पश्चिम एशिया में पुन: युद्ध की आशंका से बढ़़ी चिन्ता
पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष एक व्यापक युद्ध की संभावना को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बार-बार ईरान को धमकियां दी हैं, और कई बार तो उसे पूरी तरह नष्ट करने की बात भी कही है। यह देखना बाकी है कि क्या ये बयान केवल दबाव बनाने के लिए हैं या फिर किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई की शुरुआत हैं। हाल ही में एक प्रैस कॉन्फ्रैंस में मार्को रुबियो का बयान, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर ईरान को धमकी दी, अमरीकी प्रशासन के अहंकार को दर्शाता है। ऐसी स्थिति में दुनिया लापरवाह नहीं रह सकती।
विभिन्न स्रोतों से मिल रही जानकारी के अनुसार ईरान को अमरीका और इज़राइल की ओर से एक नए हमले की आशंका है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर इज़राइल परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करता है, तो ईरान इज़राइल के परमाणु प्रतिष्ठानों को पूरी तरह नष्ट कर देगा, जो डिमोना शहर के दक्षिण-पूर्व में नेगेव रेगिस्तान में स्थित हैं। ब्राज़ीलियाई पत्रकार एमिलियो ‘पेपे’ एस्कोबार ने एक डिजिटल चैनल पर ज़ुल्फकिर अली के साथ एक साक्षात्कार में बताया कि ईरान ने लगभग 400 ठिकानों को चिह्नित कर लिया है, जिनमें खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमरीकी ठिकानों से लेकर हिंद महासागर तक के ठिकाने शामिल हैं। इस बीच हेब्रोन के पास गोलीबारी की घटना के बाद इज़राइल द्वारा वैस्ट बैंक में लॉकडाउन लगाने की खबरें और अमरीकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ की हालिया इज़राइल यात्रा भी गौर करने लायक हैं।ईरान के प्रतिरोध ने अमरीकी सैन्य शक्ति की सीमाओं को उजागर कर दिया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही में रुकावट ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है और आर्थिक दबाव बढ़ा दिया है। डीज़ल सहित ईंधन की आपूर्ति में आ रही दिक्कतों ने वाशिंगटन की नीतियों के आर्थिक परिणामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहा जाता है कि इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वाशिंगटन को यह विश्वास दिलाया था कि ईरान कुछ ही दिनों में आत्मसमर्पण कर देगा। इसी वजह से अमरीका ईरान के खिलाफ इज़राइल की आक्रामकता में शामिल हो गया। इससे संघर्ष और तेज़ हो गया। अपनी सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद अमरीका को वह निर्णायक परिणाम नहीं मिला, जिसकी उसे और इज़राइल को उम्मीद थी। खाड़ी देशों में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर ईरान के हमलों से भारी नुकसान हुआ है। ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ बनी राजनयिक समझ को खत्म कर देने से शांति की संभावनाएं और कमज़ोर हो गई हैं। हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर किए गए हमलों ने बाबअल मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर से होने वाले समुद्री व्यापार को बाधित किया है, जिसका सऊदी अरब पर गंभीर असर पड़ा है।
ब्रिक्स के उदय और चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल, जिसमें विभिन्न महाद्वीपों के लगभग 150 देश शामिल हैं, के ज़रिये विश्व व्यवस्था में बदलाव के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। अमरीका और पूर्व औपनिवेशिक शक्तियां इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों को दरकिनार करते हुए अमरीका अपनी मनमर्जी से विभिन्न देशों पर प्रतिबंध और शुल्क थोपकर दुनिया पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश कर रहा है।
अमरीका के इस वर्चस्ववादी रवैये ने पूरी दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है और हर तरफ सैन्य तनाव बढ़ा दिया है। परमाणु टकराव का खतरा इस मौजूदा स्थिति को विशेष रूप से चिंताजनक बनाता है। ईरान ने बार-बार परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश से इन्कार किया है जबकि अमरीका और इज़रायल उसके परमाणु कार्यक्रम को सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताते रहे हैं। ऐसे दावों की जांच विश्वसनीय अंतर्राष्ट्रीय सत्यापन और स्थापित अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के जरिए होनी चाहिए न कि इनका इस्तेमाल एकतरफा सैन्य कार्रवाई के बहाने के रूप में किया जाना चाहिए।
इराक युद्ध एक गंभीर सबक देता है। 2003 में अमरीका के नेतृत्व में हुए हमले को सही ठहराने के लिए ‘जनसंहार के हथियारों’ का हवाला दिया गया था, लेकिन जिन हथियारों के ज़खीरे का मुख्य आधार के रूप में ज़िक्र किया गया था, वे कभी मिले ही नहीं। इराक और पूरे क्षेत्र के विनाशकारी परिणाम यह दिखाते हैं कि विवादित दावों के आधार पर युद्ध छेड़ने के कितने खतरे हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र को स्थिति को और बिगड़ने से रोकने और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अपने राजनयिक प्रयासों को तुरंत तेज़ करना चाहिए। उसे परमाणु हथियार संपन्न सभी देशों पर दबाव डालना चाहिए कि वे यह वायदा करें कि वे चल रहे संघर्षों में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। (संवाद)



