हम जैसा कोई नहीं है, बन्धु!
जीने का नया तरीका सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर तुम्हें हथेली पर सरसों जमानी नहीं आती, तो इसे सीख लो। शुरू से यही तो सुनते आये थे कि हथेली पर सरसों नहीं जम सकती। आज सुन रहे हैं कि सरसों नहीं जमा सकते तो तुम्हें जीने का कोई हक नहीं।
सुना है, अपने देश में वह शिक्षा क्रांति होती है, जिसमें शिक्षा नहीं, शोध नहीं, अन्वेषण नहीं और अध्यवसाय भी नहीं। बस अपने नाम के साथ एक जाली डिग्री चिपकानी आनी चाहिए। डिग्री जाली साबित हो जाए तो जिसने आपकी डिग्री जाली साबित करने की कोशिश की, आप उसे ही जाली साबित कर दो।
भाई, माहौल ही ऐसा है कि कभी भी, कहीं भी, किसी को भी जाली साबित कर सकते हो। बस आपमें अपना गाल बजाने की क्षमता होनी चाहिए, और किसी की पीठ पीछे उसे अपने निंदा रूप से सराबोर कर देने का हुनर। हुनर की बात भी आपने खूब कही साहिब! अपना देश डिजिटल घोषित हो गया। साइबर इंटरनेट की अपार क्षमता उसे मिल गई है। आपको बस उसकी ताकत का अपने हित में इस्तेमाल करने का हुनर आना चाहिए। चाहे किसी ए.टी.एम. में किसी नादान नौसिखिये से पैसे निकालने में उसकी मदद का सतयुगा दिखा कर ऐसे उसकी आभा और पासवर्ड हथियाओ कि उसके बांस पर चढ़ने से पहले उसका खाता खाली कर लो, और बाद में शिक्षा नायक बन कर सबको बता दो कि साइबर अपराध से बचा कैसे जाता है। अजी बचने और अपराधी को पकड़ने की क्या ज़रूरत? अब जो पैसा गया, वह मुड़ कर तो कभी नहीं आएगा और आप साइबर अपराध जांच प्रभारी से अपराध की पक्की एफ.आई.आर. की कॉपी लेने के लिए ही थाने के अन्दर और बाहर होते रहोगे।
फिर एक दिन साइबर अपराधी का एक फोन आपको आएगा, ‘बस बेटा, कर ली अपने बैंक से भुगतान न करवाने की कोशिश। हमें पकड़वाने की कोशिश। पैसा तो तेरा पुज़र्ा-पुज़र्ा बंट गया। अब लोगों को सममझाते रहियो, कि अपने खाते हैक होने से कैसे बचाएं?’
़खैर, फोन करने वाला दांत निपोर कर हंसता है, लेकिन हम तो उसकी काल का अनुसरण (जिसे ट्रैक कहते हैं) करके उसका खोज पता भी न लगा सके।
जनाब, ज्यों-ज्यों देश डिजिटल होता जा रहा है, हम उसके सामने और भी अनपढ़ होते जा रहे हैं और फिर उनके हाथ में आ गई है यह बनावटी दिमाग की ताकत। अपना दिमाग तो हमने ताक पर रख ही दिया है और इधर यह ताकत इतनी घातक है कि आपको जाना होगा दक्षिण और भेज देगी उत्तर। पिछले दिनों हमने सुना कि यह जो चैटपैट की ताकत लोगों को मिलने लगी है, यह लोगों को उपाय बताती है, कि खुदकुशी करने का सबसे आसान तरीका कौन-सा है? किसी से पैसे उधार लिए हैं तो उसे कैसे नहीं लौट सकते हो? अगर राजनीति में हो तो कैसे अपनी पार्टी बदल सकते हो। पार्टी बदल कर भी उसे अपना सबसे बड़ा बलिदान सिद्ध कर सकते हो। अगर इस पार्टी में दिल नहीं लगा, या उससे आपको अपेक्षित कुर्सी नहीं मिली, तो हम आपको एक और छलांग लगाने की अनुमति देते हैं। पासा बदल लीजिये, हम आपको साबित कर देंगे कि आप बलिदानी ही नहीं, महा-बलिदानी हो। थोड़ा आगे चलिये। पुस्तकों से प्यार नहीं किया, लेकिन उसका साया ओढ़ कर महान लेखक बनने का शौक अवश्य चर्राया है। छद्म बॉयोडैटा, और कौआ कैसे चले हंस की चाल और अपनी चाल भी न भूले, यह सब बातें आपको कृत्रिम मेधा उपकरण सिखा देंगे। बस आप केवल पुस्तक संस्कृति की मौत घोषित कर दो। लेकिन कभी-कभी गद्दियों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बैठे ये चतुर सुजान सोचते हैं, कि इस देश को साइबर ठगी या कृत्रिण मेधा से डीपफेक या अपनी कोई झूठी छवि बनाने की आखिर ज़रूरत ही क्या है? यह तो हम जन्म-जात सीख कर आए हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने इस गुण को विरासत में देकर जा रहे हैं।
तभी देख लो जो निजा सेवा से लेकर परिवार सेवा की दौड़ लगाता है, वही जन-सेवक का ताज पहने घूमता है। जो भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर भी न सहने की कसमें खाता है, छापा पड़ने पर उसकी कोठरी से ही अधजले नोटों की गड्डियां मिलती हैं। कोई उससे सवाल जवाब करने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि काजल की कोठरी में गौरवर्ण होने का खेल खेला नहीं जा सकता। जो खेलेगा उसके चेहरे की असली कालिख हर सफेदी को ढक लेगी।
इसीलिए सच कहते हैं जनाब इस देश को साइबर डिजिटल या कृत्रिम मेधा में तरक्की करने की ज़रूरत ही क्या है? हमारे मार्गदर्शक तो सदा से यही खेल खेलते आए हैं, और अच्छे-अच्छे अत्याधुनिक उपकरणों को हार का ठेंगा दिखा सकते हैं। इसलिए तो कहते हैं, हम जैसा कोई नहीं, हमें भला तरक्की करने और समय के साथ अपनी चाल बदलने की क्या ज़रूरत।



