संसद से दूर होता लोकतांत्रिक विरोध
लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि संसद की इमारत कितनी भव्य है, यह इस बात से होती है कि उसकी देहरी तक आम आदमी की आवाज़ कितनी आसानी से पहुंच सकती है। कभी दिल्ली का बोट क्लब जनाक्रोश, जन-संघर्ष और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का बड़ा मंच हुआ करता था। फिर विरोध की उस आवाज़ को वहां से हटा दिया गया। अब जंतर-मंतर से भी बंदिशों और धरना-प्रदर्शनों को राजधानी के केंद्र से दूर ले जाने की तैयारी कर ली गई है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर सरकार जनता की आवाज़ से इतनी असहज क्यों है? दुनिया के सारे प्रमुख लोकतंत्रों में जन प्रतिरोध के लिए संसद के बिल्कुल आसपास ही जगह मुहैय्या करायी गई है। अमरीका में राजधानी वाशिंगटन, जहां देश की संसद स्थिति है, उसके बिल्कुल 200 मीटर के दायरे में जन प्रतिरोध के लिए जगह मौजूद है। ‘कैपिटल हिल’ से खड़े होकर जन प्रतिरोध को न केवल देखा और सुना जा सकता है बल्कि संबोधित भी किया जा सकता है। यही स्थिति लंदन में संसद के बिल्कुल निकट लोगों के विरोध प्रदर्शन हेतु पार्लियामेंट स्क्वायर का मौजूद होना है, जहां लोग धरना प्रदर्शन कर सकते हैं। इसी तरह कनाडा में ओटावा का पार्लियामेंट हिल संसदीय प्राधिकरण की अनुमति और क्षेत्र विशेष की शर्तों के साथ धरना प्रदर्शनों के लिए मौजूद है। फ्रांस में पेरिस का प्लास द ला रिपब्लिक सार्वजनिक चौकों पर रैलियों और जुलूस की अनुमति देता है, पूर्व सूचना के साथ। यही स्थिति जर्मनी में भी है, जहां संसद के 300 मीटर के भीतर लोग अपने प्रतिरोध का परचम फहरा सकते हैं।
लेकिन पिछले दिनों भारत सरकार ने जंतर-मंतर को धरना प्रदर्शनों के लिए डि-नोटिफाई कर दिया गया है और राजधानी दिल्ली में धरना प्रदर्शनों के लिए तीन स्थान तय किये हैं— रामलीला मैदान जो कि संसद से 5 किलोमीटर दूर है, बुराड़ी का निरंकारी मैदान जो संसद से 22 किलोमीटर दूर है और तीसरा पूर्वी दिल्ली स्थिति सीबीडी ग्राउंड जो कि संसद से 13 किलोमीटर दूर है। ऐसे में अगर इन जगहों में जन-प्रदर्शन होते भी है, तो उसका सरकार या सत्ता पर क्या असर पड़ेगा? आखिर भारत में विरोध की आवाज़ को संसद से दूर रखने की प्रवृत्ति किस लोकतांत्रिक विवेक से संचालित है? क्या राजधानी की व्यवस्था बनाये रखने का अर्थ जनता के असंतोष को उसकी आंखों से ओझल करना है? आखिर धरना केवल सड़क घेरने की घटनाभर तो नहीं है? सत्ता को जवाबदेह बनाने का संविधान से मिला एक माध्यम भी है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शन कहां हों? सवाल यह है कि लोकतंत्र जनता की आवाज़ सुनने के लिए कितनी दूर तक आने को तैयार है?
लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ केवल उठनी ही नहीं चाहिए, बल्कि उसे सत्ता के कानों तक पहुंचनी भी चाहिए। धरना किसी मैदान में बैठे लोगों की भीड़भर नहीं होता, वह सरकार और जनता के बीच संवाद का एक ऐसा सार्वजनिक माध्यम भी होता है, जिसमें असहमति को दृश्यता मिलती है, मांगों पर बहस शुरु होती है और कभी-कभी नीतियों की दिशा भी बदलती है। इसलिए धरना प्रदर्शन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी है। उन्हें समस्या मानकर दूर भेजने का मतलब लोकतंत्र की जीवंतता से आंखें चुराने जैसा है। आखिर किसी सजीव लोकतंत्र में जन भागीदारी का यही तरीका है। दिल्ली में विरोध स्थलों का इतिहास इस सवाल को और प्रासंगिक बनाता है। कभी इंडिया गेट के निकट बोट क्लब के लॉन सत्ता के सामने जन असंतोष दर्ज कराने की प्रमुख जगह हुआ करता था। अक्तूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसानों का जमावड़ा हुआ और इस आंदोलन ने राजीव गांधी सरकार पर किसानों की मांगों को लेकर दबाव बनाया। इससे नाराज़ तत्कालीन सरकार ने अंतत: बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों को प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद सन 1993 में जंतर-मंतर जनविरोध को स्वर देने की संसद के निकट एक प्रमुख जगह के रूप में उभरा। यह तीन दशक तक विभिन्न तरह की सामाजिक और राजनीतिक असहमतियों को मुखर स्वर देने की जगह रहा।
अन्ना हजारे का आंदोलन हो या निर्भया कांड के बाद न्याय की मांग को लेकर उमड़ा जनाक्रोश, इस जगह ने विरोध को राजधानी के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बना दिया। लेकिन अब यह कहानी फिर नये मोड़ पर है। दिल्ली पुलिस के 11 अक्तूबर, 2026 के आदेश के तहत जंतर-मंतर रोड को निर्धारित विरोध स्थल की सूची से हटा दिया गया। इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, 15 अक्तूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ। लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली में नये निर्धारित स्थलों में धरना प्रदर्शन के होने का आखिर क्या प्रभाव रह जायेगा?
इसलिए बोट क्लब से जंतर-मंतर और जंतर-मंतर से दूर स्थित इन मैदानों तक प्रतिरोध की इस यात्रा के बीच असली सवाल यही है कि क्या विरोध को सत्ता की नज़रों से दूर किया जा रहा है? -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

