साइबर ठगी से चिन्तित सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
डिजिटल तकनीक ने जीवन को जितना आसान और सुविधाजनक बनाया है, उतना ही इसके दुरुपयोग ने आम नागरिकों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे बैंकिंग, खरीदारी, भुगतान और आर्थिक लेन-देन संभव हो गया है, लेकिन इसी सुविधा का लाभ उठाकर साइबर अपराधी लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं। डिजिटल ठगी अब केवल तकनीकी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की आर्थिक सुरक्षा, नागरिकों के विश्वास और बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुकी है। आए दिन साइबर धोखाधड़ी की घटनाएं समाचारों की सुर्खियां बनती हैं। कभी डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लाखों रुपये ठग लिए जाते हैं तो कभी बैंक अधिकारी, पुलिस अधिकारी, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को भयभीत किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि आखिर इतनी जागरूकता के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी साइबर अपराधियों के जाल में कैसे फंस रहे हैं? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान यहां तक कहा कि मोबाइल पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यदि कोई इस तरह डराता है तो मोबाइल दीवार पर मार दीजिए, डिजिटल अरेस्ट अपने आप खत्म हो जाएगा। उनकी यह टिप्पणी केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि समाज को सचेत करने वाला संदेश है। कानून की जानकारी रखने वाले और शिक्षित नागरिक भी जब फर्जी गिरफ्तारी, जांच और कानूनी कार्रवाई के भय से अपनी जमा पूंजी ठगों को सौंप देते हैं तो यह चिंता का विषय बन जाता है। डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का ऐसा तरीका है जिसमें ठग स्वयं को पुलिस, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय या अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर किसी व्यक्ति को फोन अथवा वीडियो कॉल के माध्यम से डराते हैं। उसे किसी गंभीर अपराध में शामिल होने की झूठी कहानी सुनाई जाती है। फिर गिरफ्तारी, पूछताछ और कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर लगातार निगरानी में रखा जाता है। पीड़ित व्यक्ति को परिवार और परिचितों से बात करने तक से रोका जाता है। इसी मानसिक दबाव में वह अपनी बैंक जमा पूंजी अपराधियों के खातों में स्थानांतरित कर देता है। वास्तविकता यह है कि भारत में डिजिटल माध्यम से किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। किसी भी सरकारी एजेंसी की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही होती है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण चिंता बैंकों की जवाबदेही को लेकर है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि बैंक की लापरवाही के कारण डिजिटल ठगी होती है तो बैंक को मुआवज़ा देने के लिए निर्देशित करने पर विचार किया जा सकता है। यह विचार साइबर अपराध के विरुद्ध लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। अभी तक अधिकांश मामलों में ठगी का शिकार होने वाला व्यक्ति ही अपनी रकम वापस पाने के लिए बैंक, पुलिस और साइबर अपराध शाखा के चक्कर लगाता रहता है। कई बार शिकायत दर्ज होने के बावजूद धनराशि वापस नहीं मिल पाती। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब बैंक ग्राहकों की जमा पूंजी की सुरक्षा और आर्थिक लेन-देन की निगरानी के लिए ज़िम्मेदार हैं तो संदिग्ध गतिविधियों के समय उनकी जवाबदेही क्यों तय नहीं होनी चाहिए?
बैंकिंग व्यवस्था में प्रत्येक ग्राहक के खाते से होने वाले लेन-देन का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है। किसी खाते में अचानक असामान्य रूप से बड़ी रकम जमा होना, कुछ ही मिनटों में कई खातों में धनराशि स्थानांतरित होना अथवा सामान्य व्यवहार से अलग लेन-देन होना संदेह पैदा करने के पर्याप्त कारण हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी असामान्य लेन-देन की स्थिति में बैंकों की ज़िम्मेदारी और पुलिस को सूचना देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने म्यूल अकाउंट्स पर विशेष ध्यान देने की बात कही है। ऐसे खाते साइबर अपराधी दूसरे लोगों के नाम पर खुलवाकर या उनके बैंक खातों का दुरुपयोग करके ठगी की रकम को आगे भेजने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इन खातों पर समय रहते निगरानी हो तो अपराधियों के नेटवर्क को कमज़ोर किया जा सकता है। बैंकों को केवल लेन-देन पूरा करने वाली संस्था समझना पर्याप्त नहीं है। उन्हें ग्राहकों की आर्थिक सुरक्षा का सक्रिय प्रहरी भी बनना होगा। संदिग्ध लेन-देन की पहचान के लिए आधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्रभावी निगरानी व्यवस्था को मज़बूत करना समय की मांग है। यदि किसी ग्राहक के खाते में अचानक असामान्य गतिविधि दिखाई देती है तो बैंक को तत्काल ग्राहक से सम्पर्क करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर संदिग्ध लेन-देन को रोकने और संबंधित पुलिस अधिकारियों को सूचना देने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही बैंक कर्मचारियों को भी साइबर अपराध के नए तरीकों के प्रति प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
साइबर अपराध पर नियंत्रण के लिए केवल बैंक और पुलिस की ज़िम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा। नागरिकों को भी अपनी जागरूकता बढ़ानी होगी। किसी अनजान व्यक्ति को मोबाइल पर बैंक संबंधी जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड या व्यक्तिगत विवरण नहीं देना चाहिए। किसी भी सरकारी अधिकारी के नाम पर फोन करके पैसे की मांग की जाए तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। किसी भी प्रकार की धमकी मिलने पर घबराने के बजाय परिवार के सदस्यों और संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए। साइबर ठगी होने पर तुरंत बैंक को सूचित करके राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस दिशा में उम्मीद जगाता है कि डिजिटल ठगी के मामलों में अब केवल पीड़ित नागरिक की परेशानी नहीं, बल्कि बैंकिंग संस्थाओं की ज़िम्मेदारी भी गंभीरता से तय होगी। अटॉर्नी जनरल की ओर से अदालत को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद डिजिटल अरेस्ट के मामलों में कमी आई है, लेकिन देश को अब भी साइबर अपराध के कारण भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि जागरूकता अभियान के साथ कठोर निगरानी और प्रभावी जवाबदेही भी आवश्यक है।
डिजिटल भारत का सपना तभी सार्थक होगा जब नागरिकों का डिजिटल व्यवस्था पर भरोसा सुरक्षित रहेगा। तकनीक विकास का माध्यम बने, भय और ठगी का हथियार नहीं। बैंकिंग संस्थाओं को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी और साइबर अपराधियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट की पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि ग्राहक की मेहनत की कमाई की सुरक्षा केवल उसकी निजी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था की भी जवाबदेही है।
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