कब मिलेगी गरीबी के अभिशाप से मुक्ति ?
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संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसम्बर, 1992 को 17 अक्तूबर को अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। इससे पहले 17 अक्तूबर, 1987 को पेरिस में गरीबी और भुखमरी के पीड़ितों के सम्मान में आयोजित एक सभा में हज़ारों लोगों ने भाग लिया था। इस दिवस का उद्देश्य गरीबी में जीवन बिताने वाले लोगों की समस्याओं को सामने लाना, उनके अनुभवों को नीतिगत चर्चाओं में स्थान देना और सरकारों तथा नागरिक समाज को सामूहिक कार्रवाई के लिए प्रेरित करना है। इसका मूल संदेश यह है कि गरीबी में जी रहे लोगों को केवल सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि अधिकारों और निर्णय लेने की क्षमता से संपन्न नागरिकों के रूप में देखा जाना चाहिए।
विश्व बैंक के जून 2025 के आकलन में उस वर्ष के लिए वैश्विक अत्यधिक गरीबी की अनुमानित दर 9.9 प्रतिशत बताई गई। इसका अर्थ है कि दुनिया की बड़ी आबादी आज भी भोजन, आवास, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधनों से वंचित है। विश्व बैंक की नई गरीबी रेखा के अनुसार वर्ष 2030 तक दुनिया की लगभग 9 प्रतिशत आबादी अत्यधिक गरीबी में रह सकती है। यह अनुमान संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य संख्या एक के सामने मौजूद कठिनाई को स्पष्ट करता है, जिसका उद्देश्य सभी रूपों में गरीबी को समाप्त करना है। गरीबी में कमी की गति धीमी पड़ने के पीछे महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव, संघर्ष, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन और असमान विकास जैसे कई कारण हैं। इन परिस्थितियों में केवल आर्थिक वृद्धि पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, विकास के लाभों को समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचाना भी आवश्यक है।
आय के अतिरिक्त अभावों को समझने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डिवेल्पमेंट इनिशिएटिव द्वारा प्रकाशित वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2024 महत्वपूर्ण जानकारी देता है। इसके अनुसार 112 देशों के 6.3 अरब लोगों में से लगभग 110 करोड़ लोग तीव्र बहुआयामी गरीबी में जीवन बिता रहे थे। इनमें आधे से अधिक बच्चे थे। इन लोगों को आवास, स्वच्छता, बिजली, पौष्टिक भोजन और शिक्षा जैसी सुविधाओं में एक साथ कई प्रकार की वंचनाओं का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 45.5 करोड़ लोग संघर्ष से प्रभावित देशों में रहते थे। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और विस्थापन गरीबी को बढ़ाते हैं तथा पहले हासिल की गई प्रगति को भी पीछे धकेल सकते हैं।
भारत में गरीबी उन्मूलन के प्रयासों का मूल्यांकन करते समय देश की विशाल जनसंख्या, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, असंगठित रोज़गार और राज्यों के बीच विकास के अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है। नीति आयोग की जनवरी 2024 में प्रकाशित चर्चा-पत्रिका ‘भारत में 2005-06 से बहुआयामी गरीबी’ के अनुसार देश में बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गया। इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोगों के बहुआयामी गरीबी से बाहर आने का अनुमान लगाया गया। विश्व बैंक के जून 2025 के संशोधित आकलन में भी भारत में आय-आधारित अत्यधिक गरीबी में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। वर्ष 2011-12 में 2017 की क्रय शक्ति समता पर प्रतिदिन 2.15 डॉलर की पुरानी अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात 16.2 प्रतिशत अनुमानित था, जो 2022-23 में घटकर 2.3 प्रतिशत रह गया। इस मापदंड के अनुसार लगभग 17.1 करोड़ लोग अत्यधिक आय-गरीबी से बाहर आए। भारत में गरीबी घटाने में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोज़गार, वित्तीय समावेशन, आवास, स्वच्छता, पेयजलए स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
गरीबी उन्मूलन की राह में कई गंभीर बाधाएं बनी हुई हैं। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय अनिश्चित होती है और उन्हें अक्सर नियमित रोज़गार, पेंशन तथा पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। महिलाओं के अवैतनिक घरेलू कार्य, संपत्ति पर सीमित अधिकार और रोज़गार के कम अवसर उनकी आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा कौशल प्रशिक्षण तक असमान पहुंच के कारण गरीब परिवारों के बच्चों को बेहतर रोजगार पाने में कठिनाई होती है। बीमारी के कारण होने वाला खर्च किसी परिवार की वर्षों की बचत समाप्त कर सकता है। इसी प्रकार सूखा, बाढ़ और अन्य जलवायु संबंधी संकट कृषि तथा दैनिक मजदूरी पर निर्भर समुदायों को फिर से गरीबी में धकेल सकते हैं।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए आर्थिक विकास को रोज़गार सृजन और सामाजिक सुरक्षा के साथ जोड़ना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने, सिंचाई और भंडारण सुविधाओं का विस्तार करने तथा कृषि से जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। छोटे उद्यमों को सस्ता ऋण, बाज़ार और तकनीकी सहायता देकर स्थानीय रोज़गार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। नीतियों का लाभ उन समुदायों तक प्राथमिकता से पहुंचना चाहिए जो भौगोलिक, सामाजिक या आर्थिक कारणों से सबसे पीछे रह गए हैं।
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