हालात बदलना ही मुश्किल समस्याओं का हल
मैं हमेशा कहता हूँ कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी उन चुनिंदा लोगों में से हैं जो विरासत में मिली चुनौतियों को असंभव मानकर स्वीकार करने से इन्कार कर देते हैं। उन्होंने अपने कार्यों से यह साबित भी किया है कि सार्वजनिक जीवन में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे हल न किया जा सके, भले ही समय के साथ उसने कोई खास और जटिल रूप क्यों न ले लिया हो। मैं श्री नरेन्द्र भाई मोदी को पहले पार्टी संगठन में और बाद में सरकार में एक साथी के तौर पर जानता रहा हूं। हममें से जो लोग दशकों तक भाजपा में काम करते रहे हैं, उनके लिए अनुच्छेद 370 और राम जन्मभूमि केवल थोड़े समय के राजनीतिक फायदे के मुद्दे नहीं थे। ये गहरे विश्वास के मामले थे जिन्हें हमने दशकों तक अपने दिल के करीब रखा और जिनके लिए हमने त्याग भी किए लेकिन मैं ईमानदारी से यह भी कहूंगा कि ऐसे पल भी आए जब हमारे ही कुछ कार्यकर्ताओं को यह संदेह हुआ कि क्या वे अपने जीवनकाल में इन मुद्दों का समाधान देख पाएंगे? फिर भी, श्री नरेन्द्र मोदी ने इसे संभव कर दिखाया।
संविधान में एक अस्थायी प्रावधान के तौर पर बताए गए अनुच्छेद 370 को लेकर लंबे समय से यह माना जाता रहा था कि इसे सुलझाना राजनीतिक रूप से असंभव और मुश्किल है। मुझे राज्यसभा की अध्यक्षता करने का खास सौभाग्य मिला, जब अनुच्छेद 370 को हटाने वाला ऐतिहासिक कानून पारित हुआ। राम जन्मभूमि का सफर और भी लंबा रहा। पीढ़ियां इस उम्मीद में जीती रहीं कि एक दिन भगवान श्री राम की जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर बनेगा। 22 जनवरी, 2024 को वह उम्मीद सच हो गई। अटूट विश्वास, साहस, स्पष्टता और दृढ़ता से जो असंभव लगता है, वह भी संभव हो सकता है। सरकार के मुखिया के तौर पर श्री नरेन्द्र मोदी के सफर की शुरुआत से ही यह नज़रिया साफ तौर पर दिखाई देता रहा है। जब वे अक्तूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो राज्य उसी साल आए भूकम्प से हुई तबाही से जूझ रहा था। गुजरात को लगभग खत्म मान लिया गया था। कच्छ को भारी नुकसान पहुंचा था। यह इलाका पहले से ही बड़ी चुनौतियों से घिरा हुआ था। इस बात का असली खतरा था कि भूकम्प इसे और भी पीछे धकेल देगा।
मोदी समझ गए थे कि सबसे पहला काम लोगों का भरोसा बहाल करना है। मुख्यमंत्री के तौर पर वे अपनी पहली दिवाली गांधीनगर में मना सकते थे लेकिन इसके बजाय उन्होंने कच्छ में भूकम्प से प्रभावित परिवारों के साथ दिवाली मनाई। दूर से स्थिति को संभालने के बजाय वे खुद घटनास्थल पर गए। गुजरात के सामने पानी की एक और चुनौती थी-एक ऐसी चुनौती जो स्थायी लग रही थी। गुजरात के बड़े हिस्से सूखे की चपेट में रहते थे और पीढ़ियों से पानी की कमी से जूझ रहे थे। नरेन्द्र मोदी ने इस सोच को चुनौती दी।
1961 में सरदार सरोवर प्रोजेक्ट की इसकी आधारशिला रखी गई थी। कई दशकों तक यह प्रोजेक्ट मुश्किलों और देरी में फंसा रहा। इतने सालों में कई चुनौतियों का सामना करने के बावजूद मोदी ने इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया और आखिरकार बांध का निर्माण पूरा कराया, जिससे गुजरात के पानी की कमी वाले इलाकों तक नर्मदा का पानी पहुंच सका।
2014 में नरेन्द्र भाई मोदी तब प्रधानमंत्री बने जब भारत की अर्थव्यवस्था को ‘फ्रैजाइल फाइव’ (कमज़ोर पांच) अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना जाता था और उसका बैंकिंग सिस्टम कई तरह की समस्याओं से घिरा हुआ था। उन्होंने इन समस्याओं की पहचान करने और उन्हें हल करने की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद यह अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरी और जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई। बहुत से लोगों का मानना था कि गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स के लिए ज़रूरी राजनीतिक सहमति कभी नहीं बन पाएगी। फिर भी यह सहमति बन गई क्योंकि मोदी इस पर अपनी राजनीतिक साख दांव पर लगाने और इस सुधार को पूरा करने के लिए तैयार थे।
आज हम भारत को डिजिटल पेमेंट के मामले में दुनिया के अग्रणी देश के तौर पर देखते हैं। हालांकि यह मुकाम कई चुनौतियों से पार पाकर हासिल किया गया है। भारत में डिजिटल पेमेंट सिस्टम बनाने के लिए टेक्नोलॉजी की कमी कोई समस्या नहीं थी बल्कि शहरों और गांवों, अलग-अलग पीढ़ियों और विभिन्न आय वर्गों के लाखों लोगों को अपनी रोज़मर्रा की आदत बदलने के लिए प्रेरित करना ही वह काम था जो नामुमकिन सा लग रहा था। अनुभवी राजनीतिक नेताओं ने मज़ाक में पूछा था कि सड़क किनारे सामान बेचने वालों को डिजिटल पेमेंट सिस्टम में कैसे लाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने इस बड़े बदलाव को सच कर दिखाया। गरीबी एक और ऐसी समस्या थी जिसे भारत ने हमेशा के लिए अपनी नियति मान लिया था। गरीबी मिटाने के नारे पर सरकारें तो बनीं, लेकिन यह देश की एक स्थायी पहचान बनी रही। असली चुनौती उन हालात को बदलने की थी जिनकी वजह से परिवार गरीबी के जाल में फंसे रहते थे। आज 25 करोड़ भारतीय बहुआयामी गरीबी से बाहर निकल चुके हैं।
पद्म पुरस्कारों की बात करें तो आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि जिन लोगों को पहले पहचान नहीं मिली थी, उन्हें पहचान मिले और जो योग्य लोग चुपचाप और बिना किसी दिखावे के काम कर रहे हैं, उन पर ध्यान दिया जाए और उन्हें उचित महत्व मिले। 2014 से, हमारे देश के गुमनाम नायकों को हर साल नागरिक सम्मानों की सूची में जगह मिली है। कई दशकों तक नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहा और इसमें हज़ारों लोगों की जान गई। सुरक्षा और विकास की दोहरी रणनीति अपनाकर, इस समस्या को, जो लगभग छह दशकों से बनी हुई थी, अब प्रभावी ढंग से खत्म कर दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की सबसे अहम बात यह नहीं है कि हर समस्या खत्म हो गई है, बल्कि यह है कि उन्होंने चुनौतियों के सामने बेबस महसूस करने वाली पुरानी सोच को खत्म कर दिया है। पूरे देश की सोच बदल गई है। अब लोग मानते हैं कि मुश्किलें हमारी किस्मत तय नहीं करतीं। अचानक आए संकटों के दौरान भी ऐसा देखा गया है। कोविड-19 महामारी के समय, दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं और स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ा। हालांकि नरेन्द्र मोदी ने देश को एकजुट बनाए रखा।
हाल के वर्षों में एक नारा काफी लोकप्रिय हुआ है जो इस बदलाव को बखूबी बयां करता है- ‘अगर मोदी हैं, तो मुमकिन है।’ यह बदलाव भारत के राजनीतिक परिदृश्य में भी साफ तौर पर देखा जा सकता है। कभी भाजपा को एक ऐसी पार्टी माना जाता था जो कुछ खास भौगोलिक और सामाजिक दायरों तक ही सीमित थी और कुछ हलकों में तो यह आम धारणा थी कि यह स्थिति कभी नहीं बदलेगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने इसे बदली न जा सकने वाली स्थिति मानने से इन्कार कर दिया और हालात को बदलने के लिए कड़ी मेहनत की। आज पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत जैसे इलाकों में भाजपा के विस्तार और साथ ही गरीबों, ग्रामीण आबादी और हाशिये पर मौजूद समुदायों के बीच पार्टी को मिल रहे बढ़ते समर्थन ने देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। जिन लोगों ने उनके सफर को करीब से देखा है, वे जानते हैं कि श्री नरेन्द्र भाई मोदी इस बात से शुरुआत नहीं करते कि मौजूदा हालात क्या इजाज़त देते हैं, बल्कि वे यह पहचानकर शुरुआत करते हैं कि देश को किस चीज़ की ज़रूरत है और फिर उस ज़रूरत को पूरा करने के लिए ज़रूरी हालात बनाते हैं। यह सोच उस देश के लिए बहुत ज़रूरी है जो 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने का सपना देखता है।
(लेखक भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हैं।)



