2026 वाले पंजाबियों का सितम्बर महीना
हरभजन सिंह बाजवा (बटाला) पंजाब के एक प्रसिद्ध फोटोग्राफर, पत्रकार और पंजाबी साहित्यकार थे, सोभा सिंह के शिष्य। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के अंदरेटा जाकर प्रसिद्ध चित्रकार सरदार सोभा सिंह से चित्रकला के गुण सीखे थे। बाद में उन्होंने फोटोग्राफी के अपनाया और बटाला में अपना ‘बाजवा फोटोज़’ स्थापित किया।
सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण : उन्होंने पंजाब के महान साहित्यकरों (जैसे गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी, प्रो. मोहन सिंह, संत सिंह सेखों, शिव कुमार बटालवी, जसवंत सिंह कंवल आदि) और पंजाब की विरासत को अपने कैमरे में कैद किया। फोटोग्राफी के अलावा वह एक पंजाबी कवि भी थे। उनके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं—सुक्के कक्खां थल्ले अग्ग, मौत इक आस दी और तरेल दी इक बूंद।
विरासत की सम्भाल : उन्होंने अपनी खींची ऐतिहासिक तस्वीरें और स्लाइडें ‘पंजाबी सत्थ लांबड़ा’ को सौंप दीं और अपनी निजी लाइब्रेरी बाबा आया सिंह रियाड़की कॉलेज (तुगलवाला, गुरदासपुर) को दान कर दी, जहां उनके नाम पर एक विशेष विंग बनाया गया है। वह एक शांत और मिलनसार इंसान थे।
उनका निधन 12 सितम्बर, 2026 को 85 साल की उम्र में बटाला में हुआ। उनका नाम 1984 के अमृतसर से जुड़े घटनाक्रम के कारण भी चर्चा में रहा। वह जून 1984 में अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर थे। गुरदेव सिंह बराड़ ने श्री हरिमंदिर साहिब परिसर में सैन्य कार्रवाई के लिए सहमति देने से इंकार किया था और इसके बाद उनका तबादला कर दिया गया था। पूर्व मंत्री तृप्त राजिन्दर सिंह बाजवा, बलबीर सिंह सिद्धू, वरिष्ठ अकाली नेता प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, पूर्व अकाली मंत्री आदेश प्रताप सिंह कैरों, शिरोमणि कमेटी सदस्य करनैल सिंह पंजोली, बीबी हरजिन्दर कौर और जत्थेदार जगजीत सिंह रतनगढ़, पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन के पूर्व चेयरमैन जतिन्दर सिंह औलाख, पूर्व पुलिस अधिकारी राजदीप सिंह गिल और पूर्व आईएएस सुखपाल सिंह गिल ने उपस्थिति लगवाई। सिख एजुकेशनल सोसाइटी के सचिव कर्नल (सेवा-मुक्त) जसमेर सिंह बाला के नेतृत्व में सोसाइटी के वरिष्ठ सदस्य इंजी. सुरिंदर सिंह विरदी, डॉ. गुरदर्शन सिंह ढिल्लों, सुखदेव सिंह सिद्धू, गुरदर्शन सिंह बाहिया, सुखपाल सिंह कंग, हरप्रीत सिंह डोड, रघबीर सिंह ढिल्लों, डॉ. बलकार सिंह, एडवोकेट करनदीप सिंह चीमा, डॉ. उजागर सिंह और भगवंतपाल सिंह सच्चर ने संबोधित किया। इसके बाद स्वर्गीय गुरदेव सिंह बराड़ के छोटे बेटे गुरबीर सिंह बराड़ ने अपने पिता की यादें साझा करते हुए कहा कि वह हमेशा चढ़ती कला में रहते थे और प्रत्येक को हर हालात में चढ़ती कला में रहने की प्रेरणा देते थे। उन्होंने श्रद्धांजलि समारोह में पहुंची संगत सहित शोक संदेश भेजने वाले संगठनों और संस्थाओं का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया।
प्रशासनिक सेवा के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षा के प्रसार को समर्पित कर दिया। वह लम्बा समय सिख एजुकेशनल सोसाइटी (एसईएस) के अध्यक्ष रहे। इस सोसाइटी के अधीन चंडीगढ़ और पंजाब के प्रमुख शिक्षण संस्थान चलते हैं, जिनमें शामिल हैं— श्री गुरु गोबिंद सिंह कॉलेज (एसजीजीएस) सेक्टर 26-चंडीगढ़, गुरु गोबिंद सिंह कॉलेज फॉर विमेन- चंडीगढ़, श्री गुरु गोबिंद सिंह कॉलेज ऑफ फार्मेसी, सिख नेशनल कॉलेज (बंगा और कादियां)। वह फरीदकोट के दशमेश शिक्षण संस्थान के भी अध्यक्ष थे। उन्होंने संस्थानों में सख्त नियम बनाया हुआ था कि किसी भी ज़रूरतमंद लड़की को सिर्फ इसलिए दाखिला देने से न रोका जाए क्योंकि वह फीस नहीं दे सकती। चंडीगढ़ की बस्तियों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों की बेटियों की पढ़ाई का खर्च भी सोसाइटी ने उठाती थी। उनके निधन पर पंजाब और चंडीगढ़ के प्रशासनिक और शिक्षण क्षेत्रों में गहरा दुख व्यक्त किया गया। 23 सितम्बर, 2026 को उनकी आत्मिक शांति के लिए अंतिम अरदास करवाई गई। चढ़ती कला में रहने तथा अपने साथियों को यहीं संदेश देने में वह सिख एजुकेशनल सोसाइटी को 1947 से सम्भालने तथा चलता रखने में भी बाजवा जैसे गुणवान एवं समर्थ थे। डॉ. महेंद्र सिंह रंधावा भी सरकारी अधिकारी होने के साथ-साथ बड़े फैसले लेने वाली शख्सियत थे।
इसी महीने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का 119वां जन्मदिन आया। वह स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख, प्रभावशाली क्रांतिकारियों में से एक थे। 23 साल की आयु में गहन विचारधारा और साहस से दी शहीदी ने देश के स्वतंत्रता संग्राम को एक नया मोड़ दिया। असेंबली बम धमाके से जुड़े मामले की अपील की नाटकीय पेशकारी आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है। नाटक का नाम ‘गुनहगार’ है और लिखने वाला हरीश जैन है। मामले की सुनवाई लाहौर हाई कोर्ट में तीन दिन चली थी। 6 जनवरी से 9 जनवरी, 1930 तक हुई बहस ने ही उन्हें ‘गुनहगार’ नाटक लिखने की प्रेरणा दी। क्या इस वर्ष का सितम्बर महीना देशवासियों के हितों को समर्पित नहीं हुआ? बटाला के फोटोग्राफर हरभजन सिंह बाजवा हों या सिख एजुकेशन सोसाइटी के गुरदेव सिंह बराड़, दोनों जनहित के लिए जीवत रहे और जाने जाएंगे। शहीद-ए-आज़म का जन्मदिन और महीना इस वर्ष के सितम्बर को अमर कर गया। ज़िन्दाबाद!!!



