, नियम, प्रभावी निगरानी और नैतिकता भी उतनी ही आवश्यक है। अपराध के बाद कठोर कार्रवाई हो, यह जरूरी है लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपराध की मानसिकता पैदा ही न हो। इसके लिए परिवार और विद्यालय दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
बचपन में डाले गए अच्छे संस्कार बड़े होते-होते वटवृक्ष बन जाते हैं। संस्कार व्यक्ति के व्यवहार, विचार और निर्णयों को दिशा देते हैं। अच्छे संस्कारों की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, उनका प्रभाव उतना ही लंबे समय तक रहता है। परिवार में बच्चों को बचपन से ही महिलाओं और लड़कियों के सम्मान, मर्यादा, सहमति, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का अर्थ समझाना होगा। बच्चों को यह शिक्षा केवल उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार और दैनिक जीवन के उदाहरणों से मिलनी चाहिए। संस्कारवान व्यक्ति दूसरों की गरिमा को समझता है। वह अपनी इच्छाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखना सीखता है तथा किसी दूसरे व्यक्ति को वस्तु समझने की मानसिकता से दूर रहता है। इसलिए बच्चों को केवल प्रतियोगिता में आगे बढ़ने की शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें अच्छा इंसान बनने की शिक्षा भी देनी होगी। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार प्राप्त करना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है।
परिवार के साथ विद्यालयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बच्चों और किशोरों को उम्र के अनुरूप सुरक्षित व जिम्मेदार व्यवहार की शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि किसी व्यक्ति की इच्छा और गरिमा का सम्मान करना अनिवार्य है। साथ ही बच्चों को असुरक्षित परिस्थिति पहचानने, भरोसेमंद व्यक्ति से बात करने और किसी गलत व्यवहार की जानकारी देने के लिए भी जागरूक किया जाना चाहिए। चुप्पी कई बार अपराधी को अवसर देती है, जबकि समय पर मिली सूचना किसी बड़ी घटना को रोक सकती है।
पुलिस व्यवस्था को भी अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है। सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त गश्त, प्रकाश व्यवस्था, निगरानी तंत्र और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई सुरक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस से जवाब मांगना इसी जिम्मेदारी की ओर ध्यान आकर्षित करता है। सुरक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि जिससे अपराध होने के बाद कार्रवाई के बजाय अपराध की संभावना को पहले ही कम किया जा सके। समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। पड़ोस, विद्यालय, बाजार, परिवहन व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों पर संदिग्ध गतिविधियों के प्रति सजगता आवश्यक है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह परिवार, विद्यालय, प्रशासन और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
दुष्कर्म की घटनाओं के खिलाफ संघर्ष केवल अदालतों और कानून की किताबों में नहीं लड़ा जा सकता। इसकी शुरुआत घर से करनी होगी। बच्चों के मन में सम्मान, संयम, करुणा और जिम्मेदारी के बीज बचपन में ही बोने होंगे। अच्छे संस्कार धीरे-धीरे व्यक्ति के चरित्र का हिस्सा बनते हैं और जीवनभर उसका मार्गदर्शन करते हैं। यदि आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाया जाए तो अपराध की मानसिकता को जड़ से कमजोर किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता हमें यह सोचने का अवसर देती है कि निर्भया कांड के बाद हमने कानून और व्यवस्था में कई बदलाव किए लेकिन सामाजिक चेतना को भी उसी गति से मजबूत करने की ज़रूरत है। बच्चियों को सुरक्षित वातावरण देना किसी एक संस्था का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है। कानून अपराध होने के बाद न्याय दिला सकता है लेकिन संस्कार अपराध होने से पहले ही मनुष्य को गलत रास्ते पर जाने से रोकने की शक्ति रखते हैं। इसलिए दुष्कर्म जैसी घटनाओं को कम करने की सबसे मजबूत शुरुआत बच्चों को संस्कारवान बनाने से ही हो सकती है।

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