ग्रीक रोमन परम्पराओं को पुनर्जन्म देने वाली कार्सन को मिला साहित्य का नोबेल

‘तुम बहुत ज्यादा याद रखती हो, 
हाल ही में मेरी मां ने कहा, 
इतना कुछ याद रखने की ज़रूरत क्या है? 
और मैंने कहा, इसे मैं कहां उतार फेंकूं?’ 
ये पंक्तियां हैं ऐन. पेट्रिसीया कार्सन की लम्बी, लिरिकल कविता ‘द ग्लास एस्से’ की, जो उनके 1995 के संग्रह ‘ग्लास, आयरनी एंड गॉड’ में प्रकाशित हुई थीं। यही उनके कार्य का प्रवेश बिंदु है, जिसके लिए उन्हें वर्ष 2026 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। इस कविता की नायिका असफल प्रेम के बाद यादों व इच्छा के बोझ की समीक्षा करती है और नियमित एमिली बरोंटे पर गौरो-फिक्र करती रहती है, जिनके कालजयी उपन्यास ‘वुदरिंग हाइट्स’ में विघटनकारी व पैशनेट प्रेम का गहन साहित्यिक चित्रण है। यह कविता कार्सन के अनेक पसंदीदा विषयों को एक ही कार्य में समेट देती है। कार्सन ने निरंतरता के साथ इच्छा, त्याग व ईर्ष्या पर लिखा है और वह अक्सर अन्य प्रख्यात कवियों व साहित्यकारों का प्रयोग भावनात्मक प्रभावों व अपने विचारों को ऐतिहासिक संदर्भ देने के लिए करती हैं। 
दरअसल, ‘द ग्लास एस्से’ कार्सन के लेखन संसार का आईना है। कनाडा की यह 76 वर्षीय कवियत्री, निबंधकार, अनुवादक व क्लासिस्ट अक्सर बौद्धिक, भावनात्मक विषयों में अपनी व्यक्तिगत सोच का समावेश करती हैं और उसमें समीक्षा, अनुवाद, इतिहास, दर्शन आदि भी जोड़ देती हैं। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि उनका कार्य न केवल साहसिक व आविष्कारशील बल्कि उसमें क्लासिकल व आधुनिकता का गज़ब का संगम है, जिसमें पद्य व गद्य के बीच की दीवारें धुंधली हो गई हैं। विधा में लचीलापन लाना उनका ट्रेडमार्क है। मसलन, ‘द ग्लास एस्से’, जैसा कि शीर्षक से ही ज़ाहिर होता है, आंशिक रूप से साहित्यिक आलोचना पर निबंध है, हालांकि अपनी शैली की वजह से वह कविता भी है। कार्सन के लगभग सम्पूर्ण कार्य का केंद्र बिंदु यह है कि जहां एक भाषाशास्त्री के रूप में उनमें शब्दों को लेकर दीवानगी है, वहीं एक कवियत्री के रूप में शब्दों को नया अर्थ देने का प्रयास भी है। 
कनाडा के शहर टोरंटो में जन्मीं कार्सन किशोरावस्था में ही प्राचीन यूनानी मिथकों के प्रति आकर्षित हो गई थीं। उन्होंने ओंटारियो के शोपिंग मॉल में विलिस बार्नस्टोन द्वारा अनुवादित ‘सैफो’ की कविताएं देखीं, जो दो भाषाओं में थीं। इससे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी हाई स्कूल की लैटिन टीचर से उन्हें प्राचीन यूनानी भाषा पढ़ाने के लिए कहा। जब यह नींव रख दी गई तो उन्होंने अपना शोध प्रबंधन प्राचीन यूनानी साहित्य में लिखा, जिसका शीर्षक है ‘ओडी एट एमो एरगो सम’ (मैं नफरत करती हूं और मैं प्रेम करती हूं, इसलिए मैं हूं)। कार्सन की आलोचना पर पहली पुस्तक ‘इरोस द बिटरस्वीट’ 1986 में प्रकाशित हुई थी। इसने ही उनके नज़रिये की बुनियाद रखी।
चूंकि ‘इरोस द बिटरस्वीट’ यूनानी काव्य, दर्शन व साहित्यिक आलोचना तथा व्यक्तिगत व्याख्या के बीच में घूमती रहती है, इसलिए परम्परागत दृष्टि से यह आसान किताब नहीं है। अगर आप कार्सन को खोजना व समझना चाहते हैं, तो शुरुआत उनके काव्य उपन्यास ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड’ से कीजिये, जो 1998 में प्रकशित हुआ था। यह हर्कुलस व लाल-परों वाले दैत्य गेर्योन के प्राचीन यूनानी मिथक से प्रेरित है। गेर्योन की हत्या हीरो ने अपने 12 विशाल श्रम टास्क में से दसवें टास्क के रूप में की थी। हालांकि यूनानी कथाओं में गेर्योन एक मामूली किरदार है, लेकिन कार्सन की किताब में उसे हर्कुलस का प्रेमी बना दिया गया है। वह इस मिथक को आधुनिक सतरंगी कथा के रूप में पुन: सोचती हैं, जिसमें दैत्य प्रेम, ईर्ष्या, यौन संबंध व दिल टूटने का अनुभव करता है। कार्सन के शब्दों में, ‘हम सभी अधिकतर समय ख़ुद को दैत्य ही महसूस करते हैं।’ यह किताब दिलचस्प व आसान और इसका आनंद लेने के लिए प्राचीन यूनानी कथाओं की गहरी जानकारी होने की भी ज़रूरत नहीं है। 
कार्सन को पढ़ने कीकुंजी यह है कि प्रत्येक संपर्क को स्पष्ट होने के लिए त्वरित उम्मीद न रखें। उनकी पुस्तकें निश्चितता की बजाय जिज्ञासा को पुरस्कृत करती हैं। वह अपनी किताबों में ज्ञान का समुंदर भर देती हैं, जिससे एक पुस्तक को पढ़ने के बाद लगता है कि आपने पुस्तकालय पढ़ लिया है। मसलन, 2000 में प्रकाशित ‘मेन इन द ऑफ आर्स’ बौद्धिक कविताओं का संकलन है, जिसमें कार्सन आधुनिक को प्राचीन से टकराती हैं और विविध शाख्सियतों जैसे बीथोवेन, वर्जिनिया वुल्फ, एमिली डिकिंसन, जीन-लुक गोडार्ड, सिगमंड फ्रॉयड, होमर व होकुसई के संदर्भ देती हैं। इस संकलन की कविताएं इतिहास, माइथोलॉजी व सामान्य जीवन को एक लड़ी में पिरो देती हैं, जिससे अनचाही भावनाओं व बौद्धिक सम्पर्कों को खुलकर खेलने का अवसर मिलता है। इसी तरह 2019 में प्रकाशित नोर्माजीन बेकर ऑफ ट्रॉय’ में कार्सन क्लासिकल व पॉप कल्चर को एक साथ ले आती हैं और हेलेन ऑफ ट्रॉय की कहानी को नये सिरे से सोचकर उसे मर्लिन मुनरो के जीवन व सांस्कृतिक छवि के संग प्रस्तुत करती हैं। 
कार्सन को जब आर्कटिक द्वीप पर मालूम हुआ कि उन्हें नोबेल प्राइज के लिए चुना गया है, तो उनकी पहली प्रतिक्त्रिया थी, ‘क्रेज़ी, मैं समझती हूं कि सभी क्त्रेज़ी हैं।’ लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह अपनी किताब के फ्रंट में इस संदर्भ में स्टीकर लगायेंगी। जब स्वीडिश अकादमी के स्थायी सचिव ने उनसे कहा कि उन्हें 12 मिलियन स्वीडिश क्राउन (1.2 मिलियन डॉलर) ईनाम में मिलेंगे, तो उनका जवाब था, ‘इस समय मैं आइसलैंड में अपने मकान में हूं और हवा की सन-सन सुन रही हूं।’ कार्सन जब अपने 70वें बसंत में प्रवेश कर गई थीं, तो वह बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेने लगीं, क्योंकि उन्हें पार्किंसन रोग हो गया था, जिसने उनकी हैंडराइटिंग को ख़राब कर दिया था। उन्होंने लिखा, ‘मैं शर्म के साथ पूरे पैराग्राफ घसीटती हूं।’ उनकी हैंडराइटिंग अवश्य खराब हो गई है, लेकिन उनका लेखन दमदार है, तभी तो उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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