इज़रायली चुनाव नेतन्याहू के साथ भारत के लिए भी अहम
इज़रायल में 27 अक्तूबर को हुआ आम चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। देश की सुरक्षा, गाज़ा और ईरान के साथ युद्ध, अमरीका से रिश्ते और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इज़रायल की छवि जैसे मुद्दे इस चुनाव के केंद्र में हैं। नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट समेत दूसरे विरोधियों से कड़ी चुनौती मिल रही है।
इस चुनाव पर भारत की भी नज़र है। इज़रायल में सरकार बदलने या मौजूदा गठबंधन के दोबारा सत्ता में आने का असर भारत-इज़रायल संबंधों की दिशा पर पड़ सकता है। भारत-इज़रायल के बीच के रिश्ते पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं और इस बीच वहां की सत्ता बेंजामिन नेतन्याहू ही संभाल रहे थे। हालांकि रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में दोनों देशों के मजबूत संबंध बने रहने की उम्मीद है।
नेतन्याहू ने दावा किया कि अगर वह दोबारा सत्ता में आते हैं तो ट्रम्प ईरान से पैदा होने वाले खतरे को खत्म करने के लिए फिर कार्रवाई करने को तैयार हैं। इस बयान के जरिए वह मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके नेतृत्व में इज़रायल को अमरीका का मजबूत समर्थन मिलता रहेगा। हालांकि नेतन्याहू के विरोधी उनके इस प्रचार पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने प्रधानमंत्री पर डर, झूठ और धमकियों के सहारे चुनाव लड़ने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अमरीका इज़रायल के लोगों द्वारा चुने गए किसी भी नेता के साथ मिलकर काम कर सकता है।
जानकारों के अनुसार इस चुनाव में 7 अक्तूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद गाज़ा में इज़रायल की सैन्य कार्रवाई को लेकर भी मतदाताओं के बीच गहरे मतभेद हैं। नेतन्याहू की सरकार को युद्ध के संचालन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा है। वहीं अगली सरकार बनाने के लिए नेतन्याहू को दक्षिणपंथी सहयोगियों इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच के समर्थन की ज़रुरत पड़ सकती है। फिलिस्तीनियों के प्रति उनकी नीतियों को लेकर इन नेताओं की पश्चिमी देशों में आलोचना हुई है। ऐसे में सरकार गठन के दौरान गठबंधन की राजनीति निर्णायक साबित हो सकती है। इज़रायल की संसद नेसेट की 120 सीटों के लिए हो रहे चुनाव से पहले कई सर्वेक्षणों में किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना नहीं जताई गई थी।
भारत के लिए इज़रायल का चुनाव केवल वहां की घरेलू राजनीति का मामला नहीं है। दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग लंबे समय से अहम रहा है। इसलिए नई सरकार की नीतियां भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत इज़रायल से सैन्य उपकरण, मिसाइल प्रणालियां, ड्रोन व निगरानी तकनीक हासिल करता रहा है। अगर नेतन्याहू दोबारा सत्ता में आते हैं, तो मौजूदा रक्षा साझेदारी में निरंतरता रहने की संभावना है। भारत और इज़रायल के बीच कृषि तकनीक, पानी के बेहतर इस्तेमाल, नवाचार और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हैं। नई सरकार की आर्थिक प्राथमिकताएं इन परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत के इज़रायल के साथ मजबूत संबंध हैं, वहीं फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी उसका लंबे समय से समर्थन रहा है। गाज़ा युद्ध और ईरान के साथ तनाव के बीच भारत को अपने रणनीतिक हितों के साथ क्षेत्रीय शांति और स्थिरता का संतुलन बनाए रखना होगा। भारत और इज़रायल दोनों संसदीय लोकतंत्र हैं लेकिन चुनाव कराने के तरीके में बड़ा अंतर है। भारत में लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटों के लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव होते हैं। मतदाता अपने क्षेत्र से उम्मीदवार चुनते हैं और सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है। इसके बाद बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन केंद्र में सरकार बनाता है।
इज़रायल में पूरा देश एक राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र है और मतदाता राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। पार्टी को मिले वोटों के अनुपात में उसे सीटें मिलती हैं। सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सीटों का समर्थन ज़रूरी है। इस व्यवस्था में छोटी पार्टियों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। कुल मिलाकर, इज़रायल का चुनाव केवल प्रधानमंत्री चुनने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह तय करता है कि 120 सदस्यीय नेसेट में किस पार्टी या गठबंधन के पास सरकार चलाने की ताकत होगी। वहीं भारत में मतदाता पहले अपने क्षेत्र का सांसद चुनते हैं और फिर लोकसभा में बहुमत के आधार पर सरकार बनती है। यही दोनों देशों की चुनाव प्रणाली के बीच सबसे अहम अंतर है।
इज़रायल के इस चुनाव में नेतन्याहू की वापसी या विपक्ष की बढ़त, दोनों ही स्थितियों में भारत अपने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा। हालांकि स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में गठबंधन बनाने में लगने वाला समय और सहयोगी दलों की शर्तें नई सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत के लिए सबसे अहम सवाल यही होगा कि इज़रायल की अगली सरकार रक्षा और तकनीक में सहयोग को कितनी प्राथमिकता देती है और क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर उसका रुख क्या रहता है। ऐसे में चुनाव के नतीजों के साथ-साथ नई सरकार की विदेश नीति पर भी दुनिया की नज़र रहेगी।




