हिंदी सिनेमा की पहली खलनायिका कुलदीप कौर 

कुलदीप कौर तो शायद आपको याद न होंगी। यू-ट्यूब पर जायें, फिल्म ‘समाधि’ (1950) का गीत ‘गोरे गोरे ओ बांके छोरे’ सुनें, इस गीत को पर्दे पर जो लिप-सिंग कर रही हैं, वह कुलदीप कौर हैं। वह हिंदी सिनेमा की पहली वैम्प (खलनायिका) थीं। 1940 व 1950 के दशकों में वह ही पवित्र व कुंवारी नायिकाओं के मुकाबले में ‘दूसरी’ या ‘बुरी’ औरत हुआ करती थीं। वह अपनी सुंदर व वासनाभरी अदाओं से हीरो को ‘हथियाना’ चाहती थीं। कभी वह बदनाम औरत होतीं, तो कभी किसी की पत्नी होते हुए अन्य मर्द पर नज़र रखने वाली कामुक महिला। बहरहाल, कुलदीप कौर ने अपने सशक्त व प्रभावी अभिनय से हिंदी फिल्मों में वैम्प की नींव रखी। उनकी रखी नींव पर बाद के वर्षों में एक ऊंची इमारत खड़ी हो गई और वैम्प ने दहेज की लालची सास, घर तोड़ती सौतेली मां, डिस्को लाइट्स में कैबरे करती कामुक लड़की, ‘लोइन’ अजीत की मोना डार्लिंग, हंसाती व योजना बनाती रईस महिला... से लेकर प्रेम में धोखा खाकर बदला लेने पर उतारू लड़की से लेकर आज की आधुनिक महिला तक का सफर तय कर लिया है। लेकिन इस सफर के दौरान वो वैम्प कहीं गुम हो गई है, जिसे पर्दे पर कुलदीप कौर, शशिकला, ललिता पवार व बिंदु अदा किया करती थीं।
बहरहाल, वैम्प कभी यही थीं... शराब पीती हुईं, नाचती हुईं, साज़िश करती हुईं और हमेशा ‘बुरे काम का बुरा नतीजा’ का पर्याय बनते हुए। सामाजिक व आर्थिक उतार-चढ़ाव के दौरान वैम्प ने खलनायिकी के लिए रास्ता दे दिया; क्योंकि 1990 के दशक की ए-लिस्ट हीरोइन ही कातिल व स्टॉकर की भूमिका अदा करने लगीं। आज फिल्मों में जो मुख्य भूमिकाएं अदा कर रही हैं, उन्हें अच्छे, खराब व बुरे के बीच चयन करने की आवश्यकता नहीं है। वह सिर्फ महिला बनी रह सकती हैं, जिनमें जीवन का हर शेड संभव है। यह परिवर्तन या प्रगति अच्छी है कि नाटक को हकीकत के करीब लाती है, क्योंकि किसी भी व्यक्ति को ‘पूरी तरह से अच्छा’ या ‘पूरी तरह से खराब’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी फिल्मों में वैम्प से महिला तक का सफर दिलचस्प है।
कुलदीप कौर ने जो रास्ता बनाया था, उस पर बाद में नादिरा व मनोरमा चलीं और उन्होंने वैम्प को इस हद तक प्रभावी बनाया कि सिनामघरों से बाहर निकलने के बाद भी दर्शक उनसे नफरत करते थे। उन्हीं दिनों सास के रूप में घरों में भी वैम्प ने जगह बनानी शुरू कर दी थी। सास-बहू के ड्रामे में सास बनीं शशिकला व ललिता पवार ग्लैमर से दूर होतीं, लेकिन उनकी क्रूरता व चालाकी भरी साज़िशें काफी हद तक प्रासंगिक भी लगती थीं, खासकर इसलिए कि 1960 के दशक में दहेज बहुत बड़ी समस्या थी (जो आज भी है और 1970 व 1980 के दशकों में तो कोई दिन ऐसा नहीं जाता था, जब स्टोव फटने से किसी बहू के मरने की खबर न छपती हो; वैसे स्टोव भी सास को नहीं बल्कि बहू को देखकर ही फटता था) जिससे सरकार को दहेज उन्मूलन कानून तक गठित करना पड़ा था।
फिर निर्माताओं को एहसास हुआ कि एक बड़ी संख्या दर्शकों की ऐसी भी है, जो फिल्म में समाज का आईना देखने के लिए नहीं बल्कि मनोरंजन, फंतासी व कुछ उत्तेजना के लिए भी आते हैं। इसलिए वैम्प को घरों से बाहर निकाला गया। उन्हें क्लबों में डांसर व बॉस की मोना डार्लिंग बनाया गया। वैम्प ग्लैमर व कम कपड़ों में आ गईं। हेलेन, बिंदु व अरुणा ईरानी पर्दे पर सिगरेट-शराब पीतीं, क्लबों में नाचतीं, वेस्टर्न कपड़े पहनतीं। वे स्मार्ट, सज़िशी और प्लाट को ट्विस्ट करने वाली भूमिकाओं में होतीं। उसी दौर में मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा ने करवट लेते हुए तीन लीक से हटी हुई अदाकाराओं के लिए जगह बनायी- ज़ीनत अमान, रेखा व परवीन बॉबी। ये आधुनिक कपड़े पहनतीं, खुलकर अपनी बात रखतीं, नशा करतीं, ‘दम मारो दम’ (हरे रामा हरे कृष्णा, 1971) गातीं। ये अच्छी लड़कियां नहीं थीं, फिर भी फिल्म में उनकी मुख्य भूमिका होती। लेकिन निर्माता इनका अंजाम भी अच्छा दिखाने से बचते थे, मसलन, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ की जेनिस (ज़ीनत अमान) हिप्पियों के संग ड्रग एडिक्ट है, उसे इस दलदल से निकालने का प्रयास भी होता है, लेकिन वह आत्महत्या कर लेती है।
1980 व 1990 के दशकों में वैम्प के साथ रईसी व कॉमेडी को जोड़ दिया गया। रोहिणी हट्टंगड़ी (चालबाज़, 1989), परवीन दस्तूर (मैंने प्यार किया, 1989), नवनीत निशान (हम हैं राही प्यार के, 1993), बिंदु (हम आपके हैं कौन, 1994) आदि इसी प्रकार की भूमिकाएं कर रही थीं लेकिन इसके बाद खेल एकदम बदल गया था। देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद युवाओं में महत्वाकांक्षाओं की लहर दौड़ गई थी। ए-लिस्ट अदाकराएं उन भूमिकाओं की तलाश में थीं जिनमें वह अपने टैलेंट को दिखा सकें, वह केवल पेड़ों के इर्दगिर्द नाच व मुस्कुराकर फिल्म में मात्र फिलर नहीं बनना चाहती थीं। प्रियंका चोपड़ा, उर्मिला मतोंडकर, काजोल आदि भीड़ से अलग खड़ा होना चाहती थीं। काजोल ने सीरियल किलर (गुप्त, 1997) की भूमिका की, प्रियंका चोपड़ा ने (एतराज़, 2004) शादीशुदा होकर अपने पूर्व प्रेमी पर डोरे डालने का प्रयास किया। माधुरी दीक्षित ने (पुकार, 2000) अपने बेवफा प्रेमी से बदला लिया... इस तरह फिल्मों में जो शरीफ महिला के रूप में अलग से वैम्प हुआ करती थीं, वह गायब हो गईं। उसकी जगह अब आज की महिला आ गई, जो एक ही वक्त में अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी, जिसकी बेहतरीन मिसाल है फिल्म ‘इश्किया’ (2010) में विद्या बालन द्वारा अभिनीत चरित्र या ‘पिंक’ (2016) में तापसी पन्नू।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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