मतदाता सूचियों के संशोधन पर राजनीतिक हंगामा क्यों ?
भारतीय लोकतंत्र में वोट का बहुत महत्व है। इसी अधिकार के आधार पर आम नागरिक अपनी सरकार चुन कर उसे जवाबदेह बनाता है। इसलिए मतदाता सूचियों के संशोधन तथा प्रत्येक योग्य नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा दोनों ही लोकतंत्र की मज़बूती के लिए ज़रूरी हैं। देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक पार्टियों में शुरू हुई बहस ने इस मुद्दे को चर्चा के केन्द्र में ला खड़ा किया है। यदि पिछले समय के दौरान मतदाता सूचियों में एक ही व्यक्ति के नाम पर एक से अधिक स्थानों पर वोट बने हों, मृतकों के नाम दर्ज हो या अन्य किसी कारण मतों की वैधता पर सवाल उठते हों तो उनकी जांच करने पर आपत्ति न की जाए? परन्तु ऐसी खामियों या संशोधन की आड़ में किसी भी योग्य नागरिक को उस मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
वोटों की हो निष्पक्ष जांच : हमारे देश में मतदान का प्रावधान कोई नई बात नहीं है। अलग-अलग समय पर चुनाव होते रहते हैं और सरकारें बदलती रही हैं, मतदाता सूचियों में नए नाम शामिल करने और मृतकों के नाम हटाने की प्रक्रिया भी चलती रही है। इस लंबी प्रक्रिया के दौरान हुई गलतियों या किसी अन्य तरह की अनियमितताओं की जांच करना समय की ज़रूरत है। बड़ा सवाल है कि पिछले समय में बनी सभी वोटों की जांच किए बिना मतदाता सूची को पूरी तरह सही माना जा सकता है? मतदाता सूचियों के संशोधन संबंधी चर्चा में प्रवासी आबादी का मुद्दा अक्सर उठता है। रोज़गार, कारोबार और बेहतर जीवन की तलाश में लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने की वजह से उनके पते बदल जाते हैं, ऐसी स्थिति में मतदाता सूचियों का संशोधन ज़रूरी है। किसी प्रवासी का नियमों के मुताबिक बना वैध वोट नहीं काटा जाना चाहिए, लेकिन किसी व्यक्ति का दो स्थानों पर वोट या अवैध तरीके से वोट बनाने पर नियमों के मुताबिक कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। किसी मतदाता के अपने राज्य की भाषा या सामाजिक पृष्ठभूमि को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। राजनीतिक पार्टियों को भी प्रवासियों के मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने के बजाय कानूनी और तथ्यों पर आधारित चर्चा करनी चाहिए।
कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों की आपत्तियों आधार क्या है? एसआईआर को लेकर कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा चुनाव आयोग की कार्यप्रणली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उनकी चिंताओं में करोड़ों योग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाने, दस्वावेज़ी कार्यवाही में मुश्किलें और प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन सवालों को सिर्फ राजनीतिक विरोध कह कर रद्द उचित नहीं, क्योंकि मताधिकार की सुरक्षा प्रत्येक लोकतंत्र व्यवस्था की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। यदि मतदाता सूचियों में वास्तव में अनियमितताएं हैं, तो उन्हें दूर करने की प्रक्रिया का विरोध करने के बजाय संशोधन में सहयोग करना चाहिए। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी पार्टियों को अपनी आपत्तियों के समर्थन में तथ्य पेश करने चाहिए कि कितने योग्य मतदाताओं के नाम काटे गए, कितने इंदराज पर आपत्ति है, इन सवालों के जवाब राजनीतिक बयानबाज़ी से ज़्यादा महत्व रखते हैं। दूसरी ओर भाजपा और केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कोई भेदभाव न हो और हर योग्य नागरिक को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले।
चुनाव अयोग की जवाबदेही : एसआईआर के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में युवाओं का आंदोलन चर्चा में है, जिसने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूचियों के संशोधन के तरीके पर आपत्ति जताई है। अगर आंदोलनकारियों के पास योग्य मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटने के सबूत हैं तो उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए। चुनाव आयोग को भी मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों के कानूनी आधार को पारदर्शी तरीके से स्पष्ट करना चाहिए। इस तरह आरोप-प्रत्यारोप की बजाय तथ्यों पर आधारित बहस को उत्साह मिलेगा। चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी सिर्फ मतदाता सूचियों से नाम हटाने या नए नाम जोड़ने तक ही सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी सुनिश्चित करना है। जिन योग्य मतदाताओं के नाम गलती से काटे गए हैं, उन्हें पुन: सूची में शामिल करने के लिए चुनाव आयोग को सरल व समयबद्ध प्रबंध करने चाहिएं। मतदाता सूचियों का संशोधन किसी पार्टी के चुनावी फायदे या नुकसान की बजाय कानूनी और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार होना चाहिए।
राजनीतिक लाभ से ऊपर है लोकतंत्र : एसआईआर को लेकर चल रही बहस में भाजपा, कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने रवैये पर विचार करने की ज़रूरत है। यदि मतदाता सूचियों के संशोधन से अनियमितताएं दूर होती हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए। किसी भी पार्टी को भूलना नहीं चाहिए कि आज का विपक्ष कल सत्तारूढ़ बन सकता है और आज की सत्तारूढ़ पार्टी विपक्ष बन सकती है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एसआईआर का कौन समर्थन और कौन विरोध करता है, असली सवाल मतदाता सूचियों को ठीक करने के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी यत्न होने चाहिएं ताकि हर योग्य मतदाता का लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहे। राजनीतक पार्टियों को यह समझना पड़ेगा कि मतदाता सूचियों में संशोधन का उद्देश्य किसी पार्टी को जीत दिलाना या हराना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाना है। -मो. 62836-42114



