ड्रोन का दोहरा खेल, अमरीका की आखिर मंशा क्या है ?
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बेटों से जुड़ी पॉवरस कंपनी का पाकिस्तान में ड्रोन प्रोडक्शन यूनिट लगाना संबंधित देशों का अपना मामला है और सामान्यतया कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में जब पॉवरस भारत में एक निजी रक्षा उत्पादन कंपनी से ड्रोन के बाबत करार करती है और वही पाकिस्तान में भी इसके निर्माण का मंसूबा रखती है, तब इसे इतना सामान्य मानना रणनीतिक भूल होगी। इस आसन्न समझौते से तमाम ऐसे सवाल उठे हैं, जिनका जवाब मुश्किल मालूम होता है। जून में पॉवरस ने भारत की पारस डिफेंस को ‘गार्डियन-1’ काउंटर-ड्रोन सिस्टम का एक्सक्लूसिव प्रोडक्शन लाइसेंस दिया। केवल तीन महीने बाद उसका पाकिस्तानी सेना के साथ ड्रोन सिस्टम और निर्माण सहायता उपलब्ध कराने का समझौता करना मात्र संयोग है अथवा सुनियोजित रणनीतिक पैंतरा? क्या पॉवरस ने यूक्रेन युद्ध में परखी गई तकनीक को ‘अमरीकी ब्रांड’ में पैक करके भारत को काउंटर-ड्रोन इंटरसेप्टर सिस्टम के तौरपर ढाल और पाकिस्तान को हमलावर ड्रोन और इंटरसेप्शन तकनीक का ढांचा सौंपकर भाला नहीं बेचा है?
पावरस के सह-संस्थापक ज़ीव मोरॉम इजरायली सैन्य खुफिया सेवा से जुड़े रहे हैं। पाकिस्तान इज़रायल को मान्यता नहीं देता। फिर भी उसने महज एक साल पहले बनी इस कंपनी के साथ समझौता क्या व्यहारिक सैन्य हित वैचारिक विरोध पर भारी पड़ना है अथवा वजह कुछ दूसरी भी है? पाकिस्तान को यह भी मालूम होगा कि पॉवरस ने भारत के साथ भी करार किया है। फिर इस समझौते के प्रति वह इतना उत्साही क्यों? सवाल यह भी है कि चीन की आंखों के नीचे अमरीका से इस तरह के समझौते का क्या मतलब है? क्या चीन ने सीपैक को लेकर कोई समझौतावादी नज़रिया अपनाया है या भारत विरोध इसकी जड़ में है? पाकिस्तानी जीआईडीएस कंपनी शापुर ब्लॉक-2 ऐसे सशस्त्र ड्रोन बनाती है, जिसमें स्वायत्त उड़ान, विभिन्न हथियारों का एकीकरण और लंबी अवधि की निगरानी जैसी क्षमताएं हैं। इसके अलावा अनेक सामरिक यूएवी, कामिकाजे ड्रोन, लूटेरिंग म्यूनिशन और एंटी-यूएवी घरेलू प्रणालियां भी उसके पास हैं। उसके पास तुर्किये के बायरेक्टर टीबी 2 और एकिंसी, चीन के विंग लांग 2 जैसे प्लेटफॉर्म हैं। वह चीन और तुर्किये से बड़े पैमाने पर ड्रोन लेता जा रहा है।
अमरीका भी उसे ड्रोन बेचने को उतारू है। ड्रोन का बड़ा जखीरा उसके पास मौजूद हैं। पाकिस्तान को आखिर इतने ड्रोन क्यों चाहिए कि उसकी अमरीकी फैक्टरी लगाई जाए? अगर बात है संख्या, विविधता, गति और तकनीकी प्रयोग की तो क्या तुर्किये और चीनी ड्रोन पर उसका विश्वास डिग रहा है? क्या वे उतने कारगर और कारआमद नहीं जितनी उसकी मंशा है? पाकिस्तान को भी पता है कि भविष्य के युद्ध में महंगे लड़ाकू विमानों से ज्यादा कारगर सैकड़ों सस्ते ड्रोन होंगे जिन्हें निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, लक्ष्य निर्धारण, वायु रक्षा को बल और सहायता देने तथा आत्मघाती हमलों में इस्तेमाल किया जा सकेगा। भारत के विदेश मंत्रालय ने मई 2025 में बताया था कि पाकिस्तान की ओर से लगभग 400 ड्रोन भेजे गए लेकिन भारतीय प्रणालियों ने उन्हें आसानी से बेकार कर दिया। संभव है इस अनुभव ने पाकिस्तान को संदेश दिया हो कि बड़े पैमाने पर ड्रोन उत्पादन और लगातार उपलब्धता बहुत आवश्यक है। यूक्रेन का युद्ध ड्रोन नवाचार की प्रयोगशाला बन चुका है। वहां एफपीवी ड्रोन, स्वायत्त प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, एआई-सहायित लक्ष्य पहचान और कम लागत वाले इंटरसेप्टर लगातार विकसित हुए हैं। पॉवरस यूक्रेनी ड्रोन तकनीक के साथ काम कर रही है और उसके पास विभिन्न स्वायत्त प्रणालियों से जुड़े अधिकार हैं। इसलिए पाकिस्तान शायद किसी एक प्लेटफॉर्म से अधिक सीधे युद्ध से निकली तेजी से बदलती तकनीक तक पहुंच चाहता है। कंपनी ने पाकिस्तान के साथ संयुक्त तकनीकी सहयोग और स्थानीय उत्पादन की भी बात की है इसीलिए अपनी निर्माण क्षमता होते हुए और चीनी, तुर्की ड्रोन रखते हुए,अमरीकी ड्रोन के सौदों के बावजूद पाकिस्तान ने अपेक्षाकृत नई अमरीकी कंपनी के साथ संभावित संयुक्त तकनीकी सहयोग और स्थानीय उत्पादन को उद्धत है, उसे भारी संख्या में ड्रोन ही नहीं ‘एक और ड्रोन’ तकनीकी पारिस्थितिकी की भी आवश्यकता है। पाकिस्तान द्वारा पॉवरस के ड्रोन तकनीक इस्तेमाल करने का मतलब है एक ही तकनीक के दो संस्करण युद्धक्षेत्र में आमने-सामने हो सकते हैं। प्रश्न है कि यदि भारत-पाक संघर्ष बढ़ा, तो क्या अमरीका तकनीकी बैकडोर, सप्लाई चेन प्रतिबंध या डेटा लिंक निर्भरता के जरिए ‘पक्षपात’ करेगा? ड्रोन के मामले में पाकिस्तान चीन से मिली संख्या, तुर्की से प्राप्त गुणवत्ता और यूक्रेनी युद्ध के अनुभव से परिपूर्ण तकनीक, इन तीनों आयामों में एक साथ आगे बढ़ रहा है। ड्रोन को लेकर पाकिस्तान की तेजी से यह बदलती रणनीति, उस पर निरंतर तेज कारगुजारियां और दक्षिण एशिया में ड्रोन युद्ध को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ अमेरिका की उभरती रक्षा-तकनीकी कंपनियों का वैश्विक विस्तार इनके मद्देनज़र भारत को वायु रक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार करना ही होगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



